राजस्थान के माही बाँध के बेक वॉटर क्षेत्र में केरल के बेकवॉटर जैसे पर्यटन की अपार संभावनाएं

The backwater area of ​​Mahi Dam in Rajasthan has immense tourism potential like the backwaters of Kerala

माही बाँध का बैकवॉटर क्षेत्र राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर एक नई क्रांति ला सकता है !!

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थान के दक्षिणी अंचल में बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से निकट स्थित माही बाँध का बैकवॉटर क्षेत्र इन दिनों पर्यटन की नई संभावनाओं के केंद्र के रूप में उभर रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य, शांत जलराशि और छोटे-बड़े द्वीपों की श्रृंखला इस क्षेत्र को केरल के प्रसिद्ध केरल बैकवॉटर जैसी अनुभूति प्रदान करती है। यदि यहां सुनियोजित तरीके से पर्यटन का विकास किया जाए, तो मध्य प्रदेश से सटा आदिवासी अंचल बांसवाड़ा का यह इलाका “राजस्थान का मिनी केरल” बन सकता है।

बांसवाड़ा को सौ द्वीपों का शहर कहा जाता है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय हरिदेव जोशी के प्रयासों सेक्समाही नदी पर बने विशाल बांध के जलाशय में अनेक द्वीप उभर आए हैं, जो इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाते हैं। मानसून और सर्दियों के मौसम में जब यहां पानी का उफानअपने चरम पर होता है और चारों ओर हरियाली फैल जाती है, तब यहां का दृश्य किसी भी पर्यटक को बरबस अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त क्षमता रखता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र की तुलना केरल के अलेप्पी बैकवॉटर से की जाने लगी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहां हाउसबोट और पर्यटन की शुरुआत की जाए, तो यह क्षेत्र देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। केरल की तर्ज पर जल में तैरते लक्ज़री हाउसबोट, जिनमें पर्यटक ठहर सकें और स्थानीय व्यंजनों का आनंद ले सकें,तब ये एक नया अनुभव प्रदान करेंगे। इसके अलावा, द्वीपों पर इको-फ्रेंडली रिसॉर्ट्स विकसित कर आइलैंड टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकता है। यह न केवल पर्यटन को बढ़ाएगा, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगा। फिलहाल यहां सैम्पल के रूप में चाचाकोटा नामक एक स्थल को विकसित किया गया हैं।

वाटर स्पोर्ट्स की दृष्टि से भी यह क्षेत्र काफी संभावनाशील है। कयाकिंग, बोटिंग, जेट-स्की और सनसेट क्रूज़ जैसी गतिविधियां पर्यटकों को आकर्षित कर सकती हैं। साथ ही, बांसवाड़ा क्षेत्र की भील जनजाति की समृद्ध संस्कृति, लोकनृत्य और हस्तशिल्प को पर्यटन से जोड़कर “इको-कल्चरल टूरिज्म” का मॉडल विकसित किया जा सकता है। इससे न केवल सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण होगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

भौगोलिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र पर्यटन विकास के लिए अनुकूल है। दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा, उदयपुर सलुम्बर और डूंगरपुर जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों के निकट होने के कारण यहां ट्राइबल टूरिज्म सर्किट भी विकसित किया जा सकता है। देश विदेश से झीलों की नगरी उदयपुर आने वाले पर्यटकों को बांसवाड़ा के माही बैकवॉटर तक आकर्षित करना अपेक्षाकृत आसान है। हालांकि, इन अपार संभावनाओं के बावजूद यहां कुछ चुनौतियां भी सामने हैं। क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का अभाव, बेहतर सड़क संपर्क की कमी, होटल और अन्य पर्यटन सुविधाओं का सीमित विकास प्रमुख बाधाएं हैं। इसके अलावा, अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका भी बनी रहती है। इसलिए विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा। पर्यटन विशेषज्ञों का सुझाव है कि राज्य सरकार को माही बैकवॉटर टूरिज्म के नाम से एक विशेष योजना बनानी चाहिए। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत निवेश को आकर्षित कर हाउसबोट, रिसॉर्ट और वाटर स्पोर्ट्स जैसी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। साथ ही, इस क्षेत्र की ब्रांडिंग राजस्थान का केरल के रूप में की जाए, तो यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है।अंततः कहा जा सकता है कि माही बाँध का बैकवॉटर क्षेत्र राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर एक नई क्रांति ला सकता है। जरूरत है तो केवल दूरदर्शी योजना, मजबूत निवेश और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण की। यदि यह सब सुनिश्चित किया जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब बांसवाड़ा भी केरल की तरह जल पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा।

राज्य सरकार ने किए प्रयास शुरू

इधर राजस्थान सरकार ने भी इसके लिए अपने प्रयास शुरू कर दिए है। यदि ये सफल होते है तो चंबल के बाद प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा माही बांध जल्द ही टूरिस्ट स्पॉट के रूप में जाना जाएगा और कई किलोमीटर में पर्यटन एवं वाटर एक्टिविटी दिखाई देगी । इससे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा। इस प्रोजेक्ट के लिए सरकारी एवं निजी भूमि का इस्तेमाल कैसे होगा। किस तरह पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और योजना के तहत क्या-क्या काम होंगे। इसकी रुपरेखा तैयार करनी भोगी। बताया जा रहा है कि प्रदेश के बड़े बांधों पर आईलैंड और बांध से जुड़ी अन्य उपयोगी भूमि पर पर्यटन के बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा एक बड़ी योजना तैयार की जा रही है, ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ सकें और देशी-विदेशी पर्यटकों को पुर दक्षिणी राजस्थान के सभी जिले और बांध से जोड़ा जा सके। इसके तहत सबसे पहले माही बांध की योजना तैयार की गई है। माही बांध डूब क्षेत्र विकास योजना का खाका तैयार कर उदयपुर संभागीय आयुक्त की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति गठित हो चुकी है। कई विभागों को शामिल करते हुए तय किया गया कि किसे क्या करना होगा। माना जा रहा है कि सालभर के भीतर पर्यटन की दृष्टि से माही बांध पर विकास के काम शुरू हो जायेगे। इसके अंतर्गत माही बांध के आईलैंड/डूब क्षेत्र/डूब क्षेत्र से लगती निजी खातेदारी भूमि का भू उपयोग निर्धारण करवाया जाएगा। माही बांध के डूब क्षेत्र विकास योजना के तहत स्थिति राजकीय भूमि के बेचान पर दिए जाने से पहले भूमि का डिमार्केशन/साइट प्लान/लोकेशन प्लान तैयार करवाया जाएगा। राजकीय भूमि को वाणिज्यिक उपयोग के तहत एक नीति एवं प्रणाली निर्धारित करवाई जाएगी। योजना के तहत आने वाली तमान राजकीय एवं निजी भूमि का भू उपयोग सुनिश्चित करवाया जाएगा। राजकीय भूमि एवं निजी खातेदारी भूमि पर वाटर स्पोर्ट्स और पर्यटन एक्टिविटी के अलावा अन्य गतिविधियों के संचालन-नियंत्रण और लाइसेंस के लिए प्रक्रिया का निर्धारण करवाया जाएगा।

इसके साथ ही वाटर स्पोर्ट्स/ पर्यटन एक्टिविटी के अलावा अन्य गतिविधियों के संचालन के लिए नियमों एवं दिशा-निर्देशों का निर्धारण करवाया जाएगा। भूमि के बेचान/लीज के लिए वाटर स्पोर्ट्स और पर्यटन एक्टिविटी के अलावा अन्य गतिविधियों के लिए सरकार, न्यायालय, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) और अन्य वैधानिक निकाय द्वारा समय-समय पर जारी आदेश, परिपत्र, अधिसूचना तथा दिशा-निर्देशों की पालना सुनिश्चित करवाई जाएगी। पर्यटन के सफल संचालन के लिए लगातार मॉनिटरिंग होगी। योजना के तहत पर्यावरण संरक्षण को भी सुनिश्चित कराया जाएगा और माही बांध में किसी प्रकार के अपशिष्ट पदार्थ का प्रवाह नहीं हो यह सुनिश्चित कराया जाएगा।बताया जा रहा है कि राज्य सरकार की पहल पर माही बांध डूब क्षेत्र विकास की एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की जा रही है, जिससे तहत माही बांध के आईलैंड/डूब क्षेत्र/डूब क्षेत्र से लगती अन्य उपयोगी सरकारी एवं निजी भूमि पर्यटन और वाटर एक्टिविटी विकसित की जाएंगी।

दक्षिणी राजस्थान में उदयपुर अंचल की झीलों पिछोला,स्वरूप सागर,फतह सागर, उदय सागर, राजसमंद,जय समन्द,डूंगरपुर के गेब सागर के साथ ही निकटवर्ती चित्तौड़गढ़ के रावतभाटा, कोटा के चम्बल रिवर फ्रंट तथा पाली जिले के जवाई बांध लेपर्ड क्षेत्र आदि में पर्यटन गतिविधियों की सफलता इस संभावनाओं को बढ़ाती है। डूंगरपुर,बांसवाड़ा और सलूंबर जिलों के संगम पर स्थित बेणेश्वर धाम त्रिवेणी संगम धार्मिक पर्यटन के लिए पहले ही मशहूर है। माही बांध और जय समन्द झील का विशाल क्षेत्रफल जनजाति क्षेत्र में मत्स्य पालन आदि गतिविधियों का केंद्र भी बन सकता है। इस अंचल में पर्यटन के साथ मत्स्य पालन की सहकारी समितियां चल गई तो इस पूरे ट्राइबल अंचल से युवाओं का रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों में पलायन भी रुक सकता है। साथ ही इस क्षेत्र में कथित असामाजिक गतिविधियों पर भी अंकुश लग सकता है।

देखना है माही बांध के बेक वस्त्र की यह महत्वाकांक्षी परियोजना कितनी जल्दी अमली जामा पहनेगी? देखने वाली बात यह रहेगी कि यदि माही पर पर्यटन प्रोजेक्ट के बेहतर परिणाम सामने आते हैं तो प्रदेश के अन्य बड़े बांधों पर भी ऐसी ही गतिविधियां दिखाई देगी। माही बांध के बेक वॉटर क्षेत्र में बांसवाड़ा- रतलाम (मध्य प्रदेश) के मध्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही राजस्थान के दूसरे परमाणु बिजली घर का शिलान्यास किया है जिससे इस आदिवासी अंचल में रोजगार एवं विकास की नई बहार आने वाली है। विशेष कर रेल सुविधा से वंचित बांसवाड़ा में शीघ्र ही रेल आने की उम्मीद है।