पढ़ने की लौ एवं किताबों से नाता अटूट है

ललित गर्ग

53वें भारत मंडपम् में 10 से 18 जनवरी 2026 तक नौ दिनों के किताबों के जमावडे ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि किताबों से नाता कभी नहीं टूट पायेगा। इस मेले में 35 से अधिक देशों के एक हजार से अधिक प्रकाशक भाग ले रहे हैं। यह भव्य विश्व पुस्तक मेला केवल पुस्तकों की खरीद-फरोख्त का आयोजन नहीं है, बल्कि यह उस जीवंत पुस्तक-संस्कृति का उत्सव है, जिसे अनेक लोग डिजिटल युग में कमजोर मानने लगे थे। एक-एक किलोमीटर लंबी कतारें, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की उत्सुक भागीदारी और पुस्तकों के प्रति बढ़ता आकर्षण इस धारणा को स्वस्थ करता है कि पुस्तकें जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं और भविष्य में भी रहेंगी। इंटरनेट, सोशल मीडिया एवं अन्य इलेक्ट्रोनिक माध्यमों पर अपार पाठ्य सामग्री एवं साहित्य उपलब्ध होने के बावजूद पुस्तक मेलों में इतनी भीड़ क्यों आ रही है? छपी हुई पुस्तकें एवं शब्द केवल ज्ञान, जिज्ञासा और मनोरंजन की विशाल दुनिया के दरवाजे नहीं खोलते, वे हमें गंध, स्पर्श, संवेदना, सोच, अनुभूति की प्रेरक, अनुकरणीय एवं रोमांचक दुनिया में भी ले जाते हैं। इस वर्ष के पुस्तक मेले के दृश्य पुस्तक-संस्कृति के प्रति नई आशा, नया विश्वास और नया उत्साह पैदा करते हैं। यह मेला स्पष्ट संकेत देता है कि पढ़ने की प्रवृत्ति केवल जीवित ही नहीं है, बल्कि नए पंखों के साथ उड़ान भर रही है।

पुस्तक मेला वस्तुतः एक विश्व उत्सव है-ऐसा उत्सव जो ज्ञान, विचार, कल्पना और संवाद को एक साझा मंच देता है। दुनिया भर में पुस्तकों के दायरे को पहचानने, उन्हें प्रोत्साहित करने और संस्कृतियों को जोड़ने के लिए यह आयोजन अतीत और भविष्य के बीच एक मजबूत कड़ी तथा पीढ़ियों और सभ्यताओं के बीच एक सेतु का कार्य करता है। यही कारण है कि यूनेस्को हर वर्ष पुस्तक उद्योग के तीन प्रमुख क्षेत्रों-प्रकाशक, पुस्तक विक्रेता और पुस्तकालयों के अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर विश्व पुस्तक राजधानी का चयन करता है, ताकि पुस्तक-संस्कृति की प्रेरणा पूरे वर्ष बनी रहे। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि पुस्तकें केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि वैश्विक संवाद और मानवीय एकता का भी आधार हैं। किताबें अपने सभी रूपों में-मुद्रित, ई-बुक, ऑडियो हमें सीखने, सोचने और स्वयं को सशक्त बनाने का अवसर देती हैं। वे हमारा मनोरंजन करती हैं, हमें दुनिया को समझने में मदद करती हैं और दूसरों की दुनिया में झांकने का अवसर देती हैं। इस साल का मेला ‘भारतीय सैन्य इतिहास: वीरता और ज्ञान/75’ थीम पर आधारित है, जो भारत की रक्षा बलों के महत्वपूर्ण पलों, योगदानों और कहानियों पर ध्यान केंद्रित करता है। ‘थीम मंडप 2026’ दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण बना हुआ है। यह मंडप भारत की सैन्य विरासत के 75 वर्षों की ऐतिहासिक और निर्णायक यात्रा को दिखा रहा है, जिसकी जड़ें शौर्य, प्रज्ञा और नैतिक मूल्यों में निहित हैं. इसमें कथाओं, दृश्यात्मक प्रस्तुतियों और संवाद के माध्यम से 1947 से लेकर ऑपरेशन सिंदूर 2025 तक भारत की सैन्य यात्रा को रेखांकित करता है।

दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला वैश्विक साहित्यिक परिदृश्य में एक प्रतीकात्मक उत्सव बन चुका है। इस मेले में विश्वप्रसिद्ध लेखकों का आगमन होता है, साहित्यिक संवाद, विमर्श और चर्चाएं होती हैं। विलियम शेक्सपियर, मिगुएल डे सर्वेंट्स जैसे विश्व साहित्य के स्तंभों से लेकर भारतीय भाषाओं के महान साहित्यकारों तक की रचनाएं यहाँ पाठकों को एक साथ उपलब्ध होती हैं। यह मेला भारतीय साहित्य को वैश्विक मंच देता है और साथ ही विश्व साहित्य को भारतीय पाठकों से जोड़ता है। पुस्तकों को ‘ज्ञान का बाग’ कहा गया है। जो व्यक्ति पुस्तकों से सच्ची दोस्ती कर लेता है, उसे जीवन भर ज्ञान का संबल मिलता है। कठिन समय में पुस्तकें मित्र की तरह साथ देती हैं, मार्गदर्शन करती हैं और समाधान की दिशा दिखाती हैं। पुस्तक का महत्व सार्वभौमिक, सार्वकालिक और सार्वदेशिक है। किसी भी युग में, किसी भी तकनीकी आंधी में उसका महत्व कम नहीं हो सकता। इंटरनेट, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी अनेक क्रांतियां आई हैं और आगे भी आएंगी, लेकिन पुस्तक-संस्कृति अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता बनाए रखेगी। कारण स्पष्ट है-पुस्तकें केवल सूचना नहीं देतीं, वे चिंतन, मनन और विवेक का विकास करती हैं।

तकनीक ने ज्ञान के क्षेत्र में क्रांति अवश्य की है, लेकिन यह हर समय संभव नहीं कि किताबों के स्थान पर केवल स्क्रीन से पढ़ा जाए। पुस्तक का स्पर्श, उसकी सुगंध, पन्नों को पलटने का अनुभव और पढ़ते हुए होने वाला एकांत संवाद-ये सभी तत्व पुस्तक को विशिष्ट बनाते हैं। पुस्तकें मानसिक रूप से मजबूत बनाती हैं, सोचने-समझने का दायरा बढ़ाती हैं और व्यक्ति को आत्मअनुशासन सिखाती हैं। पुस्तकें जाग्रत देवता के समान हैं। उनका अध्ययन, मनन और चिंतन तत्काल लाभ देता है। महात्मा गांधी के जीवन पर गीता, टॉल्स्टॉय और थोरो के विचारों का गहरा प्रभाव था। इसी तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैचारिक निर्माण और वैश्विक छवि के निर्माण में पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे स्वयं एक सजग पाठक रहे हैं और पुस्तक-संस्कृति को जीवंत करने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ जैसे अभिनव कार्यक्रमों के माध्यम से पढ़ने, लिखने और विचार करने की संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाया है। उनका संदेश ‘बुकें दे, बुके नहीं’ केवल एक प्रतीकात्मक नारा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दृष्टि है-जहाँ उपहार में फूलों के गुलदस्ते की बजाय ज्ञान का उपहार देने की प्रेरणा दी गई है। वे मानते हैं कि सत्साहित्य की शक्ति तोप, टैंक और परमाणु अस्त्रों से भी अधिक है, क्योंकि हथियार ध्वंस करते हैं, जबकि साहित्य मानव-मूल्यों में आस्था पैदा करता है और स्थायी परिवर्तन लाता है। सत्साहित्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बनता है-ऐसा परिवर्तन जो सत्ता और कानून से किए गए परिवर्तनों से कहीं अधिक टिकाऊ होता है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी भारत के परिवर्तन में पुस्तक-संस्कृति और सत्साहित्य की निर्णायक भूमिका को स्वीकारते हैं। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भारतीय भाषाओं को बढ़ावा, स्थानीय साहित्य का सम्मान और पठन-संस्कृति को प्रोत्साहन देने की दिशा में ठोस पहलें देखने को मिलती हैं।

पुस्तकें चरित्र निर्माण का सर्वाेत्तम साधन हैं। उत्तम विचारों से युक्त पुस्तकों के प्रचार-प्रसार से युवाओं को नई दिशा दी जा सकती है। देश की एकता और अखंडता का पाठ पढ़ाया जा सकता है और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। पुस्तकें प्रेरणा का भंडार हैं, उन्हें पढ़कर व्यक्ति के भीतर कुछ महान करने की आकांक्षा जागती है। वे कल्पवृक्ष भी हैं और कामधेनु भी, क्योंकि उनकी छाया में मनुष्य अपनी आंतरिक क्षमताओं को पहचानता है। आज का इंसान घर बदलता है, पहनावा बदलता है, रिश्ते और मित्र बदलता है, फिर भी असंतुष्ट रहता है क्योंकि उसने पुस्तकरूपी कल्पवृक्ष की छाया छोड़ दी है। पुस्तकें व्यक्ति को बदलने का मार्ग दिखाती हैं-सोच, व्यवहार और दृष्टि को सकारात्मक दिशा देती हैं। जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं बदलता, वह अपनी मंज़िल नहीं पा सकता। आत्मानुशासन, आत्मचिंतन और आत्मविकास-ये सभी पुस्तक-संस्कृति की देन हैं।

इंटरनेट और ई-पुस्तकों की बढ़ती पहुँच के बावजूद छपी हुई किताबों का महत्व कम नहीं हुआ है। वे आज भी प्रासंगिक हैं और रहेंगी। हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन-“साहित्य वह जादू की छड़ी है, जो पशुओं में, ईंट-पत्थरों में और पेड़-पौधों में भी विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है”, आज भी उतना ही सार्थक है। निश्चित ही, विश्व पुस्तक मेला की प्रेरणा भारतीय जन-चेतना को झकझोर रही है और उन्हें नए भारत-सशक्त भारत के निर्माण की दिशा में प्रेरित कर रही है। साररूप में यह कहा जा सकता है कि दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला पुस्तक-संस्कृति और पढ़ने की प्रवृत्ति को नए पंख देने वाला एक अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक आयोजन है। इसका उद्घाटन करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने संबोधन में कहा कि पुस्तकें ज्ञान का वाहक हैं जो पीढ़ियों को जोड़ती हैं, सभ्यताओं की स्मृतियों को संजोती हैं और समाज को दिशा देती हैं। यह मेला केवल पुस्तकों का नहीं, विचारों का, संस्कारों का और भविष्य का मेला है-जहाँ शब्द समाज का निर्माण करते हैं और पन्ने इतिहास की दिशा तय करते हैं।