कमलेश पासवान
भारतीय इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन नायकों की भी कहानी है, जिन्होंने वंचित और हाशिए पर खड़े समाज को स्वाभिमान, साहस और नेतृत्व की राह दिखाई। 12वीं सदी के शासक महाराजा बिजली पासी ऐसे महान योद्धा, कुशल प्रशासक और सामाजिक समानता के प्रतीक थे जिनकी स्मृति आज भी पासी समाज में ही नहीं, बल्कि समूचे दलित और वंचित समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
जब हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 25 दिसंबर को महाराजा बिजली पासी की जन्मजयंती के अवसर पर उन्हें राष्ट्रीय मंच से याद किया, तो यह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व का औपचारिक स्मरण नहीं था बल्कि यह लंबे समय तक उपेक्षित रही विरासत को राष्ट्र की सामूहिक चेतना से जोड़ने और भारत की सभ्यात्मक यात्रा में वंचित समुदायों की केंद्रीय भूमिका को पुनः पुष्टि करने का एक सशक्त प्रयास था।
25 दिसंबर का दिन अपने आप में गहरी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व रखता है। विभिन्न संस्कृतियों में इस दिन का जन्म विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, जो नवीनीकरण, आशा और स्थायी नैतिक मूल्यों का प्रतीक है। इसी दिन भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी और महान महाराजा बिजली पासी की जयंती भी होती है। इस अवसर पर महाराजा बिजली पासी को याद करना यह संदेश देता है कि भारत की राष्ट्रीय स्मृति में महानता जाति, वर्ग या विचारधारा की सीमाओं में नहीं बंधी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने महाराजा बिजली पासी जी को याद करते हुए कहा कि “महाराजा बिजली पासी ने वीरता, सुशासन और समावेश की जो विरासत छोड़ी, उसे पासी समाज ने गौरव के साथ आगे बढ़ाया है”, उनका यह कथन सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्र निर्माण की भावना को और मजबूत करता है।
महाराजा बिजली पासी 12वीं सदी में अवध क्षेत्र के शक्तिशाली शासक थे। उनका शासन वर्तमान लखनऊ और आसपास के बड़े भूभाग में फैला था। उनके द्वारा निर्मित बारह किलों में बिजनौरगढ़ और नथवागढ़ प्रमुख हैं। लखनऊ स्थित महाराजा बिजली पासी का किला आज भी उनके गौरवशाली अतीत का साक्षी है। वे पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज के राजा जयचंद के समकालीन थे, जो उनके राजनीतिक और सैन्य महत्व को दर्शाता है।
सन 1194 में गांजर-भांगर के भीषण युद्ध में उनकी भागीदारी और आल्हा-ऊदल के साले जोगा-भोगा का वध, पासी समाज के शौर्य और पराक्रम का प्रतीक बन गया। यह केवल युद्ध विजय नहीं थी, बल्कि उस समय के सामाजिक ढांचे में वंचित माने जाने वाले समाज की शक्ति, संगठन और नेतृत्व क्षमता का उद्घोष था। पिता नथावन देव और माता बिजना के घर जन्मे महाराजा बिजली पासी ने अपने जीवन में न केवल युद्ध जीते, बल्कि अपने समाज को आत्मसम्मान के साथ खड़ा होने की प्रेरणा दी।
भले ही इतिहास की मुख्यधारा में उनकी वीरगाथाओं को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे, लेकिन लोककथाओं, सामाजिक स्मृति और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कहानियों में महाराजा बिजली पासी जीवित रहे। यही कारण है कि दलित और वंचित समाज के लिए वह केवल अतीत के राजा नहीं, बल्कि स्वाभिमान और संघर्ष के शाश्वत प्रतीक हैं।
वर्ष 2000 का समय ऐतिहासिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जब हमारे प्ररेणास्रोत एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने महाराजा बिजली पासी के सम्मान में डाक टिकट जारी किया। यह दर्शाता है कि वाजपेयी जी की दृष्टि में राष्ट्र निर्माण का अर्थ केवल वर्तमान नहीं, बल्कि इतिहास के उन अध्यायों का सम्मान करना भी है जिन्हें लंबे समय तक अनदेखा किया गया। उन्नाव के बांगरमऊ में उनके नाम पर स्मारक द्वार और उनके किले को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग, इसी ऐतिहासिक चेतना को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आज जिस समावेशी विकास की बात होती है, उसमें महाराजा बिजली पासी के सिद्धांतों की स्पष्ट झलक मिलती है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान भारत, स्टैंड-अप इंडिया और पीएम विश्वकर्मा योजना, सभी का मूल उद्देश्य वंचित, गरीब और पिछड़े वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ना है। महाराजा बिजली पासी ने जिस सामाजिक समानता और स्वाभिमान के लिए संघर्ष किया, वही भावना आज सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास में परिलक्षित होती है।
प्रधानमंत्री मोदी जी का महाराजा बिजली पासी को मंच से याद करना केवल अतीत का सम्मान ही नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी तय करता है। यह संदेश देता है कि भारत की विकास यात्रा में वंचित समाज की भूमिका केंद्रीय है। यह सामाजिक न्याय को केवल नारे से निकालकर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास है।
अंततः महाराजा बिजली पासी केवल एक योद्धा या राजा ही नहीं थे; वह एक राष्ट्रवादी विचार और स्वाभिमान का प्रतीक थे। वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वंचित समाज के महान योद्धाओं को सम्मान दिया जाना यह दर्शाता है कि भारत अब अपने इतिहास को नए दृष्टिकोण से देख रहा है। इस दृष्टिकोण में अतीत की उपेक्षित आवाज़ें भविष्य की प्रेरणा बनती हैं। यही महाराजा बिजली पासी की सच्ची और स्थायी विरासत है।
वर्तमान परिदृश्य में महाराजा बिजली पासी के जीवन और उनके योगदान को शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करना, उनके ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण करना और भारत की सांस्कृतिक एवं पर्यटन व्यवस्था के अंतर्गत उनका प्रचार-प्रसार करना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे प्रयासों से न केवल पासी समाज, बल्कि पूरी युवा पीढ़ी को भारतीय इतिहास की अधिक समावेशी, संतुलित और सशक्त समझ प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। पूरा देश अपने इतिहास की समावेशी और सशक्त तस्वीर को समझ सकेगा।
(लेखक केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री हैं)





