जीवनशैली का हिस्सा बनें खेल

Sports should become a part of lifestyle

सुनील कुमार महला

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ही दिन में दो खो-खो वर्ल्‍ड कप जीतने पर भारतीय टीम को बधाई दी है। उन्‍होंने कहा कि ‘भारतीय खो-खो के लिए एक महान दिन है। पाठकों को जानकारी देता चलूं कि भारतीय महिला और पुरुष टीमों ने हाल ही में पहले खो-खो विश्व कप 2025 के खिताब जीत लिए हैं। भारतीय पुरुष टीम ने जहां खो- खो विश्व कप के फाइनल में पड़ौसी नेपाल को 54-36 से शिकस्‍त दी तो वहीं दूसरी ओर इससे पहले भारतीय महिला टीम ने भी नेपाल को हराकर खिताब पर कब्‍जा जमा लिया। गौरतलब है कि महिला टीम ने फाइनल में नेपाल को 78-40 के अंतर से हराया। गौरतलब है कि भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) द्वारा समर्थित खो-खो प्रतियोगिता के पहले संस्करण में 20 पुरुष और 19 महिला टीमों ने हिस्सा लिया था। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि भारतीय पुरुष टीम नेपाल, पेरू, ब्राजील और भूटान के साथ ग्रुप ए में शामिल थी, जबकि महिला टीम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान, मलेशिया और रिपब्लिक ऑफ कोरिया के साथ ग्रुप ए में काबिज थी। प्रत्येक ग्रुप से शीर्ष दो टीमों ने क्वार्टरफाइनल के लिए क्वालीफाई किया। भारतीय पुरुष खो-खो टीम ने क्वार्टर फाइनल में श्रीलंका को 100-40 से हराने से पहले एक बेहतरीन रिकॉर्ड के साथ अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया था। इसके बाद उन्होंने सेमीफाइनल में दक्षिण अफ्रीका को 62-42 से हराया। इधर,महिला वर्ग में, भारत ने क्वार्टर और सेमीफाइनल में क्रमशः बांग्लादेश को 109-16 और दक्षिण अफ्रीका को 66-16 से हराने से पहले अपने सभी तीन ग्रुप मैच जीतकर अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया था। वास्तव में कहना ग़लत नहीं होगा कि भारतीय टीमों की यह जीत युवाओं के बीच खो- खो को और अधिक लोकप्रिय बनाने में योगदान देगी।सच तो यह है कि भारतीय टीमों की यह ऐतिहासिक जीत उनके अद्वितीय कौशल, दृढ़ संकल्प और टीम वर्क का परिणाम है। बहरहाल, यह विडंबना ही कि आज हमारे यहां स्थानीय और पारंपरिक खेल धीरे-धीरे विलुप्त होते चले जा रहे हैं और देश के युवाओं का ध्यान क्रिकेट, बैडमिंटन जैसे खेलों की ओर ही अधिक है। वास्तव में खेल एक मानवीय गतिविधि होती है, जिसमें शारीरिक परिश्रम और कौशल को गतिविधि का प्राथमिक केंद्र माना जाता है। ये खेल ही होते हैं जिनमें प्रतिस्पर्धा या सामाजिक भागीदारी के तत्व शामिल होते हैं।खेल का जीवन में बहुत बड़ा महत्व होता है। खेलों से जहां व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक विकास होता है, वहीं दूसरी ओर ये हमारे स्वास्थ्य को भी बनाये रखते हैं।खेल से मनोरंजन तो होता ही है साथ ही साथ खेल सामाजिक विकास में भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सच तो यह है कि खेल के माध्यम से व्यक्ति के नीरस जीवन में उत्साह का संचार होता है। इसलिए सरकार को खेलों के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए।खेल हमें भावनात्मक तौर पर मजबूत बनाते हैं और हमारे अंदर छिपी हुई प्रतिभा को भी मंच भी प्रदान करते हैं। ये हमारे तनाव और अवसाद को भी काफी हद तक कम करते हैं और अच्छी नींद लाने में सहायक हैं। खेल टीमवर्क और खेल भावना को भी बढ़ावा देते हैं।बहरहाल, आज भारत में ऐसे बहुत से खेल ऐसे हैं जो केवल स्थानीय क्षेत्र में खेले जाते हैं या जो अभी भी राष्ट्रीय स्तर का खेल बनने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पाठकों को बताता चलूं कि भारत हमेशा से संस्कृति और परंपरा से समृद्ध रहा है और खेल, हमेशा से ही भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहें हैं, लेकिन आज विभिन्न स्थानीय खेलों जैसे कि सतोलिया (पिट्ठू या लगोरी),गुट्टे या किट्ठू, कंचा, गिल्ली डंडा,पोशम्पा,चौपड़/पचीसी, मल्लखंब,किठ-किठ, धोपकेल,पलांगुली, हाथ कुश्ती(पंजा लड़ाना),युबी लकपी ऐसे खेल हैं, जिन्हें राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई स्थान नहीं है। ऐसे में आज जरूरत इस बात की है कि इन खेलों के लिए विशेष वित्त पोषण और अनुदान की व्यवस्थाएं की जाए और इनको अधिकाधिक बढ़ावा देने की दिशा में यथेष्ठ प्रयास किए जाएं। आज विश्व में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस, जापान, आस्ट्रेलिया, स्वीडन जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन जैसे बहुत आगे है, क्यों कि ये देश खेलों के लिए ट्रेनिंग वैज्ञानिक और मेडिकल साइंस के आधार पर करवाते हैं, जिससे वो मेडल जीतने में कामयाब होते हैं। खेलों के लिए विभिन्न सुविधाएं जैसे खेल के लिए मैदान, विभिन्न खेल उपकरण, ट्रेनिंग व्यवस्थाएं खेलों के लिए एक आवश्यकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि अगर भारत की ग्रामीण आबादी खेलना शुरू कर दे, और ग्रामीण स्थानीय खेलों के लिए स्कूली समय से ही बच्चों को खेलों के प्रति जागरूक व प्रोत्साहित किया जाए तो खेलों को लोकप्रिय बनाया जा सकता है। सच तो यह है कि जीवन का सार हमारी भागीदारी में ही है। खेल के लिए भागीदारी बहुत ही जरूरी व आवश्यक है। कहना ग़लत नहीं होगा कि भारत में खेल लोकप्रिय तब बनेंगे, जब भारत की 65-70% ग्रामीण जनसँख्या खेल खेलना शुरू कर दे। ऐसा करने के लिए, ग्रामोत्सव का आयोजन किया जा सकता है, जिसमें हज़ारों गांव खेलों में हिस्‍सा ले सकते हैं। इतना ही नहीं,खेलों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना बहुत ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा के साथ ही खेलों को प्राथमिकता देने की जरूरत है। दूसरे शब्दों में कहें तो खेल लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में भी जोड़ते हैं, इसलिए खेल शिक्षा पद्धति का आवश्यक हिस्सा होने चाहिए। प्रोत्साहन और प्राथमिकता के साथ ही खेलों में रूचि जाग्रत किए जाने की भी जरूरत है।खिलाडिय़ों के लिए प्रशिक्षण और कोच की व्यवस्था होनी चाहिए। आज कबड्डी, खो-खो,फुटबॉल, बास्केटबॉल जैसे खेलों के प्रशिक्षण के लिए कोच उपलब्ध न होने के कारण ये खेल पीछे रह गए हैं। इतना ही नहीं, खेलों के लिए आधारभूत संरचना का विकास, खेल नीति का क्रियान्वयन, अनुभवी खिलाड़ियों से परामर्श लेना और स्कूली स्तर पर खेलों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित जरूरी है। समय समय पर खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना जरूरी है। इतना ही नहीं, लड़कों के साथ -साथ लड़कियों को भी खेलने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। इससे सभी खेलों को बढ़ावा मिलेगा।विभिन्न परीक्षाओं में प्रतिभावान खिलाडिय़ों को अतिरिक्त अंक दे कर खेलों के प्रति आकर्षण पैदा किया जा सकता है। स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के लिए खेलना भी जरूरी है, यह बाल्यकाल से(स्कूली समय से) बच्चों को बताया जाना चाहिए। सबसे बड़ी बात, खेलों को राजनीति से हमेशा दूर रखा जाना चाहिए ताकि सही प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के अवसर प्राप्त हो सकें।बजट में खेलों के लिए विशेष प्रावधान करते हुए अधिक व अतिरिक्त धनराशि आवंटित की जानी चाहिए। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाडिय़ों को विशेष प्रोत्साहन दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए, अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षकों के द्वारा खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिए। साथ ही खेल को जीवनशैली का हिस्सा बनाने के प्रयास होने चाहिए।