डॉ विजय गर्ग
आज का समाज एक अजीब बीमारी से ग्रस्त होता जा रहा है—दिखावे का रोग। यह रोग न शरीर में दिखाई देता है, न मेडिकल रिपोर्ट में पकड़ा जाता है, लेकिन यह धीरे-धीरे मन, रिश्तों और मूल्यों को खोखला कर देता है। आधुनिक जीवनशैली, सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा ने इसे और भी घातक बना दिया है।
दिखावे का अर्थ है—वह बनने की कोशिश करना, जो हम वास्तव में नहीं हैं। महंगे कपड़े, बड़ी गाड़ियाँ, सोशल मीडिया पर “परफेक्ट लाइफ” की तस्वीरें, उधार लेकर किए गए शौक, और हैसियत से बढ़कर खर्च—ये सब इसी रोग के लक्षण हैं। व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान से असंतुष्ट होकर दूसरों को प्रभावित करने में ऊर्जा खपाने लगता है।
यह रोग केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है। इसके कारण मानसिक तनाव, ईर्ष्या, हीनभावना और अकेलापन बढ़ता है। लोग मुस्कुराती तस्वीरों के पीछे चिंता, कर्ज़ और टूटे रिश्ते छिपाए रहते हैं। दिखावे की दौड़ में इंसान अपनों से भी प्रतिस्पर्धा करने लगता है, जिससे पारिवारिक और सामाजिक संबंध कमजोर होते जाते हैं।
सोशल मीडिया इस रोग को खाद-पानी देता है। वहाँ जीवन की सच्चाई नहीं, बल्कि संपादित क्षण दिखाए जाते हैं। तुलना की यह आदत हमें यह महसूस कराती है कि हम “कम” हैं—कम सफल, कम खुश, कम स्टाइलिश। जबकि सच्चाई यह है कि हर जीवन में संघर्ष होता है, बस उसे फ़िल्टर के पीछे छुपा दिया जाता है।
दिखावे का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह संतोष को मार देता है। जब संतोष खत्म होता है, तो आनंद भी चला जाता है। व्यक्ति “होने” से ज़्यादा “दिखने” पर ध्यान देने लगता है। धीरे-धीरे मूल्यों, सादगी और ईमानदारी की जगह ब्रांड, लाइक्स और वाहवाही ले लेती है।
इस रोग का इलाज मुश्किल नहीं, बस ईमानदारी चाहिए—खुद से। अपनी सीमाओं को स्वीकार करना, जरूरत और चाहत में फर्क समझना, और यह जानना कि सच्ची खुशी बाहरी चमक में नहीं, भीतर की शांति में है। सादगी कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की पहचान है।
दिखावे का रोग: एक आधुनिक महामारी
- सोशल मीडिया और ‘परफेक्ट’ लाइफ का भ्रम
आजकल हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर बीतता है। हम भोजन का स्वाद लेने से पहले उसकी फोटो खींचते हैं ताकि दुनिया को दिखा सकें कि हम कितना “लक्जरी” जीवन जी रहे हैं। लाइक, शेयर और कमेंट्स की भूख ने हमें आत्म-प्रदर्शन का गुलाम बना दिया है। अक्सर लोग दूसरों की एडिट की हुई तस्वीरों को देखकर अपनी साधारण जिंदगी को ‘कमतर’ आंकने लगते हैं। - प्रदर्शन की अर्थव्यवस्था
लोग वह सामान खरीद रहे हैं जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं है, उन पैसों से जो उनके पास नहीं हैं (क्रेडिट कार्ड या लोन), सिर्फ उन लोगों को प्रभावित करने के लिए जिन्हें वे पसंद भी नहीं करते।
महंगे गैजेट्स: हर साल नया फोन लेना जरूरत नहीं, स्टेटस सिंबल बन गया है।
दिखावे की शादियाँ: लोग सालों की कमाई एक दिन के दिखावे में उड़ा देते हैं। - मानसिक स्वास्थ्य पर प्रहार
दिखावे की यह होड़ हमें मानसिक रूप से खोखला कर रही है। जब हम अपनी वास्तविकता और दिखावटी छवि के बीच के अंतर को नहीं भर पाते, तो निम्नलिखित समस्याएं जन्म लेती हैं:
तुलना का जहर: दूसरों से अपनी तुलना करना ही दुख का मूल कारण है।
अकेलापन: भीड़ में चमकने की चाहत में हम अपनों से असली जुड़ाव खो देते हैं।
तनाव और चिंता: हमेशा ‘अप-टू-डेट’ दिखने का दबाव हमें चैन से जीने नहीं देता।
समाज तभी स्वस्थ होगा, जब हम दिखावे से बाहर निकलकर वास्तविकता को अपनाएँगे। जो हैं, वही रहना—आज के समय में यही सबसे बड़ा साहस है।





