ट्रंप युग की नई भू-राजनीति, इंटरनेशनल गैंगस्टर की छवि और भारत-यूरोप की मदर ऑफ ऑल डील्स

The new geopolitics of the Trump era, the image of the international gangster, and the mother of all India-Europe deals

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है,जहाँ अंतरराष्ट्रीय नियम, संप्रभुता की अवधारणा और बहुपक्षीय सहयोग की नींव हिलती दिखाई दे रही है।अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा कथित रूप से नया अमेरिकी नक्शा पेश करना,ग्रीनलैंड,ब्रिटेन और वेनेजुएला को लेकर आक्रामक दावे करना और टैरिफ़ युद्ध को हथियार बनान ये सब संकेत देते हैं कि विश्व राजनीति अब कूटनीति से अधिक दबाव और धमकी की भाषा में बात कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित भारत- ईयू मुक्त व्यापार समझौता एक वैकल्पिक वैश्विक आर्थिक धुरी के रूप में उभरता दिखाई देता है।

ट्रंप प्रशासन टैरिफ़ को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहें है। पहले चीन,फिर यूरोप और अब सहयोगी देशों पर भी शुल्क बढ़ाने की धमकी,यह नीति वैश्विक व्यापार को अस्थिर कर रही है।यानें अब मित्रों को भी शत्रु बना रही अमेरिकी नीति। यूरोपीय संघ पर 1 फरवरी से 10 प्रतिशत और उसके बाद 25 प्रतिशत तक टैरिफ़ लगाने की चेतावनी ने यूरोप को वैकल्पिक आर्थिक साझेदार खोजने के लिए मजबूर कर दिया है।यही वह क्षण है जहाँ भारत एक विश्वसनीय और स्थिर विकल्प के रूप में उभरता है।ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका का आक्रामक रुख केवल यूरोप ही नहीं, रूस के लिए भी एक अवसर बन गया है। रूस द्वारा इस मुद्दे को अपनी रणनीति में शामिल करना दर्शाता है कि महाशक्तियाँ अब छोटे क्षेत्रों और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए खुलकर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। यह स्थिति शीत युद्ध के बाद की उस व्यवस्था को चुनौती देती है, जिसमें सीमाएँ अपेक्षाकृत स्थिर मानी जाती थीं।

साथियों बात अगर हम ट्रंप की भू-राजनीतिक सोच: नक्शे बदलने की महत्वाकांक्षा या रणनीतिक दबाव? इसको समझने की करें तो, ट्रंप की विदेश नीति पारंपरिक अमेरिकी कूटनीति से भिन्न रही है। उन्होंने अमेरिका फर्स्ट के नारे को केवल घरेलू नीति तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे वैश्विक व्यवस्था पर थोपने का प्रयास किया। ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश,वेनेजुएला के संसाधनों पर अप्रत्यक्ष दावे और ब्रिटेन सहित यूरोपीय सहयोगियों पर दबाव ये सभी कदम एक ऐसी सोच को दर्शाते हैं जहाँ भूगोल भी सौदेबाज़ी का हिस्सा बन जाता है। यह सवाल अब गंभीर है कि क्या ट्रंप सचमुच दुनियाँ का भूगोल बदलना चाहते हैं या यह केवल आर्थिक-राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है।ट्रंप की नीतियों से अब केवल प्रतिद्वंद्वी ही नहीं,बल्कि सहयोगी देश भी असहज महसूस करने लगे हैं। ब्रिटेन की संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी लिबरल डेमोक्रेट के नेता एड डेवी द्वारा ट्रंप को इंटरनेशनल गैंगस्टर और अमेरिका का अब तक का सबसे भ्रष्ट राष्ट्रपति कहना केवल एक बयान नहीं, बल्कि ट्रांस- अटलांटिक रिश्तों में आई दरार का प्रतीक है।यह प्रतिक्रिया दर्शाती है कि अमेरिका -यूरोप संबंध अब विश्वास की बजाय संदेह और असंतोष पर सटीक टिके नज़र आ रहे हैं।

साथियों बात अगर हम भारत- यूरोपीय संघ संबंधों का ऐतिहासिक संदर्भ इसको समझने की करें तो,भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते की चर्चा कोई नई नहीं है। इसकी शुरुआत 2007 में हुई थी,लेकिनटैक्स बौद्धिक संपदा अधिकार, पर्यावरण मानकों और श्रम नियमों जैसे मुद्दों पर मतभेदों के कारण यह 2013 तक लटक गई। 2022 में बातचीत फिर शुरू हुई, पर वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण प्रक्रिया धीमी रही। अब 27 जनवरी 2026 को इसके पूर्ण होने की संभावना एक ऐतिहासिक मोड़ मानी जा रही है।यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन द्वारा इस प्रस्तावित समझौते को मदर ऑफ ऑल डील्स कहना इसके महत्व को रेखांकित करता है। दो अरब से अधिक आबादी वाला यह संयुक्त बाजार न केवल व्यापारिक नियमों को सरल बनाएगा,बल्कि वैश्विक जीडीपी का एक नया पावर हाउस भी तैयार करेगा।यूरोप के 27 देशों को फर्स्ट मूवर एडवांटेज मिलने की बात यह दर्शाती है कि ईयू इस समझौते को रणनीतिक दृष्टि से कितना अहम मानता है। भारत के लिए क्यों निर्णायक है यह समझौता?अमेरिकी बाजार में हालिया उतार-चढ़ाव और संभावित मंदी के डर ने भारत के लिए निर्यात जोखिम बढ़ा दिए हैं। ऐसे में यूरोपीय संघ के साथ एक स्थिर और दीर्घकालिक व्यापार साझेदारी भारत के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी। यह समझौता भारत को केवल बाजार नहीं, बल्कि नियम- आधारित व्यापार व्यवस्था में एक मजबूत स्थान भी देगा।

साथियों बात अगर हम इस समझौते से रोज़गार -प्रधान उद्योगों को सबसे बड़ा लाभ मिलने की करें तो,भारत के कपड़ा, रेडीमेड गारमेंट और चमड़ा उद्योग जैसे सेक्टर, जहाँ लाखों लोग काम करते हैं, इस समझौते से सबसे अधिक लाभान्वित होंगे। अभी यूरोप में भारतीय उत्पादों पर 2 से 12 प्रतिशत तक शुल्क लगता है।एफटीए के बाद यह टैक्स घटेगा या समाप्त होगा?,जिससे भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे और घरेलू रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा।दवा उद्योग और फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड की भूमिका-भारत को पहले ही दुनियाँ की दवाइयों की दुकान कहा जाता है। यूरोपीय बाजार में जेनेरिक दवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन कड़े नियमों के कारण भारतीय कंपनियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस समझौते के बाद मंजूरी प्रक्रिया सरल होने से भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए विशाल अवसर खुलेंगे।केमिकल समुद्री उत्पाद और नए अवसर- केमिकल उद्योग और समुद्री उत्पादों के निर्यात में भी भारत को बड़ा लाभ मिलने की संभावना है।

यूरोप जैसे उच्च- मानक बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुँच बढ़ना न केवल व्यापार बढ़ाएगा,बल्कि गुणवत्ता सुधार और तकनीकी उन्नयन को भी प्रोत्साहित करेगा।यूरोप के लिए भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदार है जो एशिया में स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थक है। अमेरिका के अनिश्चित रवैये के बीच भारत- ईयू संबंध यूरोप को एक सटीक वैकल्पिक शक्ति संतुलन प्रदान करते हैं। भारतीय उपभोक्ताओं पर प्रभाव: सस्ती लग्ज़री? इस समझौते के बाद यूरोप की कार कंपनियाँ,मर्सिडीज,बीएमडब्ल्यू ऑडी भारत में अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। साथ ही, यूरोप से आने वाली शराब और वाइन पर टैक्स कम होने से भारतीय बाजार में उनकी कीमत घट सकती है। यह भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक नया अनुभव होगा, लेकिन घरेलू उद्योगों के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ाएगा।

साथियों बात कर हम भारत की कूटनीतिक चतुराई: गणतंत्र दिवस और ईयू अतिथि इसको समझने की करें तो, भारत द्वारा अपने 77वें गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना केवल प्रतीकात्मक नहीं,बल्कि एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश है। यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक राजनीति में किस दिशा में अपने रिश्तों को प्राथमिकता दे रहा है।जहाँ ट्रंप की नीति दबाव, धमकी और एकतरफा फैसलों पर आधारित है,वहीं भारत-ईयू समझौता संवाद, सहमति और बहुपक्षीय सहयोग का उदाहरण है। यह टकराव केवल नीतियों का नहीं,बल्कि दुनियाँ को देखने के दो अलग-अलग नज़रियों का है।अमेरिका की आक्रामक नीतियाँ और यूरोप-भारत की नजदीकियाँ संकेत देती हैं कि वैश्विक शक्ति संतुलन धीरे-धीरे बहुध्रुवीय हो रहा है। अब कोई एक देश अकेले नियम तय नहीं कर सकता।व्यापार,तकनीक और कूटनीति में साझेदारियाँ निर्णायक भूमिका निभाएँगी।आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि दुनियाँ टकराव के रास्ते पर जाती है या सहयोग के। ट्रंप की शैली तात्कालिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में अस्थिरता बढ़ाती है।इसके विपरीत भारत-ईयू जैसी साझेदारियाँ स्थिरता और साझा समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नई विश्व व्यवस्था की आहट साफ दिख रही है,डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ, ब्रिटेन की तीखी प्रतिक्रियाएँ और भारत-यूरोप की मदर ऑफ ऑल डील्स ये तीनों घटनाएँ मिलकर एक नई विश्व व्यवस्था की आहट देती हैं। यह वह दौर है जहाँ कब्ज़े की राजनीति और सहयोग की अर्थव्यवस्था आमने-सामने खड़ी हैं। भारत-ईयू समझौता केवल व्यापारिक करार नहीं, बल्कि उस वैकल्पिक वैश्विक भविष्य की नींव है, जहाँ नियम, साझेदारी और संतुलन सर्वोपरि होंगे।