प्रदीप शर्मा
अमरीका से कृषि उत्पाद भारत में आएंगे और गेहूं, ज्वार, जौ, बाजरा, ओट्स, चावल, मक्का आदि बाजार में नहीं आएंगे। डेयरी क्षेत्र में भी अमरीका भारत के बाजार में प्रवेश करेगा, लेकिन हमारे किसान, उद्यमी और एमएसएमई सुरक्षित और संरक्षित रहेंगे। ऐसा आश्वासन प्रधानमंत्री मोदी ने भी दिया है। व्यापार समझौते का जो मसविदा, ढांचा सामने आया है, बेशक वह अंतरिम है, लेकिन कई विरोधाभासों वाला है। गेहूं, चावल, मक्का, सोयाबीन, पॉल्ट्री, मीट, केला, स्ट्राबेरी, चेरी, हरा मटर, मूंग, काबुली चना, तेल के बीज, तंबाकू, इथनॉल और डेयरी उत्पादों पर अमरीका हमें कोई छूट और रियायत नहीं देगा। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल दावा कर रहे हैं कि दूध, क्रीम, छाछ, मक्खन, घी, बटर ऑयल, पनीर आदि डेयरी उत्पाद अमरीका से भारत में नहीं आएंगे। मसाले भी नहीं आएंगे, लेकिन समझौते के मसविदे, ढांचे में कहीं भी उल्लेख नहीं है कि दूध, जीएस गेहूं एवं मक्का, सोयाबीन आदि उत्पाद अमरीका भारत में नहीं भेजेगा। समझौते में कई गंभीर विरोधाभास हैं। अर्थात अमरीका हमारे कृषि और डेयरी क्षेत्रों में भी अपना कारोबार करेगा। क्या भारतीय किसान अमरीकी किसानों की प्रतिस्पद्र्धा में टिक सकेंगे?
अमरीकी किसानों की लागत भारतीय किसानों की तुलना में बहुत कम है, क्योंकि उन्हें अरबों की सबसिडी दी जाती है, जबकि भारतीय सबसिडी ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ समान है। क्या एसबीआई की रपट बिल्कुल सही, सटीक साबित होगी और भारतीय किसानों, पशुपालकों को 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान उठाना पड़ सकता है? बहरहाल मार्च मध्य में जब समझौते का अंतिम मसविदा सार्वजनिक होगा और जिस पर दोनों देशों के प्रतिनिधि हस्ताक्षर करेंगे, तब तक कुछ और संशोधन किए जा सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर व्यापार समझौते की शर्तें तय हो चुकी हैं। लिहाजा सबसे संवेदनशील सवाल यह है कि क्या अमरीका को उन क्षेत्रों में घुसने की अनुमति दे दी गई है, जिन पर भारत सरकार साफ इंकार करती रही है? एक बार अमरीकी उत्पादों का भारत में सैलाब आएगा, तो फिर वह रुकने वाला नहीं है?
क्या भारत सरकार अमरीकी कृषि और डेयरी उत्पादों पर इतना टैरिफ लगा सकती है कि वे भारतीय बाजार में, हमारे किसानों के साथ, प्रतिस्पद्र्धा करने में पिछड़ जाएं? समझौते के मसविदे से तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता। बहरहाल अभी तो हमें प्रधानमंत्री मोदी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयानों और दावों पर भरोसा करना चाहिए। रूस के कच्चे तेल से जुड़ी अमरीका की चेतावनी भी बेहद गंभीर है। सवाल है कि भारत किस देश से, कितना तेल-गैस आदि, खरीदता है, इस संप्रभु निर्णय में अमरीका का दखल क्यों होना चाहिए? राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐसा प्रशासनिक आदेश भी जारी कर दिया है कि यदि भारत, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, रूस से तेल खरीदता पाया जाता है, तो उस पर 25 फीसदी पेनल्टी टैरिफ एक बार फिर लगाया जा सकता है। इस बिंदु पर भारतीय वार्ताकार सहमत क्यों हुए?
रूस भारत का पुराना और आजमाया हुआ मित्र-देश है। भारत ने जनवरी, 2026 में भी रूस से 251 टन तेल प्रतिदिन खरीदा है। बेशक भारत ने रूसी तेल की खरीद कम की है, लेकिन यह भी गौरतलब तथ्य है कि रूसी तेल खरीदने से भारत को बीते 40 माह में 1.53 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा हुआ है। तेल का यह कारोबार ‘रुपए-रुबेल’ में हुआ है। अप्रैल-मई तक का रूसी तेल का हमारा ऑर्डर पहले ही दिया जा चुका है। राष्ट्रपति ट्रम्प को बखूबी जानकारी होगी। फिर भी उन्होंने टैरिफ थोपने वाला आदेश जारी क्यों किया है? भारत-अमरीका समझौते के संदर्भ में एक गलत और पूर्वाग्रही व्याख्या की जा रही है। समझौते का अंतरिम ढांचा देश के सामने है, फिर भी किसान संगठनों ने विरोध प्रदर्शन का फैसला लिया है।
कपड़ों के निर्यात में भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है. अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए इस नए व्यापार समझौते के बाद ये चिंताएं जताई जा रही हैं कि समझौते के कुछ प्रावधान भारत के लिए झटका साबित हो सकते हैं.चिंता यह है कि अमेरिका के साथ नए समझौते की वजह से बांग्लादेश धीरे-धीरे भारतीय कच्चा माल छोड़कर अमेरिकी कपास का इस्तेमाल करने लग सकता है जिसका सीधा असर भारत के कपास किसानों और धागा उद्योग पर पड़ सकता है। फ़िक्र इस बात की भी है कि ज़ीरो टैरिफ़ का फ़ायदा मिलने की वजह से बांग्लादेश के उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में और सस्ते हो जाएंगे जिससे भारतीय कपड़ा निर्यातकों के लिए मुक़ाबला और मुश्क़िल हो जाएगा। अमेरिका अपने कच्चे माल के निर्यात को बढ़ावा दे रहा है, और इससे बांग्लादेश को जो फ़ायदे मिलेंगे और यह देखते हुए कि अमेरिका बहुत लेन-देन वाली नीति अपनाता है- बांग्लादेश के लिए उस रास्ते पर न जाना मुश्किल होगा। यह ट्रंप प्रशासन के लिए इस सौदे की सफलता का एक अहम पैमाना भी बनेगा और इसका असर भारत पर भी पड़ेगा।





