के. पी. मलिक
देश के कई हिस्सों में पिछले दिनों आई आंधी, तेज बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की मेहनत पर मानो बिजली गिरा दी है। गेहूं, सरसों, चना और लहसुन जैसी रबी की खड़ी फसलें खेतों में ही तबाह हो गईं। कई जगहों पर ओले इतने बड़े गिरे कि खेतों में फसल की जगह बर्फ जैसी सफेद चादर दिखाई देने लगी। मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ के कारण देश के कई हिस्सों में मौसम अचानक बदला और उत्तर, मध्य व पूर्वी भारत के अनेक राज्यों में आंधी, बारिश और ओलावृष्टि का असर पड़ा है। यह वही समय है जब किसान महीनों की मेहनत के बाद अपनी फसल काटने की तैयारी करता है। लेकिन इस बार खेतों में तैयार खड़ी फसल कुछ ही मिनटों की ओलावृष्टि में बर्बाद हो गई।
खेत में खड़ी किसान की उम्मीदें टूट गईं
खेत खलियान और गांवों में जाकर देखिए तो किसानों की आंखों में सिर्फ नुकसान का दर्द दिखाई देता है। कहीं गेहूं की बालियां जमीन पर बिछ गई हैं, कहीं सरसों की फसल पूरी तरह गिर गई है और कहीं लहसुन व सब्जियों की खेती बर्बाद हो चुकी है। कई किसानों ने कर्ज लेकर बीज और खाद खरीदी थी, लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि कर्ज कैसे चुकाया जाएगा? यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह लाखों किसानों के जीवन और भविष्य पर संकट है।
सरकार की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल
ऐसी आपदाओं के बाद सबसे पहले सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि वे नुकसान का आकलन करें और तुरंत राहत की घोषणा करें। लेकिन अक्सर होता क्या है? पहले सर्वे की घोषणा होती है, फिर कागजी प्रक्रिया शुरू होती है, और कई बार महीनों बाद कुछ हजार रुपये का मुआवजा किसानों के खाते में पहुंचता है, जो वास्तविक नुकसान के सामने बेहद मामूली और छोटा होता है। कुछ राज्यों ने नुकसान का सर्वे शुरू करने या राहत देने की बात कही है। उदाहरण के लिए बिहार में आंधी और ओलावृष्टि से 12 जिलों में 33 फ़ीसदी से अधिक फसल क्षति होने के बाद प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की तैयारी की बात सामने आई है। लेकिन देशभर में प्रभावित किसानों के लिए अभी तक कोई व्यापक राष्ट्रीय राहत योजना या स्पष्ट घोषणा सामने नहीं आई है।
यही कारण है कि किसानों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारें सचमुच उनकी पीड़ा को समझ रही हैं, या फिर यह मुद्दा भी सिर्फ कागजी फाइलों में दब जाएगा?
किसान की त्रासदी: जोखिम उसका, सुरक्षा किसी की नहीं
भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि किसान सबसे ज्यादा जोखिम उठाता है, लेकिन सबसे कम सुरक्षा उसे ही मिलती है। बीज महंगा, खाद महंगी, डीजल महंगा, और मौसम पूरी तरह अनिश्चित। ऊपर से अगर प्राकृतिक आपदा आ जाए तो किसान के पास बचता क्या है? फसल बीमा योजनाओं का लाभ भी अक्सर समय पर नहीं मिलता या प्रक्रिया इतनी जटिल होती है कि कई किसान उसका फायदा ही नहीं उठा पाते।
समाधान क्या हो सकता है?
इस संकट का समाधान केवल संवेदना के शब्दों से नहीं निकलेगा। इसके लिए ठोस नीति और त्वरित कार्रवाई जरूरी है। पहला, सरकारों को तुरंत नुकसान का वैज्ञानिक सर्वे कराकर वास्तविक मुआवजा देना चाहिए, न कि प्रतीकात्मक सहायता। दूसरा, फसल बीमा योजनाओं को सरल और पारदर्शी बनाना होगा ताकि हर किसान को समय पर भुगतान मिल सके। तीसरा, मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली को गांव स्तर तक मजबूत करना होगा ताकि किसान पहले से तैयारी कर सकें। चौथा, प्राकृतिक आपदाओं के लिए एक स्थायी राष्ट्रीय राहत कोष होना चाहिए, जिससे तुरंत सहायता दी जा सके।
बहरहाल आख़िरी में असली सवाल यही है कि भारत की अर्थव्यवस्था की नींव खेती पर टिकी है, लेकिन सबसे कमजोर कड़ी वही किसान बन गया है जो इस व्यवस्था को चलाता है। आज खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हुई हैं, लेकिन उससे बड़ा नुकसान उस भरोसे का है जो किसान सरकार और व्यवस्था पर करता है। अगर समय रहते सरकारें जागीं नहीं, तो यह सवाल और तेज होगा कि क्या भारत का किसान केवल चुनाव के समय याद किया जाने वाला हथियार बनकर रह गया है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)





