दिलीप कुमार पाठक
इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें केवल घटनाओं का ब्यौरा नहीं, बल्कि एक गहरे सवाल की तरह दर्ज होती हैं। आज ही के दिन वर्ष 1929 की वह सुबह, जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम के साथ पर्चे फेंके थे, तो उनका उद्देश्य हिंसा नहीं बल्कि एक मूक और बहरी सत्ता को लोक-हित की आवाज़ सुनाना था। आज दशकों बाद जब हम अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं के बदलते स्वरूप को देखते हैं, तो एक टीस उठती है कि क्या व्यवस्था की सुनने की क्षमता समय के साथ फिर से कम हो गई है? वह धमाका बहरों को जगाने के लिए था, लेकिन आज की राजनीति के शोर में एक आम नागरिक की संयमित और तर्कपूर्ण आवाज़ कहीं खोती नज़र आती है। लोकतंत्र की बुनियाद उसकी संस्थाओं की निष्पक्षता और उनकी स्वायत्तता पर टिकी होती है। जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर जनता के बीच संशय उत्पन्न होने लगे, तो यह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। एक निष्पक्ष निर्णायक की भूमिका तब संदिग्ध लगने लगती है जब उसके निर्णय एकपक्षीय झुकाव का संकेत देने लगें। क्या हमारी संस्थाएं आज भी उसी संप्रभुता के साथ कार्य कर रही हैं जिसका संकल्प हमारे संविधान निर्माताओं ने लिया था? जब रसूखदारों के लिए नियमों की व्याख्या लचीली हो और एक साधारण नागरिक के लिए प्रक्रियाएं अवरोध बन जाएं, तो यह विसंगति व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
प्रशासनिक त्रुटियों या इरादतन चूकों का उदाहरण देखना हो तो पश्चिम बंगाल के उस सेवानिवृत्त न्यायाधीश का मामला दृष्टव्य है, जिनका नाम पर्याप्त दस्तावेजों के बावजूद मतदाता सूची से विलुप्त कर दिया गया। यदि न्याय की रक्षा करने वाले एक पूर्व जज को अपने लोकतांत्रिक अधिकार की पहचान के लिए संघर्ष करना पड़े, तो एक सामान्य नागरिक की विवशता का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है। क्या यह महज़ एक तकनीकी चूक है या किसी विशेष प्रक्रिया का हिस्सा? जब मैदान के रक्षक ही किसी एक पक्ष के प्रति उदार होने लगें, तो खेल की शुचिता का बना रहना कठिन हो जाता है। पारदर्शिता विज्ञापनों का विषय नहीं, बल्कि धरातल पर महसूस की जाने वाली सच्चाई होनी चाहिए। आज के डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समक्ष नई और जटिल चुनौतियां उभरकर आई हैं। सत्ता की आलोचना करने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स को तकनीकी नियमों की आड़ में प्रतिबंधित करना, संवाद की उस स्वस्थ परंपरा के विपरीत है जिसने हमारे लोकतंत्र को सींचा है। संवाद के रास्ते बंद करना उसी बहरेपन की पुनरावृत्ति है जिसे तोड़ने के लिए कभी क्रांतिकारी युवाओं ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था। लोकतंत्र में असहमति को शत्रुता का पर्याय मान लेना एक बड़ी भूल है; इसे तो सुधार के एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। जब सत्ता आलोचना को सुनने का धैर्य खोने लगती है, तो यह शासन तंत्र में सुधार की तत्काल आवश्यकता की ओर संकेत करता है।
सामाजिक संवेदनहीनता का यह बढ़ता प्रभाव हमारे सामूहिक ताने-बाने के लिए घातक है। रसूखदारों के लिए व्यवस्था के द्वार सदैव सुलभ हैं, परंतु एक लाचार नागरिक के लिए आज भी सरकारी तंत्र की जटिलताओं को पार करना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। जिस सदन में कभी जन-सरोकारों की गूँज होती थी, आज वहाँ बुनियादी मुद्दे अक्सर राजनीतिक विमर्श और चुनावी जुमलों के शोर में दब जाते हैं। जब हम नागरिक अधिकारों और संस्थागत जवाबदेही के बीच बढ़ती इस खाई को देखते हैं, तो महसूस होता है कि भौतिक विकास की दौड़ में मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्य कहीं पीछे छूट रहे हैं।
आज यही सीख लेने की आवश्यकता है कि लोकतंत्र केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि निरंतर निभाई जाने वाली एक ज़िम्मेदारी है। उन क्रांतिकारियों का त्याग एक ऐसे न्यायपूर्ण भारत की कल्पना था जहाँ हर नागरिक का आत्मसम्मान एवं अधिकार सुरक्षित हों और उसकी आवाज़ को सुना जाए। आज जब हमारी संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं, तब उस ऐतिहासिक घटना को एक सबक की तरह लेने की आवश्यकता है। लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है, यह संस्थाओं की गरिमा और नागरिक अधिकारों की निर्बाध सुरक्षा का नाम भी है। व्यवस्था के प्रति सच्ची निष्ठा तभी सिद्ध होगी जब सवाल पूछने की स्वतंत्रता और जवाब देने की ईमानदारी, दोनों ही हमारे लोकतंत्र की अनिवार्य पहचान बनी रहें।





