अरविन्द भाई ओझा
हिंदुत्व के पुरोधा स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1803 को मकरसंक्रांति के दिन हुआ था। व प्रखर बुद्धि व नटखट स्वभाव के थे। उनका सम्पर्क दक्षिणेश्वर के काली मदिर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस से हुआ जो बाद में स्वामी विवेकानन्द के गुरु हुए। कहते हैं कि स्वामी विवेकानन्द भी काली सीधे बात किया करते थे। जब स्वामी विवेकानन्द के पिता की मृत्यु के बाद उनके घर की आर्थिक स्थिति खराब हुई तो स्वामी विवेकानन्द अपने गुरु के कहने पर काली से धन मांगने गए परन्तु काली के सामने जाते ही वे ज्ञान, भक्ति और वैराग्य मांग बैठते थे। कहते हैं रामकृष्ण परमहंस ने अपनी सारी सिद्धियां विवेकानन्द को दे दी थी। क्योंकि वे उनमें किसी महापुरुष के लक्षण देखते थे। रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद स्वामी विवेकानन्द माँ शारदा (गुरू पत्नी) से आशीर्वाद लेकर शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए और विश्व को हिन्दू धर्म और भारत से साक्षात्कार कराया। ये दिन उनके जीवन का स्वर्णिम दिवस था। स्वामी विवेकानन्द 39 वर्ष की अल्प आयु में ही इस दुनिया से विदा हो गए। उन्होंने अपने जीवन की हमें बताया कि कोई व्यक्ति कितने वर्ष जिया यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उसने अपना जीवन कैसे जिया वही उसके पैदा होने की सार्थकता है। स्वामी जी कम समय में ही समाज को एक दिशा दे गए जो आज भी युवाओं के लिए प्रेरणादायी है।
धर्म और अध्यात्म भारत का मूल है
भारत का बड़ा कालखण्ड विदेशी आक्रांताओं से सँघर्ष में बीता जिस कारण हम आध्यात्मिक शोध नहीं कर सके इसके परिणामस्वरूप आक्रांताओं ने विश्व में हमारी पहचान अज्ञानी, रूढ़िवादी, छुआछूत, जंगली, गरीब असहाय, पत्थर पूजने वाला दास देश के रूप में कराई। ऐसे कठिन समय पर भी हमारे देश में कुरीतियों में रूढियों को दूर करने के लिए समाज के पथ प्रदर्शक के नाते अनेक संत, महात्मा, महापुरूष पैदा हुए. जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक और बौद्धिक प्रखरता के आधार पर पूरे विश्व को एक परिवार के नाते विचार कर अपनी पौराणिक मान्यता ‘वासुदेव कुटुम्बकम् व सर्वे भवन्तु सुखिना’ की अलख जगाई और भारत की श्रेष्ठता को सिद्ध किया।
1883 को शिकागो में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित होकर अपने भाषण से पूरे विश्व में भारत की गौरवशाली छवि को प्रस्तुत किया। शिकागो में दिया स्वामी जी का भाषण दुनिया के इतिहास में हिंदुत्व की पुनर्प्रतिष्ठा के रूप में स्थापित हुआ धर्म सम्मेलन में स्वामी जी ने भारत के दर्शन, मान्यताएं व सरकृति को विश्व के सामने रखा। उन्होनें अनुभव कराया कि हिन्दू धर्म व संस्कृति सभी धर्मों (मत पंथों) की माता है। जब हम धर्म की बात करते हैं तो उसका अर्थ सम्प्रदाय से नहीं होता क्योंकि हम धर्म का अंग्रेजी रूपांतरण (Religion) से करते है जबकि (Religion) का सम्बंध सम्प्रदाय से पंथ से हैं। धर्म कोई पूजा पद्धति नहीं है बल्कि जो धारण करने योग्य हो और सबके हित का चिंतन कर सुख देता हो वह धर्म है। इसलिए हिंदुत्व न केवल मनुष्य की बल्कि प्राणी मात्र के सुख की बात करता है। स्वामी जी जैसे ही अपने भाषण के लिए खड़े हुए और कहा “मेरे अमेरिकावासी बहनों और भाईयों इतना कहते ही तालियों की गडगडाहट रोके ना रूकी और लगातार बजती रही। हम भारतवासियों के लिए यह एक साधारण सी बात थी। अमेरिका के लिए अद्भुत थी। उसका एकमात्र कारण था कि भारत की मान्यता है कि सारी दृष्टि ईश्वर की है और प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर का अंग है। इस नाते से प्रत्येक व्यक्ति हमारे भाई-बहन है और उन्होंने घोषणा की, कि ‘मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने पर अभिमान है जिसने पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया। हिंदुत्व की इस विशालता, सहिष्णुता व उदारता का विश्व ने दर्शन किया। अमेरिका के समाचार पत्रों ने लिखा “ऐसे ज्ञान समृद्ध देश में धर्म प्रचारक भेजना मूर्खता की बात है”
हमारी शिक्षा कैसी हो
स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि व्यक्ति निर्माण से ही राष्ट्र का पुनरूत्थान हो सकता है। हमें विद्यार्थियों को एक जागरूक नागरिक बनाने कर प्रयास करना होगा। जिससे अच्छे मनुष्यों का निर्माण हो और इस निर्माण का एक मार्ग शिक्षा ही है। उनका मानना था शिक्षा सकारात्मक व चरित्र निर्माण करने वाली हो युवाओं को लोकिक व धार्मिक ज्ञान का प्रशिक्षण साथ-साथ दिए जाने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्द चाहते थे कि जनता को उनकी बोलचाल की मातृ भाषा में शिक्षा दो इससे उसकी जानकारी बढ़ेगी, परन्तु इससे आगे बढ़कर उसे संस्कारित बनाने का प्रयास भी किया जाना आवश्यक है। ‘शिक्षा मस्तिष्क को सूचना उपलब्ध कराने की श्रोत मात्र नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र निर्माण और सुविचारों की संवाहक बनने में भी सहायक बने। शिक्षा केवल जीवीकोपार्जन न होकर हमारे जीवन में परिवर्तन लाने व मानव बनाने में मदद करे। स्वामी जी ने कहा कि हम भारत के लोगों में अन्न दान की इतनी वृत्ति है कि संसार में कोई जाति इतना अन्न दान नहीं करती। भारत का व्यक्ति कहता है। ‘साई इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाय में भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए” जैसी हमारी मान्यताएं रही है। इस प्रकार के अन्नदान का दृश्य केवल भारत में ही दिखाई देता है और कहीं दिखाई नहीं देता। आजका व्यक्ति दूसरे को शिक्षा तो देना चाहता है परन्तु अपेक्षा रखता है कि उसे उसके बदले में कुछ मिल जाए। हमें भारत के उत्थान के लिए अन्न और वस्त्र दान के साथ विद्या दान के लिए आगे आना चाहिए।
विद्यार्थी को आध्यात्मिक शिक्षा इस प्रकार की दी जाए जो समाजोन्मुखी हो विद्यार्थी अपनी शिक्षा व ज्ञान के आधार पर मानव कल्याण के लिए कार्य करे, क्योंकि जब तक व्यक्ति की आध्यात्मिक शक्ति का विकास नहीं होगा तब तक उसकी भौतिक आवश्यकताएं पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है। आध्यात्मिक शक्ति मानव को अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना सिखाती हैं।
पश्चिम का अन्धानुकरण मत करो
भारत और पश्चिम में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि हमारे देश में बड़े-2 राजा भी अपनी वंश परम्परा किसी ऋषि से जोहते है और उसी के आधार पर अपना गोत्र बताते हैं और श्रेष्ठ, विद्वान, सात्विक, उच्य चरित्र वाले व्यक्ति हमारे आदर्श होते हैं, जबकि पश्चिम में जब तक किसी राजपरिवार, अत्याचारी, प्रभावशाली, लुटेरे के वंश से अपने को नहीं जोड़ लेते तब तक उसे चैन नहीं पड़ता। एकबार किसी ने स्वामी जी के कपड़ों पर टिप्पणी की तो स्वामीजी जी ने उसका जबाव देते हुए कहा था कि तुम्हारे यहां टेलर व्यक्ति को जैन्टलमैन बनाता है, पर हमारे यहां ज्ञान से व्यक्ति (जेंटलमैन) श्रेष्ठ कहलाता है।
पश्चिम का सबकुछ सही है और हमारा सब कुछ गलत है. इस प्रकार की आत्मग्लानि को छोड़ना चाहिए। ‘विदेश में जो श्रेष्ठ है उसे ग्रहण करो, लेकिन पहले अपने को पहचानों अपने पर विश्वास रखो अपना जो श्रेष्ठ है उस पर गर्व करो। तब दूसरों से ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं है।
पश्चिम की संस्कृति प्रतिस्पर्धा पर टिकी है। प्रतिस्पर्धा एक सीमा के बाद ईर्ष्या को जन्म देती है और ईर्ष्या के कारण हम अपने प्रतिस्पर्धी को समाप्त करने का विचार करने लगते है जो गलत है। आज अमेरिका विश्व में जिस प्रकार का व्यवहार कर रहा है समझ सकते हैं।
स्वामी जी ने भारत के लोगों से कहा हंस बनो जिस प्रकार हंस दूध व पानी को अलग करने की क्षमता रखता है उसी प्रकार अच्छे और बुरे का चयन करना विवेकपूर्ण ज्ञान है। इस ज्ञान के आधार पर ही हम विचार करें कि कैसा देखें, कैसा सुनें। जैसे दूषित भोजन करने से शरीर रोगी हो जाता है, उसी प्रकार जैसा हम देखते व सुनते हैं हमारा मन भी उसी प्रकार के आचार-विचार को ग्रहण करता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि तुम्हें पश्चिम की भोगवादी संरकृति में न पड़कर अपनी बुद्धि से सही और गलत को पहचानना चाहिए। कोई व्यक्ति बिना त्याग किये केवल भोग विलास में पल कर, गुलाब की शैय्या पर आराम करते कभी एक आसू भी बहाए बिना महान नहीं बनता है । आज युवाओं को त्याग की आवश्यकता है और त्याग आत्मबल से प्राप्त होता है। इसलिए अपने को पहचानों और अपने आत्मबल को बढ़ाओ।
सेवा कार्य से ही सामाजिक उत्थान
स्वामी जी का मानना था कि युवाओं में सेवा भावना उत्पन्न करने की आवश्यकता है तथा सेवाभावी व्यक्ति के लिए मानव कल्याण की कामना हृदय में होती है। किसी भी समाज के उत्थान का विचार करने वाले व्यक्ति के तीन लक्षण हैं सहानुभूति, श्रद्धा व वैराग्य इसमें सहानुभूति का सम्बन्ध हृदय से होता है। बुद्धि तो केवल उसके मार्ग को सुगम करती है। समाज की कुरीतियां, दरिद्रता, दुदर्शा व अज्ञान को देखने में ह्रदय के सहायक भावना व प्रेम ही होते हैं। स्वामी जी इसका उदाहरण देते थे। जापान की गुड़िया बहुत प्रसिद्ध है, क्योंकि जापान की लड़कियों का विश्वास है कि पूरे हृदय से गुड़िया को प्रेम किया जाए तो उसमें प्राण आ जाते हैं। इसी प्रकार अगर भारतवासी अपने देश व समाज को इदय से स्नेह करें तो भारत पुनः उठखड़ा होगा ऐसा तभी होगा जब भारत के युवक व युवतियां भोग विलास मान अपमान को भूलकर अपनी समस्त शक्ति से दरिद्र नारायण की सेवा करने का संकल्प लें। अपने समाज की सेवा करने वाले व्यक्ति को एक माँ व डॉक्टर की भांति सेवा करनी चाहिए जो मरीज की लात खाकर भी कड़वी दवा उसके मुंह में डालते है। हमें केवल अपने मोक्ष के लिए नहीं समाज के मोक्ष के लिए जीने की आवश्यकता है। जैसे युवा दशम गुरू गोविन्द सिंह जी ने समाज के हित को लिए अपने माता-पिता, पुत्र, पत्नी समस्त परिवार का बलिदान दे दिया।
स्वामी जी कहते थे समाज व धर्म के लिए धन नहीं व्यक्ति चाहिए धन को तो मेरे पास आना ही होगा। देश, धर्म व सेवा के काम में लगे निष्ठावान व्यक्ति दिखाई देते हैं तो समाज कभी धन की कमी नहीं होने देगा। स्वामी विवेकानन्द ने केवल भाषण ही नहीं दिए बल्कि समाज के लिए रामकृष्ण मिशन के माध्यम से सेवा कार्य भी खड़े किए, जिसमें निष्ठावान लोग लगे हैं।
भारत के प्रति स्नेह
स्वामी विवेकानन्द ने भारत को जानने के लिए कई बार भारत का भ्रमण किया। भारत मे छुआछूत, दरिद्रता व अज्ञानता के कारण देश की इस दुर्दशा को देख स्वामी जी का मन रो उठा। भारत की यात्रा करते हुए जब वे कन्या कुमारी पहुंचे तो वहां उफनते समुद्र को पार कर टापू पर जा पहुंचे और मां पार्वती के मन्दिर के सामने ध्यान मुद्रा में बैठ गए, जहां उन्होंने भारत माता का साक्षात्कार किया और भारत उत्थान का संकल्प लिया।
स्वामी जी कहते थे जिस प्रकार प्रकार स्वस्थ्य शरीर में हजारों जीवाणु प्रवेश करने के बाद भी हमार शरीर रोगग्रस्त नहीं होता परन्तु शरीर कमजोर होने पर वे जीवाणु शरीर को रोगी बना देते हैं। उसी प्रकार जब राष्ट्र जीवन कमजोर होता है तो रोग के कीटाणु राष्ट्र की राजनीति, समाज, शिक्षा और बुद्धि को रोग ग्रस्त कर लेते हैं। इसलिए एक राष्ट्रभाव को पैदा कर संगठित रहने से कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा ।
अपने देश से उनका इतना लगाव था कि जब वे अपनी विदेश यात्रा से लौटकर आ रहे थे तो जहाज के किनारे पर आने से पूर्व जहाज के डेक पर खड़े होकर दोनों हाथ उठाकर भारत माता के आलिंगन की मुद्रा में खड़े हो गए और जैसे ही जहाज किनारे पर लगा स्वामी जी मिट्टी में लोट-पोट हो गए और कहने लगे कि आज में ऐसे अनुभव कर रहा हूं जैसे कोई शिशु अपनी माता की गोद आकर आनन्दित होता है।
भारत का पुनरूत्थान
प्रत्येक राष्ट्र का एक राष्ट्रीय जीवन उदेश्य है, भारत के जीवन का केन्द्र धार्मिक जीवन है। जब राष्ट्र अपने उद्देश्य से विमुख होता है तो यह राष्ट्र मृत हो जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि अगर तुम अपने देश का उत्थान चाहते हो तो अपने समाज को जगाने के लिए सब क्षेत्र में अग्नि की लपटें बनकर घुस जाओं, अपनी त्रुटियों से मत घबराओं, अपना ध्येय सामने रखो सफलता अवश्य प्राप्त होगी। पुरुषार्थी बनो जैसे उफनती नदी के साथ तो मुर्दे भी बहते हैं, धारा के विपरीत तैरना ही पुरुषार्थ है। इसलिए उन्होंने मंत्र दिया “उतिष्ठतः जागृतः प्राप्य वरान्निबोधत” अर्थात उठो जागो, और जब तक लक्ष्य प्राप्त न कर लो, कहीं मत ठहरो।
उन्होंने कहा फुटबाल खेलों, कबड्डी खेलो, बलवान बनों, निर्बल रहकर गीता का ज्ञान प्राप्त नहीं होगा और न ही किसी को समझा पाओगे । शारीरिक बल, सामर्थ्य एवं शक्ति के द्वारा गीता का ज्ञान सरल, सुलभ एवं सहज हो जाता है। इस भारत भूमि में जिस किसी स्त्री या पुरुष का जन्म होता है तो उसके जन्म लेने का कारण भी होता है, तुम्हें उस कारण का पता लगाकर उसके लिए सर्वस्व अर्पण करना है। तुम यह विचार मत करो लोग क्या कहेंगे क्योंकि किसी भी कार्य को उपहासा, विरोध और अन्त में स्वीकृति इन तीन अवस्थाओं से मुजरना ही पढ़ता है। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार सन् 2011 के बाद का समय मारत के भाग्योदय का समय है।
आज विश्व अशांति असमंजस की स्थिति में दोराहे पर खड़ा है और भारत की ओर निहार रहा है। आज उनके दिवस पर हमें स्वामी विवेकानंद के संदेश को आत्मसात कर अपनी आत्मग्लानि से उभर कर राष्ट्र के स्वाभिमान को जगा कर अपनी क्रियाशीलता व आत्मविश्वास से खड़े होकर संसार को भारत माता का संदेश सुनाने की। हम उन सौभाग्यशाली लोगों में से है जिन्होंने विश्व के रूस जैसे साम्राज्य को खंडित और जर्मनी को एकीकृत होते भारत में विश्व को लोकतांत्रिक समरस गणराज्य के प्रणेता राम के मन्दिर का निर्माण होते इन्हीं आंखों से देखा है।
याद रहे विश्व को शांति का संदेश भारत ही देगा अर्थात एक अखंडित भारत देगा अनुपम विमल प्रकाश।





