मौन होती पक्षियों की चहचहाहट: विकास की दौड़ में पीछे न छूट जाए प्रकृति का संगीत

The chirping of birds is becoming silent: The music of nature should not be left behind in the race for development

दिलीप कुमार पाठक

प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में पक्षियों की भूमिका अद्वितीय और अपरिहार्य है। हर साल 5 जनवरी को मनाया जाने वाला ‘राष्ट्रीय पक्षी दिवस’ हमें इसी ध्रुव सत्य की याद दिलाता है कि पक्षी केवल सुंदर जीव नहीं, बल्कि हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी हैं। आज जब हम वर्ष 2026 के आधुनिक दौर में खड़े हैं, तो यह दिन केवल पक्षियों की सुंदरता को निहारने का नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व पर मंडराते गंभीर खतरों को समझने का बन गया है। पक्षी बीजों के प्रकीर्णन से लेकर कीट-पतंगों के नियंत्रण तक में जो भूमिका निभाते हैं, उसके बिना जंगलों का विस्तार रुक जाएगा और पूरी कृषि व्यवस्था चरमरा जाएगी। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि कंक्रीट के जंगलों ने इन नन्हें जीवों के घर छीन लिए हैं। ऊँची इमारतों की चकाचौंध और मोबाइल टावरों से निकलने वाले अदृश्य रेडिएशन ने उनके खुले आकाश को एक जहरीले जाल में बदल दिया है। वह समय अब एक धुंधली याद बनता जा रहा है जब घरों के आँगन में गौरैया की चहचहाहट से सुबह हुआ करती थी। हमने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए जो आधुनिक ढांचे तैयार किए, उन्होंने पक्षियों के प्राकृतिक बसेरे उजाड़ दिए।

अगर हम अपना मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि हम सब प्रकृति एवं प्राकृतिक सौंदर्य उजाड़ने, के गुनहगार हैं, हमने पशु पक्षियों के आशियाने उजाड़ दिए हैं l प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण आज कई प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं। विशेष रूप से गिद्ध जैसे प्राकृतिक सफाईकर्मी अब आसमान से लगभग गायब हो चुके हैं, जो पर्यावरण की स्वच्छता के लिए एक बड़ा संकट है।

खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग न केवल मिट्टी को जहरीला बना रहा है, बल्कि पक्षियों के स्वास्थ्य और उनकी प्रजनन क्षमता को भी नष्ट कर रहा है। जलस्रोतों के सूखने और आर्द्रभूमि के सिमटने से हजारों मील की यात्रा कर आने वाले प्रवासी पक्षियों के मार्ग और उनके पड़ाव पूरी तरह बदल गए हैं। तकनीक के इस युग में हमें यह समझना होगा कि पक्षी संरक्षण का अर्थ केवल उन्हें दाना डालना भर नहीं है, बल्कि उनके लिए एक सुरक्षित और प्रदूषण मुक्त वातावरण तैयार करना है। हमें अपने शहरी नियोजन में ‘बर्ड फ्रेंडली’ आर्किटेक्चर को शामिल करना होगा और अधिक से अधिक देशी वृक्ष लगाने होंगे ताकि उन्हें प्राकृतिक आवास मिल सके। पक्षी दिवस हमें याद दिलाता है कि इस धरती पर जितना अधिकार मनुष्यों का है, उतना ही इन मूक प्राणियों का भी है, ऐसा नहीं है कि हम इस प्रकृति को अपनी बपौती मानकर बेजुबान पशु पक्षियों पर क्रूरतापूर्ण अत्याचार करें l

पक्षी ‘बायोलॉजिकल इंडिकेटर’ होते हैं; उनकी घटती संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमारा पर्यावरण अब हमारे लिए भी स्वस्थ नहीं रह गया है। नीले आकाश में निर्भय उड़ते पक्षी स्वतंत्रता और जीवंतता के सबसे सुंदर प्रतीक हैं, जो हमें सीमाओं से परे जाकर सोचने की प्रेरणा देते हैं। यदि हम आज भी प्लास्टिक के उपयोग और शोरगुल वाले प्रदूषण को कम नहीं करते, तो वह दिन दूर नहीं जब पक्षियों का मधुर कलरव केवल डिजिटल रिकॉर्डिंग में ही सुनने को मिलेगा।

‘बर्डमैन ऑफ इंडिया’ सलीम अली जैसे महान व्यक्तित्वों ने जो राह दिखाई थी, उस पर चलते हुए हमें प्रत्येक नागरिक को ‘पक्षी मित्र’ बनाना होगा। स्कूलों में बच्चों को पक्षी दर्शन और उनके महत्व के बारे में शिक्षित करना अनिवार्य है, ताकि नई पीढ़ी में प्रकृति के प्रति संवेदना विकसित हो सके। 5 जनवरी का यह संकल्प केवल एक दिन का औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि एक स्थायी व्यवहार होना चाहिए। नदियों का पुनरुद्धार और जंगलों की रक्षा ही पक्षियों के लिए वास्तविक वरदान साबित होगी। अंततः, हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम प्रकृति के स्वामी नहीं बल्कि उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं। क्षितिज पर उड़ते ये पंख केवल आकाश की शोभा नहीं, बल्कि हमारे जीवित होने का प्रमाण हैं। विकास की ऊँची उड़ान भरते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस दिन परिंदों का कलरव मौन हो जाएगा, उस दिन प्रकृति का संगीत भी थम जाएगा। आइए, हम सब मिलकर उनकी स्वतंत्रता और आवास की रक्षा का संकल्प लें, क्योंकि पक्षियों का सुरक्षित होना ही पृथ्वी के सुंदर भविष्य की पहली शर्त है। जब तक नीला गगन उनकी चहचहाहट से गूंजता रहेगा, जब तक आकाश में पक्षियों के झुंड निर्भय होकर उड़ते रहेंगे, तभी तक यह पृथ्वी रहने योग्य और संतुलित बनी रहेगी। पक्षियों का संरक्षण करना वास्तव में स्वयं के अस्तित्व को बचाने की एक अनिवार्य कवायद है।