युगों-युगों तक मार्गदर्शन करती रहेगी भगवान महावीर की अमृतवाणी

The nectarine words of Lord Mahavir will continue to guide us for ages

योगेश कुमार गोयल

‘अहिंसा परमो धर्मः’ का अमर संदेश देने वाले भगवान महावीर का जीवन और दर्शन आज के अशांत, तनावग्रस्त और संघर्षपूर्ण समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। आधुनिक युग में मनुष्य प्रगति की अंधी दौड़ में नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। स्वार्थ, लोभ और प्रतिस्पर्धा ने उसे इस हद तक प्रभावित कर दिया है कि वह अपने हित के लिए हिंसा और अनैतिकता को भी उचित ठहराने लगा है। ऐसे समय में महावीर स्वामी का अहिंसा, संयम और करुणा पर आधारित दर्शन मानवता को एक नई दिशा देता है और उसे आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

भगवान महावीर ने अपने जीवन के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक जीव समान है और हर प्राणी में आत्मा का वास है। उन्होंने ‘जीओ और जीने दो’ का जो सिद्धांत दिया, वह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने व्यवहार और आचरण में ऐसी संवेदनशीलता विकसित करें, जिससे किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुंचे। उनका यह विचार कि पेड़-पौधे, जल, वायु और अग्नि तक में जीवन है, आज के पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। जब पृथ्वी प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के संकट से जूझ रही है, तब महावीर का यह संदेश हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने का आह्वान करता है।

महावीर स्वामी ने कर्म के सिद्धांत को भी अत्यंत स्पष्टता से समझाया। उनका मानना था कि मनुष्य स्वयं अपने कर्मों के लिए जिम्मेदार है और वही उसके भविष्य का निर्धारण करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों से बच नहीं सकता। जो जैसा करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है। यह सिद्धांत न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मनुष्य को उत्तरदायित्व और सजगता का बोध कराता है। उन्होंने यह भी सिखाया कि धर्म बाहरी आडंबरों में नहीं बल्कि आत्मा की पवित्रता में निहित है। अहिंसा, सत्य, संयम और तप ही धर्म के वास्तविक लक्षण हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे दोष मनुष्य के सभी गुणों का नाश कर देते हैं। इसलिए जो व्यक्ति अपने जीवन में शांति और संतुलन चाहता है, उसे इन विकारों का त्याग करना चाहिए। महावीर का यह संदेश आज के तनावपूर्ण जीवन में अत्यंत उपयोगी है, जहां मानसिक अशांति और असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है।

महावीर स्वामी ने समानता और मानवता का भी अद्वितीय संदेश दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जन्म से नहीं बल्कि कर्म से व्यक्ति महान बनता है। यदि कोई उच्च कुल में जन्म लेकर भी बुरे कर्म करता है तो वह श्रेष्ठ नहीं हो सकता जबकि निम्न कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि सदाचार और सद्विचार अपनाता है तो वह सम्मान का अधिकारी है। यह विचार सामाजिक समरसता और समानता की नींव को मजबूत करता है। उनकी दृष्टि में सेवा भी सर्वोच्च धर्म है। रोगियों और जरूरतमंदों की सेवा को उन्होंने ईश्वर की सेवा से भी बढ़कर बताया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से मुक्ति के अधिकारी हैं, जो उनके प्रगतिशील और समतामूलक विचारों को दर्शाता है।

आज जब समाज हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भगवान महावीर की अमृतवाणी हमें आत्मशुद्धि, सह-अस्तित्व और शांति का मार्ग दिखाती है। यदि हम उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में आत्मसात कर लें तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन और शांति स्थापित हो सकती है बल्कि समाज में भी सद्भाव, करुणा और अहिंसा की स्थापना संभव है। यही महावीर स्वामी के संदेश की वास्तविक सार्थकता है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी।