भारतीय विदेश नीति के परिवर्तित ‘न्यू सिद्धांत’

The changed 'New Doctrine' of Indian Foreign Policy

प्रो. नीलम महाजन सिंह

21वीं सदी में भारत की विदेश नीति बुनियादी मूल्यों पर आधारित है, लेकिन नई दिल्ली को बदलते बाह्य हालात व घरेलू ज़रूरतों के हिसाब-किताब में खुद को ढालना होगा। आने वाले सालों में भारत की विदेश नीति के सामने पाँच अहम चुनौतियाँ हैं; दक्षिण-एशियाई उपमहाद्वीप में शांति व खुशहाली का माहौल; एशिया में शांति व सहयोग के लिए एक स्थिर ढाँचा बनाना; एशिया के समुद्री रास्तों का शांतिपूर्ण मैनेजमेंट; एक ‘नया अंतर्राष्ट्रीयवाद’ जो ग्लोबल इकॉनमी के साथ बढ़ते जुड़ाव से बनेगा, ग्लोबल समस्याओं का असरदार मैनेजमेंट; व अपने लोकतांत्रिक मूल्यों का जश्न मनाने के बीच एक स्पष्ट लाइन खींचना। इस समीक्षा के टाइटल में ‘नया’ शब्द हाल के सालों में भारत की विदेश नीति के नज़रिए में हुए बड़े बदलावों को दिखाता है; जब से 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है? क्या यह कांग्रेसी नेहरूवादी विदेश नीति की निरंतरता है या लक्ष्य में कोई बदलाव हुआ है? दुनिया के साथ हाल के ग्लोबल घटनाक्रमों ने भारत की विदेश नीति को मुश्किल में डाल दिया है और पॉलिसी बनाने वालों को डिप्लोमेसी व कूटनीतिक ओवरव्यू लेना होगा। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ही भारत का नज़रिया पेश करने में अग्रिम हैं। डॉ. एस. जयशंकर, आई.एफ.एस. एक करियर डिप्लोमैट हैं और वे चीन और अमेरिका दोनों में, भारत के राजदूत रह चुके हैं। फ़िर भारत-अमेरिका व भारत-चीन के रिश्ते इतने खराब क्यों हैं? पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने हाल ही में सरकार से भारत के अमेरिका व चीन के साथ संबंधों पर स्पष्टता और पुष्टि देने के लिए सवाल किये हैं। नई दिल्ली में फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया में एक कार्यक्रम में, सलमान खुर्शीद और सलिल शेट्टी द्वारा संपादित पुस्तक, रीथिंकिंग इंडिया: इंडिया’ज़ ट्रायसट विद दी वर्ल्ड’ (Rethinking India: India’s Tryst With The World) रिलीज़ की गई, व पत्रकारों और मौजूद सहभागियों के साथ ‘भारतीय विदेश नीति के बदलते नज़रिए’ पर एक इंटरैक्टिव सेशन हुआ। डॉ. वाएल आवाद, अध्यक्ष, डॉ. प्रकाश नंदा, सचिव और पी. एम. नारायणन, कोषाध्यक्ष ने लाइव बातचीत की। सलमान खुर्शीद ने कहा कि ‘गुटनिरपेक्षता’ की धारणा भारत के विदेश मामलों पर घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय चर्चा को आज भी प्रभावित करती है। सलमान खुर्शीद ने कहा कि ‘साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन’ (SAARC) एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय अंतर-सरकारी संगठन था और इसने दक्षिण एशियाई देशों के भू-राजनीतिक संघ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि के साथ भारत के संबंधों की कहानी में बदलाव आया है। बांग्लादेश और नेपाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण हिंसा, नरसंहार और सत्ता परिवर्तन हुए हैं। लगातार सीमा विवादों के कारण चीन के साथ भारत के संबंधों में गिरावट आई है और वे अब तक के सबसे निचले स्तर पर हैं। इसके चलते डॉ. एस. जयशंकर ने बीजिंग के साथ कई डिप्लोमैटिक पहल की हैं। यह पी.एम. डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था जब भारत ने अमेरिका के साथ ‘न्यूक्लियर (सिविल) डील’ को हस्ताक्षरित किया। इससे भारत-अमेरिका संबंधों में विश्वास बढ़ा। हालांकि ‘मोदी-ट्रम्प दोस्ती’ काफी चर्चा में थी, फिर भी डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात पर 50% ड्यूटी लगा दी। पेट्रोलियम-आधारित उत्पादों पर भारी ड्यूटी लगाने से भारत-अमेरिका संबंधों में गिरावट आई। पहलगाम में 36 लोगों के आतंकी नरसंहार, भारत द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पाकिस्तान के अस्वीकार के बाद, दोनों पड़ोसियों के बीच संबंध बहुत खराब हो गए हैं। हालांकि दुनिया में भारत की अपनी छवि व भूमिका बदल गई है। शीतयुद्ध के दौरान, भारत धीरे-धीरे सोवियत संघ की ओर झुक गया व बाकी सभी प्रमुख शक्ति केंद्रों, अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, चीन और जापान के साथ उसके संबंध स्थिर रहे।1960 के दशक से 1980 तक चीन के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों में लंबे समय तक आई ठंडक के बाद, बीजिंग अब सामान के मामले में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जबकि वह यूरोपीय संघ और जापान के साथ रणनीतिक साझेदारी भी बना रहा है। भारत ने सोवियत संघ के बाद के रूस के साथ अपने विशेष संबंधों को बनाए रखा है। रूस से पेट्रोलियम-आधारित उत्पादों के आयात के कारण, अमेरिका बहुत नाराज़ है। भारत को घरेलू अर्थव्यवस्था बचाने के लिए एक फैसला लेना पड़ा और व्लादिमीर पुतिन के रूस, पुराना दोस्त भारत के साथ खड़ा रहा। समीक्षार्थ यह कहा जा सकता है कि जहां ‘बदलाव’ समय का चलन रहा है, वहीं भारत जैसे देशों की विदेश नीतियां सदेव मुख्य मूल्यों पर आधारित होती हैं। ‘अंतर्राष्ट्रीयता’ (Internationalism) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता, बाह्य संबंधों के संचालन में निर्णय की स्वतंत्रता, विश्व लोकतंत्रीकरण के लिए समर्थन व अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में योगदान; भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की स्थायी विरासत हैं और इन्हें मज़बूत सर्वदलीय समर्थन प्राप्त है। एशियाई उपमहाद्वीप शांति का क्षेत्र होना चाहिए। भारत के लिए पहली व सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अपने पड़ोसियों के साथ-साथ दुनिया की प्रमुख शक्तियों के साथ मिलकर ‘हिंसक उग्रवाद’ के ज़हर को हराने का दृढ़ संकल्प है, जिसकी जड़ें उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में भी हैं। पी.एम. इंदर कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी व डॉ. मनमोहन सिंह ने लगातार पाकिस्तान के साथ देश के संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास किये। पीएम नरेंद्र मोदी भी ‘आउट ऑफ़ बॉक्स’ कूटनीति के तहत पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की बेटी की शादी में हिस्सा लेने गए थे। नरेंद्र मोदी सरकार को अपने पड़ोसियों के साथ भारत संग रिश्तों को पुन: परिभाषित करना होगा। भारत एकतरफ़ा रूप से उपमहाद्वीप में अपने पड़ोसियों के लिए अपने बाज़ार खोल रहा है, जिससे बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान व मालदीव की आंतरिक स्थिरता और समृद्धि को योगदान मिल रहा है। भारतीय विदेश नीति के परिवर्तित ‘न्यू सिद्धांत’ के अंतर्गत नरेंद्र मोदी सरकार को अपने पड़ोसियों के साथ भारत संग रिश्तों को पुन: परिभाषित करना होगा। भारत एकतरफ़ा रूप से उपमहाद्वीप में अपने पड़ोसियों के लिए अपने बाज़ार खोल रहा है, जिससे बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान व मालदीव की आंतरिक स्थिरता और समृद्धि को योगदान मिल रहा है। भारत की विदेश नीति की दिशा डॉ. एस. जयशंकर, विक्रम मिस्री, आई.एफ.एस., विदेश सचिव को प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ मिलकर तय करनी होगी।

प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका, दूरदर्शन पर्सनैलिटी, अंतर्राष्ट्रीय सामायिक विशेषज्ञ, मानवाधिकार संरक्षण सॉलिसिटर व परोपकारी)