स्वामी विवेकानंद: युवाशक्ति के जागरण का अमर स्वर

Swami Vivekananda: The immortal voice of awakening the youth

सुनील कुमार महला

हर वर्ष 12 जनवरी को भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस (नेशनल यूथ डे) महान् आध्यात्मिक गुरू, युवा वक्ता,मार्गदर्शक, विचारक और राष्ट्रनिर्माता स्वामी विवेकानंद की जयंती के रूप में मनाया जाता है।आपका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हुआ था। आपके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था तथा आपके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था,जो एक प्रसिद्ध वकील थे तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था,जो अत्यंत धार्मिक, विदुषी और संस्कारवान महिला थीं। आपकी माता ने आपका नाम ‘वीरेश्वर’ रखा था और आपको प्यार से वह ‘बिली’ कहकर पुकारती थीं।आपका जीवन संघर्षों से भरा था तथा अपने अपने 39 वर्ष के अल्प जीवन में लगभग 31 बीमारियों का सामना किया। जानकारी मिलती है कि आप चाय पीने के शौकीन थे।एक बार आपने स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक से विशेष रूप से ‘मुगलई चाय’ बनवाई थी। इतना ही नहीं, आपको खिचड़ी और तले हुए आलू (मसालेदार) भी बहुत पसंद थे। विवेकानंद बहुत ही मेधावी छात्र थे,जिनकी प्रारंभिक शिक्षा मेट्रोपोलिटन स्कूल से हुई थी।बाद में अपने प्रेसीडेंसी कॉलेज तथा जनरल असेंबलीज़ इंस्टीट्यूशन (वर्तमान स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में अध्ययन किया। आपने दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, इतिहास, साहित्य, वेद, उपनिषद, तथा पाश्चात्य दर्शन का गहन अध्ययन किया। पाठकों को बताता चलूं कि अंग्रेज़ी के साथ-साथ संस्कृत और बंगला पर विवेकानंद जी की असाधारण पकड़ थी।आपका यह मानना था कि ‘शिक्षा वह है जो मनुष्य का निर्माण करे और उसके चरित्र को मजबूत बनाए।’ आपने एकबार कहा था -‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’ आपका यह कहना था कि-‘ शिक्षा मनुष्य के भीतर पहले से ही मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।’ आत्मविश्वास के बारे में आपका यह कहना था कि ‘यदि आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तो आप भगवान पर भी विश्वास नहीं कर सकते।’ आपका यह मानना था कि ‘शक्ति ही जीवन है और कमजोरी मृत्यु है।’बहुत कम लोग जानते हैं कि आप नास्तिकता की सीमा तक प्रश्न करते थे। वे प्रत्येक साधु से एक ही प्रश्न पूछते थे कि-‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ इसी खोज ने उन्हें रामकृष्ण परमहंस तक पहुँचाया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सत्य की खोज में आपकी मुलाकात स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई। परमहंस जी के प्रभाव में आकर ही आपने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया था और बाद में आप स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए।पाठकों को बताता चलूं कि विश्व में भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत और योग को प्रसारित करने में विवेकानंद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही ब्रिटिश भारत के दौरान राष्ट्रवाद को अध्यात्म से जोड़ने में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संन्यास लेने के बाद आपका नाम स्वामी विविदिशानंद था, लेकिन शिकागो जाने से ठीक पहले, खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह के सुझाव पर आपने अपना नाम बदलकर ‘विवेकानंद’ कर लिया था। कहते हैं कि एक बार अमेरिका में एक महिला आपके प्रवचनों से इतनी प्रभावित हुई कि उसने आपसे विवाह का प्रस्ताव रख दिया था। दरअसल उसने कहा था, ‘मैं आपके जैसा ही तेजस्वी पुत्र चाहती हूँ, इसलिए आप मुझसे विवाह कर लें।’उस समय आपने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया था कि, ‘देवी, मैं तो संन्यासी हूँ, विवाह नहीं कर सकता। लेकिन आपकी इच्छा पूरी हो सकती है। आज से आप मुझे ही अपना पुत्र मान लीजिए। इस तरह आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जाएगा और मेरा संन्यास भी बना रहेगा।’ कहते हैं कि विवेकानंद जी का यह जवाब सुनकर महिला उनके चरणों में गिर गई थी। पाठकों को बताता चलूं कि प्रारंभ में आप रामकृष्ण परमहंस के विचारों से सहमत नहीं थे और तर्क और विवेक के आधार पर आप हर बात को परखते थे, लेकिन धीरे-धीरे रामकृष्ण परमहंस के अनुभवजन्य ज्ञान ने आपको भीतर से बदल दिया।अपने गुरु के देहांत के बाद, 1897 में आपने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ‘परहित’ और समाज सेवा के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति है। आप असाधारण स्मरण शक्ति के धनी थे तथा किसी पुस्तक को एक बार पढ़कर आप उसका सार याद रख लेते थे तथा कई बार तो आप पूरे पृष्ठ शब्दशः दोहरा देते थे। इतना ही नहीं,आप संगीत प्रेमी संन्यासी और युवा वक्ता थे। गौरतलब है कि 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में आप सबसे कम उम्र के प्रतिनिधि थे। आपके पहले शब्द-‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका’ ने पूरे सभागार को भावविभोर कर दिया था।उस समय वहां 7000 लोग मौजूद थे।शिकागो में आपने हिंदू धर्म को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति के धर्म के रूप में दुनिया के सामने रखा। आपने वर्ष 1894 में पहली ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की तथा अपने पूरे यूरोप का व्यापक भ्रमण किया तथा मैक्स मूलर और पॉल डूसन जैसे प्रच्च्वादियों से संवाद किया।आपने भारत में अपने सुधारवादी अभियान के आरंभ से पहले निकोला टेस्ला जैसे प्रख्यात वैज्ञानिकों के साथ तर्क-वितर्क भी किये।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आपने जगदीश चंद्र बोस की वैज्ञानिक परियोजनाओं का भी समर्थन किया। इतना ही नहीं आपने आयरिश शिक्षिका मार्गरेट नोबल (जिन्हें उन्होंने ‘सिस्टर निवेदिता’ का नाम दिया) को भारत आमंत्रित किया, ताकि वे भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने में सहयोग कर सकें।आपने ही जमशेदजी टाटा को भारतीय विज्ञान संस्थान और ‘टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी’ की स्थापना के लिये प्रेरित किया था। विदेशों में आज भी उनके बहुत से प्रशंसक हैं तथा उनका यह मानना था कि भारत का उद्धार केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा से होगा। वास्तव में उनकी यही सोच आगे चलकर रामकृष्ण मिशन की नींव बनी।आपने युवाओं को आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण, राष्ट्रसेवा और आध्यात्मिक चेतना का संदेश दिया। पाठकों को बताता चलूं कि उनके विचारों से प्रेरित होकर भारत सरकार ने 1984 में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया था। इस दिन देशभर में युवा कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ, भाषण, योग एवं प्रेरणात्मक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं, ताकि युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जा सके।आपका विचार था कि-‘ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं। वह हमीं हैं जिन्होंने अपनी आंखों पर हाथ रख लिया है और रोते हैं कि अंधेरा है।’आपका यह मानना था कि जितना बड़ा संघर्ष होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी।आप कहां करते थे कि-‘ यह दुनिया एक महान व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।’ आपका मानना था कि ईश्वर की सेवा का सबसे अच्छा तरीका मनुष्य की सेवा करना है, विशेषकर उन लोगों की जो गरीब और असहाय हैं।यहां यह भी उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी द्वारा सामाजिक रूप से शोषित लोगों को ‘हरिजन’ शब्द से संबोधित किये जाने के वर्षों पहले ही स्वामी विवेकानंद ने ‘दरिद्र नारायण’ शब्द का प्रयोग किया था, जिसका आशय था कि ‘गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।‘ यह भी आपका ही विचार था कि-‘उस व्यक्ति ने अमरत्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी भी सांसारिक वस्तु से विचलित नहीं होता।’आपका कहना था कि अगर किसी देश के युवा जागरूक हों और अपने लक्ष्य के लिए पूरी निष्ठा से काम करें, तो वह देश हर बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। आप कहते थे कि युवाओं को सफल होने के लिए मेहनती, समर्पित और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। कहना ग़लत नहीं होगा कि वे युवाओं को केवल पढ़ाई या सोच में ही नहीं, बल्कि मन की मजबूती (आध्यात्मिक शक्ति) और शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए भी प्रेरित करते हैं। अंत में यही कहूंगा कि स्वामी विवेकानंद के विचारों का निष्कर्ष यह है कि राष्ट्र का उत्थान तभी संभव है जब उसके युवा चरित्रवान, आत्मविश्वासी और कर्तव्यनिष्ठ हों। वे शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम मानते थे।आपने आध्यात्मिक शक्ति को जीवन की सबसे बड़ी ताकत बताया, जो मनुष्य को निर्भय और कर्मठ बनाती है।आपका यह मानना था कि कमजोर शरीर और कमजोर मन से कोई महान कार्य नहीं किया जा सकता। सेवा, त्याग और मानवता के कल्याण को उन्होंने सच्चे धर्म का आधार माना। आपके विचार आज भी युवाओं को जागृत होकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा देते हैं।बहुत कम लोग ही यह बात जानते होंगे कि आपने खुद यह भविष्यवाणी की थी कि आप 40 वर्ष की आयु पार नहीं करेंगे। उनकी यह बात सच साबित हुई और 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की उम्र में आपने बेलूर मठ (पश्चिम बंगाल) में महासमाधि ली।