गोपेन्द्र नाथ भट्ट
हाल ही में राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में परिसीमन होने पर राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या लगभग 70 तक बढ़ सकती है। यदि ऐसा होता है तो वर्तमान 200 सदस्यीय विधानसभा का आकार बढ़कर करीब 270 तक पहुँच सकता है।
विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने पिछले मंगलवार दस मार्च को सायं जयपुर के कॉन्स्टिटयूशन क्लब ऑफ राजस्थान में विधानसभा में किये गये नवाचारों पर लिखी गई“संसदीय संस्कृति का उत्कर्ष-नवाचारों के दो वर्ष”शीर्षक अपनी पुस्तक के विमोचन समारोह और उनकी कृति “सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि के नवीन संस्करण पर चर्चा के लिए आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधानसभा की ऊपरी मंजिल में स्थित विधान परिषद सदन के सभागार के नवीनीकरण के लिए राज्य बजट में आवंटित बजट की चर्चा और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का आभार जताते हुए यह बयान दिया था। इस समारोह में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली और भजन लाल सरकार के मंत्री,विधायक और अन्य कई जन प्रतिनिधि मौजूद थे।विधानसभा अध्यक्ष देवनानी का यह बयान केवल विधानसभा की वर्तमान सीटों में संभावित परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश की राजनीति, प्रतिनिधित्व और चुनावी समीकरणों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
भारत में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या तय करने का काम परिसीमन आयोग करता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होती है। हालांकि 1976 में संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था, जिसे बाद में बाद में इसे 2001 और फिर 2026 तक बढ़ा दिया गया था।।अब 2026 के बाद संभावित परिसीमन को लेकर देशभर में राजनीतिक चर्चा तेज हो रही है। इसी संदर्भ में देवनानी ने संकेत दिया कि राजस्थान में भी विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ सकती है। भारत सरकार ने देश में जनगणना के सम्बन्ध में आवश्यक दिशा निर्देश जारी कर दिये है। जनगणना का कार्य पूरा होने के बाद भारत सरकार परिसीमन आयोग का गठन करेगी। सर्वोच्च्य न्यायालय के सेवानिवृत जज प्रायः इस आयोग के अध्यक्ष होते है।
राजस्थान देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक है। पिछले कई दशकों में यहाँ जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लेकिन विधानसभा सीटों की संख्या लंबे समय से स्थिर बनी हुई है।1977 के बाद से राज्य में विधानसभा सीटों की संख्या 200 ही है। जबकि जनसंख्या कई गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में कई विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक हो गई है। इससे जनप्रतिनिधियों के लिए अपने क्षेत्र की समस्याओं को प्रभावी ढंग से संभालना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। जैसा कि अनुमान है कि यदि राजस्थान विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ती है तो निर्वाचन क्षेत्रों का आकार छोटा होगा और जनता का प्रतिनिधित्व अधिक प्रभावी हो सकेगा।
विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने से प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। नई सीटों के निर्माण से राजनीतिक दलों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। नए निर्वाचन क्षेत्र बनने से स्थानीय नेतृत्व को भी उभरने का मौका मिलेगा। कई ऐसे क्षेत्र जिन्हें अब तक पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला, उन्हें नई आवाज मिल सकती है। इसके अलावा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में भी बदलाव संभव है, क्योंकि परिसीमन में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण का निर्धारण किया जाता है। विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़ने का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इससे प्रशासनिक और विकासात्मक स्तर पर भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।विधानसभा का क्षेत्रफल कम होने से जन प्रतिनिधि समस्याओं को अधिक करीब से समझ सकेंगे और सरकार तक अपने क्षेत्र की बातों को प्रभावी ढंग से पहुँचा सकेंगे। इससे विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में भी सुधार हो सकता है।ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने से क्षेत्रीय असंतुलन कम करने में मदद मिल सकती है।हालांकि विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के साथ कई चुनौतियाँ भी सामने आ सकती है। परिसीमन प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ बदलती हैं, जिससे स्थानीय राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा विधानसभा का आकार बढ़ने से संसदीय कार्यवाही के संचालन और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में भी बदलाव की आवश्यकता होगी।
विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह आने वाले समय में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विस्तार की संभावना को दर्शाता है।यदि परिसीमन के बाद राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ती है तो यह राज्य की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन होगा। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी का दायरा भी विस्तृत होगा और नए नेतृत्व को अवसर मिलेगा। फिर भी व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाना है। बढ़ती जनसंख्या और बदलते सामाजिक ढांचे के अनुरूप प्रतिनिधित्व की संरचना में बदलाव लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
कुल मिलाकर विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी के इस संकेत ने राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है। यदि भविष्य में परिसीमन के बाद राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या वास्तव में बढ़ती है तो यह न केवल प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को बदलेगा, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को भी अधिक व्यापक और संतुलित बनाएगा।
आने वाले वर्षों में परिसीमन की प्रक्रिया किस दिशा में जाती है, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन इतना निश्चित है कि इस संभावना ने अभी से प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।





