उज्ज्वला का उजाला या आपूर्ति का अंधेरा?

The light of Ujjwala or the darkness of supply?

डॉ. प्रियंका सौरभ

हालिया एलपीजी संकट ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी महत्वाकांक्षी कल्याणकारी पहलों की चमक धूमिल कर दी है। मार्च 2026 में पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनावों से उत्पन्न यह संकट, जब ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया, तब भारत की लगभग 60 प्रतिशत आयात निर्भरता पूरी तरह उजागर हो गई। दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ता देशों में शामिल भारत में अचानक सिलेंडरों की लंबी कतारें दिखने लगीं, ग्रामीण महिलाओं के रसोईघर ठंडे पड़ गए और व्यावसायिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुईं। उज्ज्वला योजना ने 10 करोड़ से अधिक कनेक्शन वितरित कर स्वच्छ ईंधन क्रांति का दावा किया था, किंतु इस संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल विस्तार ही प्रभावी वितरण की गारंटी नहीं होता। घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले अपर्याप्त रहा, भंडारण क्षमता महज पांच दिनों की साबित हुई और आपूर्ति श्रृंखला की नाजुकता खुलकर सामने आ गई।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का प्रारंभ 2016 में धुएं से मुक्ति के एक आकर्षक और मानवीय स्वप्न के साथ हुआ था। लकड़ी और कोयले के चूल्हों से उत्पन्न स्वास्थ्य संकट को कम करने के उद्देश्य से गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन उपलब्ध कराए गए। योजना का विस्तार तीन चरणों में हुआ—प्रथम चरण में 5 करोड़, द्वितीय में 6 करोड़ और तृतीय में अतिरिक्त लक्ष्य निर्धारित किए गए। परिणामस्वरूप एलपीजी कवरेज 95 प्रतिशत से अधिक हो गया, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। किंतु हालिया संकट ने रिफिल दरों की वास्तविकता को उजागर कर दिया। औसतन लाभार्थी प्रति वर्ष केवल 3 से 4 बार ही सिलेंडर रिफिल कराते हैं, जबकि निरंतर उपयोग के लिए कम से कम 8 से 10 रिफिल आवश्यक होते हैं। सब्सिडी के बावजूद 600 से 800 रुपये की लागत दैनिक मजदूरी पर निर्भर परिवारों के लिए भारी पड़ती है। परिणामस्वरूप, अनेक परिवार पुनः पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट जाते हैं। सिलेंडर घरों में “आपातकालीन विकल्प” बनकर रह जाता है, न कि नियमित उपयोग का साधन।

एलपीजी संकट ने केवल मांग और कीमत का ही प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि भारत की आपूर्ति श्रृंखला की नाजुकता को भी उजागर कर दिया। घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले कम है, भंडारण क्षमता सीमित है और आयात बाधित होते ही वितरण तंत्र चरमरा जाता है। पूर्वोत्तर राज्यों में भौगोलिक चुनौतियों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। यह स्पष्ट हो गया कि ऊर्जा सुरक्षा के बिना कल्याणकारी योजनाएं केवल कागजी उपलब्धियां बनकर रह जाती हैं।

डिजिटल प्रणालियों ने पारदर्शिता तो बढ़ाई है, किंतु डिजिटल विभाजन ने बड़ी संख्या में लोगों को बाहर भी कर दिया है। ग्रामीण भारत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी इंटरनेट और तकनीकी संसाधनों से वंचित है, जिससे रिफिल बुकिंग और शिकायत निवारण जैसी प्रक्रियाएं उनके लिए कठिन बनी रहती हैं। इस प्रकार, जो व्यवस्था समावेशन के लिए बनाई गई थी, वही कई बार बहिष्करण का कारण बन जाती है।

यह समस्या केवल उज्ज्वला योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की व्यापक कल्याणकारी संरचना की कमजोरी को भी उजागर करती है। देश में अनेक योजनाएं सुभेद्य वर्गों को लक्षित करती हैं, किंतु जागरूकता के अभाव, दस्तावेजी जटिलताओं, भ्रष्टाचार और निगरानी की कमी के कारण उनका प्रभाव सीमित रह जाता है। अधिकांश योजनाएं अल्पकालिक राहत तक सीमित रहती हैं और दीर्घकालिक सशक्तीकरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं देतीं। परिणामस्वरूप, भारत की कल्याणकारी योजनाएं अक्सर कागज पर “सर्वव्यापी” और ज़मीन पर “चयनात्मक” बन जाती हैं।

संकट के दौरान सरकार द्वारा उठाए गए कदम तत्काल राहत के लिए आवश्यक थे, किंतु वे स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं करते। यदि सुभेद्य आबादी के लिए वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, तो आयात निर्भरता को कम कर घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा, भंडारण क्षमता का विस्तार करना होगा और वितरण तंत्र को मजबूत बनाना होगा। साथ ही, डिजिटल समावेशन सुनिश्चित करते हुए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों—जैसे बायोगैस और सौर ऊर्जा—को बढ़ावा देना होगा।

अंततः, एलपीजी संकट यह स्पष्ट करता है कि कल्याण केवल वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सतत और समान पहुंच सुनिश्चित करने की प्रक्रिया है। उज्ज्वला योजना ने लाखों जीवनों को प्रभावित किया है, किंतु इस संकट ने उसकी सीमाओं को भी उजागर कर दिया है। सुभेद्य वर्गों का वास्तविक सशक्तीकरण तभी संभव है, जब योजनाओं की संरचना समावेशी, लचीली और उत्तरदायी हो। अन्यथा, ये पहलें केवल कागजी उपलब्धियों तक सीमित रह जाएंगी। भारत की कल्याण यात्रा को अब विस्तार के साथ-साथ गहराई और स्थायित्व की आवश्यकता है, ताकि अगला संकट सबसे कमजोर वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित न कर सके।

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)