अजय कुमार बियानी
आज के त्वरित संदेशों और औपचारिक संवेदनाओं के युग में मृत्यु जैसी गंभीर और गहन घटना भी कुछ शब्दों में समेट दी जाती है। किसी के निधन का समाचार मिला नहीं कि तुरंत प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती है। श्रद्धा, संवेदना और शोक प्रकट करने की यह हड़बड़ी अक्सर सोच से खाली होती है। हम यह भूल जाते हैं कि मृत्यु केवल देह का अंत नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कार और भावनाओं का विषय है, जिसे शब्दों में व्यक्त करते समय विवेक और मर्यादा की आवश्यकता होती है।
अक्सर देखा जाता है कि लोग किसी के देहांत पर विदेशी शब्दों का प्रयोग कर देते हैं, जिनका अर्थ, भाव और सांस्कृतिक संदर्भ हमारी परंपराओं से मेल नहीं खाता। यह प्रश्न विचारणीय है कि जिन शब्दों का प्रयोग हम कर रहे हैं, वे वास्तव में किसके लिए और किस भाव से कहे जा रहे हैं। मृत्यु के बाद व्यक्ति की देह नष्ट होती है, पर उसकी स्मृतियाँ, उसके कर्म और उसका प्रभाव समाज में जीवित रहता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हम श्रद्धा किसे अर्पित कर रहे हैं—उस देह को जो अब नहीं रही, या उन स्मृतियों को जो हमारे भीतर जीवित हैं।
भारतीय परंपरा में मृत्यु को अंतिम विराम नहीं, बल्कि जीवन यात्रा का एक पड़ाव माना गया है। यहाँ संस्कार देह के लिए नहीं, आत्मा की शांति और समाज की स्मृति के लिए होते हैं। अंतिम क्रिया के बाद भी मृतक का अस्तित्व उसके विचारों, व्यवहार और संबंधों के माध्यम से बना रहता है। इसलिए जब हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, तो वास्तव में हम उस व्यक्ति के जीवन, उसके मूल्यों और उसके योगदान को स्मरण कर रहे होते हैं।
यहीं भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। शब्द केवल औपचारिकता नहीं, भाव का वहन करते हैं। यदि शब्दों का चयन बिना सोचे-समझे किया जाए, तो संवेदना खोखली प्रतीत होने लगती है। नमन, प्रणाम और श्रद्धांजलि जैसे शब्द तब सार्थक होते हैं जब उनका उद्देश्य स्पष्ट हो। नमन किसी जीवित चेतना या स्मरणीय गुणों को किया जाता है। श्रद्धांजलि उस जीवन यात्रा को दी जाती है, जो समाज के लिए अर्थपूर्ण रही हो।
मृत्यु के बाद व्यक्ति स्वयं कुछ ग्रहण नहीं करता, न शब्द, न सम्मान। जो कुछ भी कहा जाता है, वह जीवित लोगों के लिए होता है—परिजनों के सांत्वनार्थ, समाज के आत्मचिंतन के लिए और आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने के लिए कि जीवन क्षणभंगुर है, पर कर्म स्थायी। इसलिए यह अधिक उपयुक्त है कि हम देह के अंत के बजाय स्मृतियों को संबोधित करें।
जब हम कहते हैं कि स्मृतियों को नमन या स्मृतियों को प्रणाम, तब हम यह स्वीकार करते हैं कि व्यक्ति हमारे बीच अपने कार्यों और संबंधों के माध्यम से अब भी मौजूद है। यह भाषा अधिक विनम्र, अधिक सटीक और अधिक भारतीय है। यह न तो किसी धार्मिक मत का अंधानुकरण करती है और न ही किसी बाहरी अवधारणा पर निर्भर रहती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संवेदना प्रकट करने को भी जिम्मेदारी से निभाएँ। मृत्यु पर लिखे गए शब्द दिखावे या त्वरित प्रतिक्रिया के लिए नहीं, बल्कि सोच, संवेदना और सांस्कृतिक समझ के साथ होने चाहिए। शब्दों की मर्यादा बनाए रखना भी मृतक के प्रति सम्मान का ही एक रूप है।
अंततः मृत्यु के बाद जो शेष रहता है, वह स्मृति है। वही हमारी भाषा का केंद्र होनी चाहिए। इसलिए औपचारिक और यांत्रिक अभिव्यक्तियों के स्थान पर यदि हम यह कहें कि उनकी स्मृतियों को नमन, उनकी यादों को प्रणाम, तो यह न केवल अधिक सार्थक होगा, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदना का भी सच्चा प्रतिबिंब बनेगा।




