
नरेंद्र तिवारी
ईश्वरीय सत्ता के दर्शन प्रकृति से निकटता बनाकर ही सम्भव है। मुझे तो प्रकृति मे ईश्वर की सत्ता का आभास होता है। मै यह सोचकर अचंभित हो जाता हूं की रोज सुबह होती है, रोज शाम होती है, रात भी रोज ही होती है, समय पर यह क्रम बना हुआ है, जो अनवरत चलता रहता है। ठंड, गर्मी, बरसात का सिलसिला भी अनवरत जारी है। नदी, आकाश, सूरज, चंन्द्रमा, तारे, पेड़, जंगल, पहाड़ यह सब ईश्वरीय सत्ता के प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रकृति को ईश्वरीय सत्ता मानने का सबसे अधिक विश्वास किसी संस्कृति मे है तो वह है सनातनी संस्कृति मे जिसमे प्रकृति को ही ईश्वर मानने का विश्वास व्यक्त किया है। सूरज को अर्ध्य, पेड़ो की पूजा, नदियों को वंदन और प्रकृति के आदर का भाव जो भारतीय सनातनी संस्कृति मे दर्शाया गया है, वह दुनियाँ के समक्ष उच्च मापदंड स्थापित करने वाला है। दुनियां बहुत विशाल है, एक मानव के लिये इसे पूर्ण रूप से देख पाना सम्भव भी नहीं दिखाई देता है। किंतु इंसान प्रकृति के निकट पंहुचा है। जल, थल, नभ सभी प्रकृति के विभिन्न रूप है। नदी, जंगल, सागर आकाश, पहाड़ आदि की निकटता मे ईश्वरीय दर्शन का आनुभव किया है। मैंने अपने जीवन मे सागर की यात्रा कुल दो बार की है। मुंबई के गेटवे आफ इण्डिया के सामने से जहाजनुमा बोट मे बैठकर एलीफेंटा की यात्रा का अनुभव है। अरब सागर मे गेटवे आफ इण्डिया से एलीफेंटा की गुफा पहुंचने मे आधा घंटा या इससे कम समय लगता है, किंतु अरब सागर की नीली जलराशि को चिरते हुए हमारी बोट आगे बढ़ी तो प्रकृति की सुंदरता के दर्शन हुए, समुद्र की एक अलग दुनिया है, बोट के किनारे खडे होकर हाथ मे खाने की सामग्री रखकर हाथ ऊपर करते ही सफ़ेद रंग के सेगुल पक्षीयों का झुण्ड आपसे खाने की सामग्री अपनी चोंच मे दबाकर जब फुर्र होता है, तब समुद्री यात्रा के इस पक्ष से परिचित होने का अवसर मिलता है। पक्षीयों का यह समूह लगातार आपकी नाव के चक्कर काटते रहते है, जब तक कोई उन्हें सामग्री खिलाता रहे। सागर की यात्रा का यह पहला अवसर था। इससे पूर्व और बाद मे समुद्र देवता के दर्शन मुंबई, चेन्नई, भेंटद्वारिका और दिव मे करने का शुभावसर प्राप्त हुआ। सागर की लहरों का मचलना और खुद मे सिमटना, प्राकृतिक सुंदरता के दर्शन कराता है। सनातन संस्कृति मे समुन्द्र को देवता के रूप देखा जाता है। वरुण को जल और समुद्र का देवता कहा जाता है। रामायण मे वरुण देवता से भगवान श्रीराम द्वारा मदद मांगी जाने का प्रसंग शामिल है। हिन्दू चिंतन मे समुद्र मंथन की कथा प्रसिद्ध है, जिसमे देवताओं और असुरो ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, जिससे अमृत और बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त हुई थी। जल मे सागर के बाद मानवीय सभ्यता के विकास मे नदियों का बड़ा महत्व है। भारत मे नदियों को पूजने की परम्परा भी वैदिककाल से चली आ रही है। गंगा, जमुना, सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज मे दुनियां ने भारतीय संस्कृति के गर्व प्रयागराज महाकुम्भ को देखा, सदियों से नदियों किनारे लगते आ रहे भारतीय संस्कृति के इन कुम्भ मेलों के आयोजनों मे भी नदियों की महत्ता को प्रतिपादित किया है, बारह वर्ष मे लगने वाले चार कुम्भ हरिद्वार गंगा, प्रयागराज त्रिवेणी संगम, नाशिक गोदावरी तट और उज्जैन शिप्रा के तट पर अनेकानेक बरसों से आयोजित होते आ रहे है। सनातन संस्कृति मे नदियों को माता कहकर सम्बोधित किया गया है। नदियों को पवित्र माना जाता है, वें जीवन और मोक्ष का प्रतिक है। जल और अन्न प्रदान करती है। भारत मे सप्तनदी मे गंगा, जमुना, सरस्वती, सिंधु, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी शामिल है जिनका हिन्दू पौराणिक ग्रंथो मे उल्लेख है। नदियों मे माँ गंगा के दर्शन का अवसर 5 से अधिक बार मिला ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयागराज और काशी गंगा किनारे यह स्थल आस्था और भक्ति के महत्वपूर्ण केंद्र है, गंगा के तेज बहाव और शीतलता का अनुभव हरिद्वार मे गंगा स्नान के दौरान हुआ, हर की पेड़ी पर हिमालय से अवतरित गंगा के सबसे सुंदर और वैभव शाली रूप के दर्शन होते है। हरिद्वार उत्तराखंड मे है, इस प्रदेश को देव भूमि इसलिए कहा जाता है की यह प्राकृतिक सम्पदाओं से अच्छादित है, अपनी देहरादून और मसूरी की यात्रा के दौरान प्रकृति के निकटता से दर्शन हुए। माँ गंगा के बाद नदियों मे मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी माँ नर्मदा के दर्शन करने का सबसे अधिक बार अवसर मिला, अमरकंटक माँ नर्मदा के उदगम स्थल से जबलपुर मे बेहद सकरी नर्मदा की जलधारा फिर होशंगाबाद अब नर्मदापुरम सेठानी घाट पर माँ के दर्शन स्नान का अवसर महेश्वर का सुन्दर घाट और माँ नर्मदा की कलकल ध्वनिरत धाराएं जो गुजरात राज्य मे प्रवेश से पूर्व एमपी के बड़वानी जिले को पल्लवीत, पुष्पीत और सिंचित करती आ रहीं है। माँ नर्मदा के किनारे स्थित शहर धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न दिखाई देते है, नदियाँ मानव के विकास मे सहायक है, नदी किनारे स्थित शहर गांव उन्नत खेती से लगातार विकसित होते जा रहे है। पहाड़ो, जंगलो को भी सनातन संस्कृति मे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। गिरिराज गोवर्धन को देव मान्यता प्राप्त है, इस पर्वतराज को जो यूपी के मथुरा जिले से 22 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है, भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के कोप से बचाने के लिये 7 दिनों तक अपने वाम हस्त की कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन को उठाकर रखा था। अपने जीवन मे सतपुड़ा के पर्वतों को निकटता से देखा जहाँ पेड़, पौधे, वनस्पति जंगलवासियों के जीवन यापन के प्रमुख साधन होते है। यहां जंगली जीव जंतु भी निवास करते है। वन विभाग ने जंगलो और जंतुओ को सहजने के लिये राष्ट्रीय उद्यान शुरू किये है। इस तरह उमरिया जिला स्थित बाँधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान मे जाने का अवसर मिला यहां वन विभाग की टीम के साथ खुले जीप वाहन मे घूमे तो देखा टाइगर और जंगल के जीव जंतु वनविभाग की उस टीम पर हमला नहीं करते जो प्रतिदिन उनके भोजन पानी और अन्य इंतजाम मे लगे होते है, वाहनो को भी पहिचानते है। सामने टाइगर अपनी मस्ती मे बैठा है, उससे कुछ ही मीटर की दुरी पर जीप मे सवार यात्री टाइगर की फोटो ले रहे है। भय यह भी की टाइगर हमला न कर दे किंतु टाइगर सहित जंगली जानवरो की देखने की यह मंशा बाँधव गढ़ मे ही पूर्ण हो सकी इस यात्रा ने प्रकृति को निकट से देखने का अवसर भी निर्मित किया। पेड़, पौधों, जीव, जंतुओं को पूजने की संस्कृति वाले देश मे देखा जा रहा है की वनों की अनाधून कटाई की जा रही है, जंगली जंतुओं का शिकार किया जा रहा है, नदियों को महज रेत की खदान और पहाड़ो को गिट्टी, मिट्टी के सासाधनों के रूप मे इस्तेमाल किया जा रहा है। जंगलो की कटाई निरंतर जारी है, जिसने पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ दिया है। मानव शरीर पंच तत्वों से बना है, भारतीय दर्शन मे इन पंच तत्वों को सभी पदार्थो का मूल माना गया है, इनसे ही सृष्टि का हर पदार्थ बना है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि तत्वों की महत्ता है। इन्ही तत्वों से तो हमारी प्रकृति निर्मित है। अपनी हवाई जहाज यात्राओं के दौरान बादलों के ऊपर उड़ने के अनुभव को महसूस किया। ऊंचाई से धरती को देखा जो बहुत छोटी नजर आती है। जीवन के पांच दशकों मे धार्मिक स्थलों के दर्शन किये, किंतु महसूस किया की ईश्वर प्रकृति मे बसता है, प्रकृति ही ईश्वर है। जल, जंगल, जमीन को सहजने की आवश्यकता है। भारतीय परम्पराओं मे सागर, धरती, पेड़, पौधे, पहाड़, जीव, जंतुओं मे ईश्वर का वास माना जाता है। जो प्रकृति का दोहन कर प्रकृति का नाश कर रहे है, प्रकृति का नाश करने वाले असली सनातनी नहीं हो सकते है, असली सनातनी सदैव प्रकृति पूजक रहे है। जो प्रकृति से प्रेम भी करते है और प्रकृति की रक्षा भी करते है, जो प्रकृति के निकट है, यह मानकर चलिए वह ईश्वर के सबसे अधिक करीब है।