डिजिटल दुनिया का अंधेरा पहलू: गाजियाबाद में ऑनलाइन गेमिंग तीन मासूम ज़िंदगियाँ छीनीं

The dark side of the digital world: Online gaming claims three innocent lives in Ghaziabad

सुनील कुमार महला

हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में नाबालिग किशोरियां कोरियन गेम की लत का शिकार हो गई,यह बहुत ही दुखद घटना है।खेल के साथ जिंदगियां भी खत्म हो गईं। दरअसल,ऑनलाइन गेम का टास्क पूरा करने के लिए तीन बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली,यह वास्तव में दिल दहलाने वाली घटना है। पाठकों को बताता चलूं कि गाजियाबाद में टीला मोड़ थाना इलाके में 3 फरवरी 2026 मंगलवार को ऑनलाइन कोरियन गेम ‘लव गेम’ रात का टास्क पूरा करने के लिए भारत सिटी सोसायटी की नौवीं मंजिल से तीन बहनों ने एक साथ छलांग लगाकर खुदकुशी कर ली। इस संबंध में पुलिस को किशोरियों के कमरे से आठ पेज का सुसाइड नोट और एक डायरी मिली है। पुलिस ने दोनों को कब्जे में ले लिया है। तीनों के कमरे की दीवार पर ‘मेक मी ए हार्ट ऑफ ब्रोकन’ लिखा हुआ मिला है। पुलिस ने बताया है कि फ्लैट की बालकानी से रात 2.15 बजे तीन बहनों ने छलांग लगाने की सूचना मिली थी। वास्तव में यह घटना एक ऑनलाइन गेम की लत और उस पर अत्यधिक निर्भरता से जुड़ी है। पुलिस ने यह पाया कि बच्चों को गेम खेलने से रोकने पर वे भावनात्मक रूप से टूट गए थे। बहरहाल,यह पहली बार नहीं है जब ऐसी घटना घटित हुई है।पहले भी ऑनलाइन गेम्स के कारण बच्चों/लोगों की जानें जा चुकी है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में ऑनलाइन गेमिंग (ऑनलाइन वीडियो गेम्स और मोबाइल गेम्स) से जुड़ी लत, तनाव और वित्तीय/मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण कई घटक परिणाम सामने आए हैं, जिनमें कुछ मौतें, आत्महत्याएं और जानलेवा घटनाएँ शामिल हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2016-17 में ऑनलाइन गेम ब्लू व्हेल के कारण लोगों की जान चली गई थी। यह भी एक ऑनलाइन चैलेंज था और इसमें भी टास्क पूरे करने होते थे। वास्तव में कुछ टास्क खतरनाक होते थे, जिसमें लोगों की जान चली जाती थी।इसी प्रकार से साल 2018 में किकी चैलेंज बच्चों की बीच लोकप्रिय हुआ। इस टास्क में लोग कार को धीरे-धीरे चलाते हुए उससे बाहर आते थे और डांस करते थे। इस टास्क में कई लोग घायल हुए। इतना ही नहीं, मोमो चैलेंज भी 2018 में ही वायरल हुआ था। इसमें एक यूजर मोमो बच्चों को परेशान करता है। इसमें भी टास्क पूरा करने के लिए कहा जाता है, जिसमें खुद को नुकसान पहुंचाना भी शामिल था। इसी प्रकार से साल 2019 में मध्य प्रदेश के नीमच में 16 वर्षीय लड़के ने खबरों के अनुसार लगभग 6 घंटे लगातार पब-जी गेम खेलते रहने के बाद कार्डियक अरेस्ट (हार्ट अटैक) से मौत हो गई थी।परिवार के अनुसार वह गेम में इतनी लीन हो गया था कि अचानक स्वास्थ्य बिगड़ गया।‌पुणे में भी एक 27 वर्षीय युवक पब-जी खेलते समय अचानक गिर पड़ा और हृदयाघात/स्ट्रोक से उसकी मौत हुई। डॉक्टरों ने गेम की लत और मानसिक तनाव को एक कारण माना। मोबाइल गेम ‘फ्री-फायर’ की लत के कारण (मध्य प्रदेश) में एक किशोर ने फांसी लगाकर अपनी जान ले ली।इसी प्रकार से इंदौर में एक 13 वर्षीय बच्चे ने ऑनलाइन गेम में हार और पैसे कटने के डर से आत्महत्या की, क्यों कि उसे यह डर था कि माता-पिता इसके लिए उसे डांटेंगे।राजस्थान के श्रीगंगानगर में भी एक युवक ने लूडो/ऑनलाइन गेमिंग में हानि के बाद कर्ज और तनाव के कारण आत्महत्या कर ली।यही नहीं, हाल ही में भोपाल में एक चौदह वर्षीय छात्र ने भी मोबाइल गेमिंग की लत के चलते फांसी लगा ली थी। बहरहाल, यदि हम यहां पर सरल शब्दों में बात करें तो हाल की घटनाएं यह दिखाती हैं कि आज के बच्चे और युवा डिजिटल दुनिया में कितनी गहराई तक फंसते जा रहे हैं। वे एक साथ दो दुनिया में जी रहे हैं-एक असली(वास्तविक) और दूसरी मोबाइल-स्क्रीन वाली आभासी दुनिया या यूं कहें कि वर्चुअल दुनिया। गेम और सोशल मीडिया बुरे नहीं हैं, लेकिन जब यही किसी की पहचान, खुशी और सहारे का एकमात्र जरिया बन जाएं, तो समस्या खड़ी हो जाती है। बहरहाल , मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार तीनों किशोरियां मोबाइल गेम की लत में थीं। पिता के रोकने पर उन्होंने यह कदम उठाया। हाल फिलहाल मामले की गहन जांच जारी है, लेकिन यह साफ है कि परिवार और बच्चों के बीच संवाद की कमी इस तरह की घटनाओं को जन्म देती है। आज कई परिवार या तो बच्चों की डिजिटल आदतों पर ध्यान नहीं देते, या फिर अचानक सख्ती दिखाने लगते हैं-लेकिन दोनों ही तरीके नुकसानदेह हैं। वास्तव में, यह समस्या सिर्फ एक परिवार या एक शहर तक सीमित नहीं है। झाबुआ और भोपाल की घटनाएं भी बताती हैं कि सोशल मीडिया और रील्स की लत रिश्तों और संवेदनाओं पर भारी पड़ रही है। जब रोक-टोक होती है, तो टकराव पैदा होता है, और वही टकराव कभी आत्महत्या तो कभी हिंसा का रूप ले लेता है।असल सवाल यही है कि क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं, जहां मोबाइल की दुनिया इंसानी रिश्तों से ज्यादा ताकतवर हो गई है। इस संकट से बचने का रास्ता सख्ती नहीं, बल्कि समझ, संवाद और संतुलन है-ताकि बच्चे स्क्रीन के नहीं, जीवन के साथ जुड़े रहें। दूसरे शब्दों में कहें तो ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती लत पर नियंत्रण के लिए माता-पिता और सरकार दोनों की अहम भूमिका है।माता-पिता को यह चाहिए कि वे अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें और मोबाइल-इंटरनेट के उपयोग पर निगरानी रखें।घर में खेल-कूद, पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों का ध्यान वैकल्पिक दिशा में मोड़ा जा सकता है।सच तो यह है कि बच्चे मिट्टी के घड़े होते हैं, जिन्हें कुम्हार की तरह सही हाथों से मनचाहा आकार दिया जा सकता है।माता-पिता और शिक्षक उस कुम्हार की भूमिका निभाते हैं, जिनका स्पर्श बच्चों का भविष्य गढ़ता है। वास्तव में सच तो यह है कि जैसी सोच, संस्कार और व्यवहार बच्चों को मिलते हैं, वे वैसे ही ढलते चले जाते हैं।प्रेम और धैर्य से दिया गया मार्गदर्शन उन्हें मजबूत बनाता है।डांट-फटकार की जगह समझ और संवाद उन्हें बेहतर इंसान बनाते हैं।अच्छे मूल्य बच्चों में आत्मविश्वास की नींव रखते हैं।गलत संगति या उपेक्षा उस कच्ची मिट्टी को बिगाड़ सकती है।इसलिए बचपन में दिया गया संस्कार जीवन भर साथ निभाता है।हर बच्चा अनोखा घड़ा है, जिसे अलग समझ की जरूरत होती है।समझदारी भरे हाथों में ही सुंदर और टिकाऊ व्यक्तित्व आकार लेता है। इसलिए इस क्रम में बच्चों से लगातार /सतत संवाद बनाए रखना और उन्हें ऑनलाइन खतरों के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है।सरकार को भी यह चाहिए कि सरकार उम्र-आधारित नियमों के साथ सख्त कानून बनाए। होना तो यह चाहिए कि ऑनलाइन गेम्स में समय और खर्च की सीमा तय हो।स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और काउंसलिंग कार्यक्रम शुरू किए जा् सकते हैं।अवैध और सट्टानुमा गेमिंग ऐप्स पर सख्ती से रोक लगाये जाने की आवश्यकता महत्ती है।