जब प्रकृति का कैलेंडर उलट जाए
एडवोकेट, जयदेव राठी
भारत में एक पुरानी कहावत है — “अगहन-पूस की ठंड और जेठ-आषाढ़ की तपन” — यानी सर्दी और गर्मी अपने-अपने मौसम में आती हैं, अपना काम करती हैं और चली जाती हैं। लेकिन अब यह कहावत महज़ एक पुरानी याद बनकर रह गई है। आज न सर्दी समय पर आती है, न गर्मी समय पर जाती है। दिसंबर में पंखे चलते हैं और मार्च में रजाइयाँ निकल आती हैं। यह कोई महज़ मौसम की सनक नहीं है। यह जलवायु परिवर्तन की उस गहरी और भयावह चेतावनी का हिस्सा है, जिसे हम दशकों से अनसुना करते आए हैं।
भारतीय मौसम विभाग के आँकड़े बताते हैं कि पिछले तीन दशकों में भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। यह संख्या भले ही छोटी लगे, लेकिन इसके परिणाम असाधारण रूप से बड़े हैं। सर्दियों की अवधि सिकुड़ रही है — जो ठंड कभी नवंबर के मध्य से फरवरी के अंत तक रहती थी, वह अब जनवरी के कुछ हफ्तों तक सिमट आई है। दूसरी ओर, गर्मी का मौसम न केवल लंबा हो रहा है, बल्कि उसकी तीव्रता भी असहनीय होती जा रही है।
वर्ष 2024 को विश्व मौसम संगठन ने अब तक का सबसे गर्म वर्ष घोषित किया। भारत में उसी वर्ष मई-जून में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में तापमान 48-50 डिग्री के पार चला गया। हीटवेव से सैकड़ों मौतें हुईं। इसी के साथ विचित्र विरोधाभास यह देखा गया कि दिसंबर 2023 में कश्मीर में जहाँ बर्फबारी न के बराबर हुई, वहीं हिमाचल प्रदेश के मैदानी इलाकों में फरवरी 2024 में अचानक ओलावृष्टि ने फसलें तबाह कर दीं। यह अनिश्चितता ही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
हिमालय को “एशिया का जल-मीनार” कहा जाता है। यहाँ के ग्लेशियर करोड़ों लोगों की प्यास बुझाते हैं और कृषि की रीढ़ हैं। लेकिन वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि हिमालयी ग्लेशियर प्रतिवर्ष औसतन आधा मीटर की दर से पिघल रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर पिछले 25 वर्षों में लगभग एक किलोमीटर सिकुड़ चुका है। इसका सीधा अर्थ है कि गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ आगामी दशकों में गर्मियों में सूखने की कगार पर पहुँच सकती हैं।
सर्दियों में हिमपात का कम होना एक अदृश्य त्रासदी है। पहाड़ों में बर्फ जमा होती थी, फिर धीरे-धीरे पिघलकर गर्मियों में नदियों को जीवन देती थी। यह एक प्राकृतिक जलाशय प्रणाली थी। अब जब सर्दी छोटी और कमज़ोर होती है, तो बर्फ कम जमती है। परिणाम यह होता है कि गर्मियों में नदियाँ समय से पहले सूख जाती हैं और मानसून के दौरान अचानक बाढ़ की स्थिति बनती है।
जलवायु वैज्ञानिकों ने एक नया पद गढ़ा है — “उष्ण रातें” । इसका अर्थ यह है कि अब रात में भी तापमान उस स्तर तक नहीं गिरता, जितना पहले गिरता था। मानव शरीर, फसलें और पशु-पक्षी रात के ठंडे तापमान से अपनी ऊर्जा पुनः प्राप्त करते थे। जब रातें भी गर्म रहने लगती हैं, तो शरीर पर तनाव बढ़ता है, फसलों की उपज घटती है और वन्यजीव अपने व्यवहार में असंतुलन महसूस करते हैं।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन के अनुसार, यदि तापमान इसी दर से बढ़ता रहा, तो 2050 तक गेहूँ की उत्पादकता 20-25 प्रतिशत तक घट सकती है। गेहूँ को पकने के लिए सर्दी के अंतिम चरण में ठंडी रातें और हल्की धूप चाहिए। अब जब फरवरी-मार्च में ही तापमान तेजी से बढ़ने लगता है, तो गेहूँ के दाने पुष्ट नहीं हो पाते और किसान की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है।
जलवायु परिवर्तन का असर केवल प्राकृतिक परिवेश तक सीमित नहीं है। शहरों में एक अलग घटना देखी जा रही है जिसे “अर्बन हीट आइलैंड” कहते हैं। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद जैसे महानगरों में कंक्रीट, डामर और ऊँची इमारतें दिन में सूर्य की ऊष्मा सोखती हैं और रात में उसे छोड़ती हैं। इससे इन शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से 3 से 7 डिग्री तक अधिक रहता है।
जो लोग गर्मी से बचने के लिए एयर कंडीशनर चलाते हैं, वे और भी अधिक गर्मी पैदा करते हैं — क्योंकि एसी अंदर से ठंडक देता है, लेकिन बाहर गर्म हवा उगलता है। यह एक दुष्चक्र है — गर्मी से राहत पाने का उपाय और अधिक गर्मी पैदा करता है। आज भारत में एसी की बिक्री प्रतिवर्ष 15-20 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यह विकास का सूचक है या संकट का — यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना होगा।
ऋतु परिवर्तन का सबसे तीखा असर भारत के मानसून पर पड़ा है। पारंपरिक रूप से मानसून जून के पहले सप्ताह में केरल से प्रवेश करता था और सितंबर तक विदा लेता था। अब यह क्रम बिगड़ चुका है। कभी मानसून देर से आता है और फिर एक साथ इतनी बारिश करता है कि बाढ़ आ जाती है, तो कभी समय पर आकर बीच में ही थम जाता है, जिससे सूखे की स्थिति बनती है।
वर्षा की कुल मात्रा में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है, लेकिन उसके वितरण में भारी असमानता आ गई है। जहाँ पहले 100 दिनों में बारिश होती थी, वहाँ अब 40-50 दिनों में ही उतनी बारिश हो जाती है — और बाकी दिन सूखे रहते हैं। इस “तीव्र लेकिन अनिश्चित” वर्षा पैटर्न ने कृषि को गहरा नुकसान पहुँचाया है, क्योंकि फसलें न तो अकाल सह सकती हैं, न अतिवृष्टि।
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन केवल प्रकृति की करनी नहीं है — यह मानव की अनियंत्रित लालसा और औद्योगिक महत्वाकांक्षा का परिणाम है। जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध जलाना, वनों की अंधी कटाई, कृषि में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, और शहरीकरण की बेलगाम दौड़ — ये सब मिलकर वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ा रहे हैं।
भारत ने “पंचामृत संकल्प” के तहत 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है और 2030 तक 50 प्रतिशत ऊर्जा नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त करने का वादा किया है। सौर ऊर्जा में भारत तेज़ी से आगे बढ़ा है — आज भारत की स्थापित सौर क्षमता 90 गीगावाट से अधिक है। लेकिन नीतियाँ अकेले पर्याप्त नहीं हैं। नागरिकों को भी अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना होगा।
पेड़ लगाना, पानी बचाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, मांस की खपत घटाना, और ऊर्जा की बर्बादी रोकना — ये छोटे लगने वाले कदम सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
अंत में: प्रकृति के साथ नहीं तो प्रकृति के विरुद्ध
हमारे पूर्वजों ने जलवायु को केवल एक भौतिक तत्व नहीं माना था — वे इसे जीवन का आधार मानते थे। अथर्ववेद में पृथ्वी को माता कहा गया है — “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — अर्थात यह धरती हमारी माँ है और हम उसके पुत्र हैं। एक पुत्र अपनी माँ को कष्ट नहीं देता।
आज हमारी पीढ़ी इस उक्ति की परीक्षा में खड़ी है। सर्दी का सिकुड़ना और गर्मी का फैलना महज़ ऋतु-परिवर्तन नहीं है — यह उस संतुलन का टूटना है जिस पर समस्त जीवन टिका है। यदि अभी भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी — और न ही यह धरती।





