वैश्विक राजनीति और स्थानीय औद्योगिक ढांचे के बीच गहराता टकराव

The deepening conflict between global politics and local industrial structures

अजेश कुमार

गुजरात का मोरबी, जिसे कभी भारत की सिरेमिक राजधानी कहा जाता था, आज एक अजीब खामोशी में डूबा हुआ है। यह वही शहर है, जहां कभी चौबीसों घंटे जलती भट्टियों की तपिश, लगातार दौड़ते ट्रकों की गड़गड़ाहट और मजदूरों की जीवंत हलचल एक औद्योगिक ऊर्जा का प्रतीक हुआ करती थी। सड़कों पर उड़ती धूल, चिमनियों से उठता धुआं और फैक्ट्री शेड्स के भीतर चलती मशीनों का शोर यहां की पहचान था, लेकिन आज वही इलाका सन्नाटे की चादर में लिपटा हुआ है। भट्टियां ठंडी पड़ चुकी हैं, मशीनें थम गई हैं और मजदूरों के क्वार्टर खाली नजर आते हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे वैश्विक राजनीति और स्थानीय औद्योगिक ढांचे के बीच गहराता टकराव है।

दरअसल, हालिया पश्चिम एशियाई तनाव, विशेषकर ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तंत्र को अस्थिर कर दिया है। इसका सीधा असर हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ा, जो दुनिया के तेल और गैस परिवहन का एक अहम मार्ग है। जैसे ही इस मार्ग पर अनिश्चितता बढ़ी, खाड़ी देशों से आने वाली एलएनजी और प्रोपेन गैस की आपूर्ति बाधित होने लगी। यही गैस मोरबी के सिरेमिक उद्योग की जीवनरेखा थी। जैसे ही आपूर्ति रुकी, वैसे ही उत्पादन की धड़कन थम गई।
मोरबी का सिरेमिक उद्योग भारत के औद्योगिक विकास की एक प्रेरक कहानी रहा है। लगभग 60,000 करोड़ रुपये के वार्षिक कारोबार वाला यह उद्योग न केवल देश के हर कोने तक टाइल्स और सैनिटरीवेयर पहुंचाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति रखता है। यहां बनने वाली चमकदार टाइल्स आधुनिक भारत के शहरीकरण और निर्माण क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं, लेकिन इस चमक के पीछे एक गंभीर कमजोरी छिपी हुई थी, ऊर्जा के लिए बाहरी स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता।

यह उद्योग अत्यधिक ऊर्जा-खपत वाला है, जहां उत्पादन लागत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा केवल ईंधन—गैस, बिजली और अन्य ऊर्जा स्रोतों पर खर्च होता है। ऐसे में, जब गैस की आपूर्ति अचानक रुकती है, तो उत्पादन पूरी तरह ठप हो जाना स्वाभाविक है। यही हुआ भी। सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद हो गईं और लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट गहरा गया। यह स्थिति केवल मोरबी की नहीं, बल्कि उन सभी औद्योगिक क्लस्टर्स की कमजोरी को उजागर करती है, जो एकल ऊर्जा स्रोत पर निर्भर हैं।

इस संकट का एक और पहलू भी है, जो हमें घरेलू नीतियों की ओर देखने के लिए मजबूर करता है। वर्ष 2019 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा कोल गैसीफायर प्लांट्स पर प्रतिबंध लगाया गया था। यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से आवश्यक था, क्योंकि इन प्लांट्स से प्रदूषण की गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही थीं, लेकिन इस निर्णय के साथ उद्योग को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर सुचारू रूप से स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं की गई। परिणामस्वरूप, उद्योग पूरी तरह पीएनजी और प्रोपेन गैस पर निर्भर हो गया। जब यही आपूर्ति बाधित हुई, तो उद्योग के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बची।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या पर्यावरणीय नीतियों को लागू करते समय उद्योगों की व्यवहारिक जरूरतों और संक्रमणकालीन चुनौतियों का पर्याप्त ध्यान रखा गया था? क्या स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपाय भी किए गए थे? मोरबी का संकट इन सवालों को और भी प्रासंगिक बना देता है, लेकिन इस पूरे संकट का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक असर मजदूरों पर पड़ा है। यह उद्योग लगभग चार लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है, जिनमें बड़ी संख्या प्रवासी श्रमिकों की है। जैसे ही फैक्ट्रियां बंद हुईं, इन मजदूरों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया। कुछ लोग अपने गांव लौट गए, तो कुछ शहर में रहकर नए काम की तलाश में भटक रहे हैं। जिन मजदूरों की रोज़मर्रा की जिंदगी फैक्ट्री के काम पर निर्भर थी, उनके लिए यह ठहराव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा का भी कारण बन गया है।

यह स्थिति भारत के श्रम ढांचे की कमजोरियों को भी उजागर करती है। हमारे यहां औद्योगिक विकास तो हुआ है, लेकिन श्रमिकों के लिए स्थायी सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित नहीं हो पाया है। न तो उनके पास संकट के समय आय का कोई स्थिर स्रोत है और न ही पर्याप्त सरकारी सुरक्षा कवच। यह असंतुलन लंबे समय में सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है।
मोरबी की मौजूदा स्थिति को केवल एक अस्थायी संकट मान लेना एक बड़ी भूल होगी। यह वास्तव में भारत की औद्योगिक नीति के लिए एक चेतावनी है। ‘मेक इन इंडिया’ और निर्यात-आधारित विकास मॉडल को सफल बनाने के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए एक मजबूत, लचीला और आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता होती है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता और श्रमिकों की सुरक्षा जैसे तत्व शामिल हों।

हालांकि, हर संकट अपने साथ कुछ नए अवसर भी लेकर आता है। मोरबी में भी अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश शुरू हो गई है। कुछ इकाइयां ग्रीन हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ और टिकाऊ ईंधनों पर प्रयोग कर रही हैं। यदि यह प्रयास सफल होते हैं, तो यह न केवल इस उद्योग को ऊर्जा संकट से उबार सकता है, बल्कि भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक बड़ा कदम दिला सकता है। हालांकि, यह एक दीर्घकालिक समाधान है और इसके व्यापक उपयोग में समय लगेगा।

अल्पकालिक स्तर पर सरकार और उद्योग दोनों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे। गैस आपूर्ति के वैकल्पिक मार्ग विकसित करने, रणनीतिक भंडारण बढ़ाने, और संकटग्रस्त उद्योगों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है। साथ ही, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण भी अत्यंत आवश्यक है ताकि भविष्य में किसी एक स्रोत पर निर्भरता से बचा जा सके।

इस संकट से कई महत्वपूर्ण सबक निकलते हैं। पहला, ऊर्जा सुरक्षा को औद्योगिक नीति का केंद्रीय तत्व बनाना होगा। दूसरा, पर्यावरणीय सुधारों को लागू करते समय उद्योगों को पर्याप्त समय और संसाधन दिए जाने चाहिए। तीसरा, श्रमिकों के लिए एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित करना अनिवार्य है, और चौथा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू संसाधनों और तकनीकों को बढ़ावा देना होगा।

अंततः, मोरबी की ठंडी पड़ी भट्टियां केवल एक शहर की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह वैश्वीकरण के युग में स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं की संवेदनशीलता का प्रतीक हैं। यह हमें याद दिलाती हैं कि दुनिया के किसी भी कोने में होने वाला राजनीतिक या आर्थिक घटनाक्रम सीधे हमारे उद्योगों, हमारे श्रमिकों और हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

अब समय आ गया है कि इस संकट को एक चेतावनी के रूप में नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देखा जाए, एक ऐसा अवसर, जो हमें अधिक आत्मनिर्भर, संतुलित और मानवीय औद्योगिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखा सके। जब ऐसा होगा, तभी मोरबी की भट्टियाँ फिर से जलेंगी, और उनके साथ लाखों लोगों की उम्मीदें भी एक बार फिर से प्रज्वलित होंगी।