होरमुज़ जल-डमरू-मध्य: युद्ध नहीं शांति हो

Strait of Hormuz: Let there be peace, not war

प्रो. नीलम महाजन सिंह

मार्च 2026 के मध्य तक, अमेरिका-इज़राइल के साथ बढ़ते संघर्ष के बीच, ईरान ने होरमुज़ जल-डमरू-मध्य को प्रभावी ढंग से अवरुद्ध कर दिया है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण वैश्विक ऊर्जा जल मार्ग है। ईरान केवल ‘मित्र’ या अधिकृत जहाज़ों को ही वहां से गुज़रने की अनुमति दे रहा है। इस से वैश्विक तेल शिपमेंट में भारी व्यवधान उत्पन्न हो गया है व तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई हैं। उत्तर में ईरान व दक्षिण में ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से घिरा, होरमुज़ जलमार्ग जिसकी चौड़ाई इसके प्रवेश व निकास द्वार पर लगभग 50 कि.मी. (31 मील) है व अपने सबसे संकरे बिंदु पर लगभग 33 किमी है, खाड़ी क्षेत्र को अरब सागर से जोड़ता है। यह जल-डमरू-मध्य दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के टैंकरों के गुज़रने के लिए पर्याप्त रूप से गहरा है। इसका उपयोग मध्य-पूर्व के प्रमुख तेल व लिक्विड नेचुरल गैस उत्पादकों के साथ उनके ग्राहकों द्वारा भी किया जाता है। होरमुज़ जल-डमरू-मध्य संकट के प्रमुख पहलू क्या हैं? ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों के बाद, तेहरान इस जल-डमरू-मध्य को अवरुद्ध करने की धमकी का उपयोग अमेरिका व उसके सहयोगियों के विरुद्ध एक रणनीतिक हथियार के रूप में कर रहा है। ईरान की नौसेना व ई.आर.जी.सी.; इस पाबंदी को लागू कर रहे हैं, जिससे जहाज़ों को अपने गुज़रने के लिए तालमेल बिठाना पड़ रहा है। इस दौरान, इरान द्वारा दर्जनों जहाज़ों पर हमला किया गया है। इसका तेल बाज़ार की कीमतों पर महंगाई बढ़ाने वाला असर पड़ेगा। इस नाकेबंदी की वजह से जहाज़ों की आवाजाही में काफ़ी कमी आई है व ज़्यादातर तेल की ढुलाई रुक गई है। इससे देशों को अपने आपातकालीन भंडार जारी करने पड़ रहे हैं। इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ रही है। ईरानी सेनाओं ने खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा से जुड़े अहम बुनियादी ढांचों पर भी हमले किए हैं, जिनमें क़तर की एल.एन.जी. सुविधाएं भी शामिल हैं। अमेरिका व उसके सहयोगी इस जलमार्ग को सुरक्षित बनाने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। हालाँकि ईरान ने इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए ‘एरिया-डिनायल’ (क्षेत्र में किसी अन्य को घुसने से रोकना) की मज़बूत क्षमताएँ (मिसाइलें, बारूदी सुरंगें, ड्रोन) विकसित कर ली हैं। स्थिति अभी भी बेहद अस्थिर बनी हुई है। इस नाकेबंदी की वजह से ऊर्जा आपूर्ति में इतिहास की सबसे गंभीर रुकावटों में से एक पैदा हो गई है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ‘होरमुज़ जल-डमरू-मध्य’ (Strait of Hormuz) पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। भारत के कच्चे तेल का लगभग 40 से 50% व एल.पी.जी. आयात का 80% से ज़्यादा हिस्सा इसी जल-डमरू-मध्य से होकर गुज़रता है। हालाँकि, हाल के संघर्षों के दौरान भारत ने कच्चे तेल के कुल आयात पर अपनी निर्भरता को 55% से घटाकर लगभग 30% तक कर लिया है, फिर भी भारत तेल की कीमतों में अचानक उछाल, जहाज़ों की आवाजाही में रुकावटों व खाना पकाने के ईंधन तथा प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में संभावित झटकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। भारत में आयात होने वाली लगभग 90% एल.पी.जी. व 60% नेचुरल गैस इसी रास्ते से आती है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण बीमा व माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। तेल की कीमतों में होने वाली हर $10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत की जीडीपी में लगभग 0.5% की कमी आने की आशंका है। होरमुज़ जल-डमरू-मध्य के लंबे समय तक बंद रहने से भारत की घरेलू ऊर्जा आपूर्ति (खाना पकाने की गैस) पर संकट पैदा हो गया है व इससे देश में भारी महंगाई बढ़ रही है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में एक गुमराह करने वाला बयान दिया, कि पेट्रोल या गैस का कोई संकट नहीं है। हरदीप सिंह पुरी पहले से ही ‘एपस्टीन फाइल्स घोटाले’ में दागदार हैं, जिसकी जांच अमेरिका का फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) कर रहा है। पुरी के साथ अनिल अंबानी का नाम भी अमेरिकी न्याय विभाग की वेबसाइट पर मौजूद एपस्टीन ईमेल में सामने आया है। हालांकि, भारत रूस से आयात बढ़ाकर अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है, जिसकी ‘डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अनुमति दी गई’ है। बी.बी.सी. ने बताया है कि 20 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला किए जाने के बाद से, ईरान ने दुनिया के सबसे व्यस्त तेल शिपिंग मार्ग, होर्मुज़ जल-डमरू-मध्य को प्रभावी ढंग से अवरुद्ध कर दिया है। 2025 में, होर्मुज़ जल-डमरू-मध्य से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल व तेल उत्पाद गुजरते हैं। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुमानों के अनुसार, यहाँ से प्रति वर्ष लगभग $600 बिलियन (£447 बिलियन) मूल्य का ऊर्जा व्यापार होता है। यह तेल न केवल ईरान से, बल्कि इराक, कुवैत, कत्तर, सऊदी अरब और UAE जैसे अन्य खाड़ी देशों से आता है। एल.एन.जी. गैस का वह रूप है, जिसे तरल में बदल दिया जाता है। इसे परिवहन के लिए 600 गुना कम जगह की आवश्यकता होती है और फिर गंतव्य पर पहुँचने के बाद इसे वापस गैस में बदलकर हीटिंग, खाना पकाने व बिजली उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है। होर्मुज़ मध्य पूर्व से उर्वरक के निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण मार्ग है, जहाँ उत्पादन प्रक्रिया में प्राकृतिक गैस का भारी उपयोग किया जाता है। दुनिया के उर्वरक व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा आमतौर पर इसी जल-डमरू-मध्य से होकर गुज़रता है। दूसरी ओर, यह जल-डमरू-मध्य; मध्य पूर्व में आयात के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्ग है, जिसमें भोजन, दवाएँ व तकनीकी सामग्री शामिल हैं। अमेरिका ने घोषणा की है कि होर्मुज़ जल-डमरू-मध्य के किनारे स्थित ईरान की मिसाइल साइटों पर जल्द ही कब्ज़ा कर लिया जाएगा। ऐ.एफ.पी. (AFP) समाचार एजेंसी के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से कम से कम 21 जहाज़ों को निशाना बनाया गया है। ऊर्जा बाज़ार की जानकारी देने वाली संस्था ‘ग्लोबल रिस्क मैनेजमेंट’ के मुख्य विश्लेषक, अर्ने लोहमान रासमुसेन ने बीबीसी के अमेरिकी सहयोगी CBS सी.बी.एस. न्यूज़ को बताया, “आप पर हमला हो सकता है और आपको बीमा नहीं मिल सकता या फिर यह बेहद महंगा हो सकता है; इसलिए आपको तब तक इंतज़ार करना पड़ेगा, जब तक कि सुरक्षा स्थिति बेहतर न हो जाए।” हालांकि वहां कोई भौतिक नाकाबंदी नहीं है, लेकिन ईरानियों से मिल रही धमकियों, साथ ही ड्रोन-मिसाइल हमलों के कारण, तेल टैंकर इस जल-डमरू-मध्य से होकर नहीं गुजर रहे हैं। सारांंशार्थ यह कहा जा सकता है कि जब कोई एक देश दूसरे देश पर हमला करता है, तो उसे किसी न किसी तरह की जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए। रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत बढ़कर लगभग $100 प्रति बैरल हो गई है, जो इस साल लगभग 70% व एक साल पहले के मुकाबले लगभग 50% ज़्यादा है। होर्मुज़ जल-डमरू-मध्य की नाकेबंदी ने एशियाई देशों को बुरी तरह प्रभावित किया है। ईरान इस जलडमरूमध्य को कैसे नियंत्रित करता है? संयुक्त राष्ट्र के नियम देशों को अपनी तटरेखा से 12 नॉटिकल मील (13.8 मील) तक के क्षेत्रीय समुद्रों पर नियंत्रण रखने की अनुमति देते हैं। अपने सबसे संकरे बिंदु पर, होर्मुज जलडमरूमध्य व उसके शिपिंग मार्ग पूरी तरह से ईरान-ओमान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र के भीतर आते हैं। ईरान की तेज़ गति नावें, जो अक्सर जहाज-रोधी मिसाइलों से लैस होती हैं, दुश्मन पर हमला करती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाॅल्ड ट्रम्प ने हाल ही में अमेरिका के सहयोगी देशों व चीन से युद्धपोत भेजकर होर्मुज को सुरक्षित करने में मदद करने का आह्वान किया था, लेकिन इसमें उन्हें बहुत उत्साह देखने को नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने कहा कि अमेरिका को वास्तव में किसी भी देश की मदद की ज़रूरत नहीं है। होर्मुज को दरकिनार करने के लिए वैकल्पिक बुनियादी ढांचे के ज़रिए तेल को दूसरे रास्ते से भेजा जा सकता है, लेकिन रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इससे तेल की आपूर्ति में प्रतिदिन 8-10 मिलियन बैरल की गिरावट आ जाएगी। इसके अलावा, फुजैराह में तेल की लोडिंग ड्रोन हमलों के कारण बाधित हुई है। लेखिका आग्रह करतीं हैं कि अमेरिका-इज़रायल व ईरान को युद्धविराम की घोषणा करनी चाहिए व पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को समाप्त करना चाहिए। यदि युद्ध जारी रहता है, तो दुनिया भर में आम-आदमी को कष्ट उठाने पड़ेंगें और राष्ट्र आर्थिक रूप से तबाह हो जाएंगें। युद्ध पर शांति की जीत हो।

प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, अंतर्राष्ट्रीय रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ, दूरदर्शन की जानी-मानी हस्ती, मानवाधिकार संरक्षण की सॉलिसिटर और परोपकारी)