डॉलर की गद्दी डगमगाने लगी है, और संकेत दिल्ली से हैं

The dollar's throne is beginning to wobble, and the signals are from Delhi

अजय कुमार बियानी
इंजीनियर एवं लेखक

दशकों तक जिस डॉलर को वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना गया, जिस पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और वित्तीय सुरक्षा की नींव टिकी रही, आज उसी व्यवस्था में हलचल दिखाई देने लगी है। यह हलचल किसी बड़े भाषण, घोषणा या टकराव के रूप में नहीं आई, बल्कि शांत, योजनाबद्ध और गहरे संकेत देने वाले कदमों के माध्यम से सामने आई है। इस बार यह बदलाव केवल बाजार का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेतक बनता दिख रहा है।

हाल के महीनों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह ने अमेरिकी सरकारी ऋण पत्रों में अपनी हिस्सेदारी कम की है। इन ऋण पत्रों को अब तक दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों ने सामूहिक रूप से बड़ी मात्रा में इन निवेशों को घटाया है। यह निर्णय सामान्य निवेश संतुलन का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है जिसमें अब देश अपनी आर्थिक सुरक्षा को एक ही मुद्रा या एक ही राष्ट्र की नीति पर निर्भर नहीं रखना चाहते।

अमेरिकी मुद्रा की ताकत का आधार केवल उसकी आर्थिक क्षमता नहीं रहा, बल्कि वैश्विक विश्वास भी रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जिस तरह आर्थिक प्रतिबंधों, संपत्तियों की जब्ती और दबाव की नीति का उपयोग हुआ है, उसने कई देशों को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया है। जब किसी देश को यह अनुभव होता है कि मतभेद की स्थिति में उसकी मेहनत की कमाई भी असुरक्षित हो सकती है, तो स्वाभाविक है कि वह विकल्प तलाशे।

भारत का यह कदम विशेष रूप से ध्यान खींचता है। यह न तो किसी के विरुद्ध सार्वजनिक बयान है, न ही किसी गठबंधन से टकराव का संकेत। यह एक परिपक्व, संतुलित और दूरदर्शी आर्थिक नीति का हिस्सा है। भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को विविध बनाने, जोखिम को फैलाने और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में यह निर्णय लिया है। यह नीति यह दर्शाती है कि भारत अब केवल नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियमों के पुनर्गठन में भागीदार बनना चाहता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि यह प्रक्रिया अचानक नहीं शुरू हुई। बीते एक वर्ष में इन देशों द्वारा अमेरिकी ऋण पत्रों में निरंतर कटौती की गई है। यह क्रमिक बदलाव बताता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए संतुलन की ओर बढ़ रही है। अब भरोसा किसी एक मुद्रा पर नहीं, बल्कि बहुस्तरीय व्यवस्था पर टिका होगा, जहाँ विभिन्न क्षेत्रीय मुद्राएँ, स्वर्ण भंडार और आपसी व्यापार समझौते अधिक महत्व पाएंगे।

दुनिया की केंद्रीय बैंकें भले ही अपने वक्तव्यों में संयम बरत रही हों, लेकिन उनके खाते बहुत कुछ कह रहे हैं। जब बड़े पैमाने पर निवेश दिशा बदलता है, तो यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं रहता, वह राजनीतिक और रणनीतिक संदेश भी बन जाता है। यह संदेश स्पष्ट है कि आने वाले समय में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अधिक संतुलित, अधिक बहुपक्षीय और अधिक स्वायत्त होगी।
यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि डॉलर की भूमिका समाप्त हो रही है। वह अभी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उसकी एकाधिकार वाली स्थिति पर प्रश्न उठने लगे हैं। यह परिवर्तन धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से हो रहा है।

भारत इस बदलाव में न तो आक्रामक है, न ही अस्थिर। वह अपने अनुभव, क्षमता और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ रहा है। यह वही भारत है जो आर्थिक निर्णयों को केवल आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जोड़कर देखता है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि यह शांत कदम किस तरह वैश्विक आर्थिक मानचित्र को नया आकार देता है। संकेत साफ हैं—दुनिया बदल रही है, और भारत उस बदलाव का सजग सहभागी बन चुका है।