विनोद कुमार विक्की
समानता और बहुआयामी समावेशन के उद्देश्य से बनाया गया प्रत्येक कानून मूलतः न्यायसंगत होता है, बशर्ते उसका दुरुपयोग न किया जाए। कानून की आत्मा तभी जीवित रहती है, जब उसका निष्पक्ष, संतुलित और ईमानदार क्रियान्वयन सुनिश्चित हो। अन्यथा वही कानून, जो समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा देने के लिए बनाया गया हो, सामाजिक असंतुलन और अविश्वास का कारण बन सकता है।
भारतीय संविधान के भाग–3 में उल्लिखित मौलिक अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता के अधिकार की स्पष्ट व्याख्या की गई है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता तथा कानून द्वारा समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है, जबकि अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करने की पैरवी करता है। अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता (छुआछूत) को समाप्त कर सामाजिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया।
हालाँकि महिलाओं, बच्चों तथा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC) के लिए विशेष प्रावधान या आरक्षण को समानता के अधिकार के अंतर्गत स्वीकार्य अपवाद माना गया है। इसी क्रम में 103वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। किंतु समय-समय पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के प्रमाण-पत्रों की सत्यता पर भी प्रश्नचिह्न उठते रहे हैं।
शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव की रोकथाम और समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हाल ही में लाया गया यूजीसी का नया कानून भी व्यापक चर्चा में है। उद्देश्य निस्संदेह सराहनीय है, किंतु इसकी सफलता पूरी तरह निष्पक्ष और विवेकपूर्ण क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
वास्तविक चुनौती किसी भी कानून को बनाना नहीं, बल्कि उसका निष्पक्ष अनुपालन सुनिश्चित करना होता है। यदि कोई कानून किसी विशेष जाति या वर्ग के विरुद्ध आरोप लगाने का अधिकार तो देता है, किंतु मिथ्या आरोप सिद्ध होने की स्थिति में शिकायतकर्ता के लिए दंड का स्पष्ट प्रावधान नहीं करता, तो इससे सामाजिक असमानता और असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
समाज में व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद या प्रतिशोध की भावना से झूठे मामले दर्ज किए जाने के आरोप—विशेषकर SC/ST अधिनियम 1989 के दुरुपयोग के कुछ उदाहरण इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं। अनेक मामलों में निर्दोष व्यक्तियों को व्यक्तिगत या संपत्ति संबंधी विवादों में फँसाने के लिए जाति-आधारित अत्याचार के झूठे आरोप लगाए गए हैं, जिसकी ओर सर्वोच्च न्यायालय भी समय-समय पर संकेत कर चुका है।
यद्यपि यदि कानून का दुरुपयोग सिद्ध हो जाए, तो झूठी शिकायत करने वाले के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन कुछ कानूनों के व्यवहारिक मामलों में प्रभावी रोक लगाने के लिए कोई पृथक और कठोर व्यवस्था फिलहाल मौजूद नहीं है।
इसी प्रकार दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अंतर्गत दर्ज कई मामलों में भी आरोप न्यायिक प्रक्रिया के पश्चात मिथ्या सिद्ध हुए हैं। भले ही आरोपी न्यायालय से बरी हो जाएँ, किंतु लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान वे सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से गंभीर दंड झेल चुके होते हैं।
स्पष्ट है कि कानून का उद्देश्य संरक्षण देना होना चाहिए, न कि भय का वातावरण बनाना।
निष्कर्षतः, कानून तभी समाज में विश्वास स्थापित कर सकता है, जब वह न्याय और संतुलन दोनों को समान रूप से साधे। अन्यथा, न्याय के नाम पर किया गया अन्याय कानून की आत्मा पर ही प्रश्नचिह्न लगा देता है। इस संदर्भ में यूजीसी कानून 2026 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अगले आदेश तक लगाया गया रोक प्रशंसनीय है।





