आलोक बाजपेयी
अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प ने जबरन शुरू किये गए ईरान युद्ध के नकारात्मक माहौल के बीच टेक्सास के ब्राउंसविले में 50 वर्षों बाद अमेरिका में नई ऑयल रिफाइनरी बनाये जाने की घोषणा की. भारत के लिए सबसे ख़ास बात यह है कि “यूएस फर्स्ट” के अंतर्गत 300 अरब डॉलर या लगभग 28 लाख करोड़ रुपयों की परियोजना में भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज का निवेश होगा। ट्रंप के मुताबिक इससे अमेरिका ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र में अपना दबदबा बना सकेगा, हज़ारों नौकरियां मिलेंगी और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी। उधर रिलायंस पहले से ही ऑइल रिफ़ायनरी क्षेत्र में बहुत बड़ा नाम है और यह डील रिलायंस को एक शुद्ध भारतीय कंपनी से बदलकर एक ‘ग्लोबल एनर्जी जायंट’ बना देता है। यह महज एक व्यापारिक समझौता न होकर ट्रम्प के लिए जहाँ घरेलू और वैश्विक, दोनों राजनीति के हिसाब रणनीतिक फ़ायदे का कदम है, वहीं मुकेश अम्बानी के लिए ‘बिज़नेस मास्टरस्ट्रोक’ के साथ दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से सीधे सम्बन्ध बनाकर ‘राजनीतिक कवच’ प्राप्त करने का सौदा। ट्रम्प और रिलायंस के लिए ‘विन – विन’ वाली इस डील से क्या भारत के हित प्रभावित होंगे – जी हाँ, निश्चित तौर पर. क्या ये डील उतनी बड़ी है, जितना इसका आकार नज़र आता है – जी बिलकुल नहीं। आइये, समझें इस सौदे के तमाम पहलुओं को जिनके दूरगामी परिणाम होंगे।
300 बिलियन डॉलर का आँकड़ा सुनकर घबराइए मत
जबसे इस डील की ख़बर आई है, कुछ क्षेत्रों में एक भ्रम यह बन गया है कि इतनी बड़ी राशि का निवेश रिलायंस तुरंत करेगा। लोग सवाल पूछने लगे कि क्या रिलायंस के पास इतना पैसा है ? कुछ टिप्पणीकारों ने लिखा कि 300 बिलियन डॉलर तो कुछ छोटे देशों की जीडीपी से भी ज़्यादा है, क्या इतनी बड़ी रिफ़ाइनरी बनेगी ? दरअसल $300 बिलियन ‘अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग’ के साथ यह 20 वर्षों के सौदे का कुल आर्थिक मूल्य है, ऑफ़टेक वैल्यू है – न कि केवल निर्माण लागत. इसमें 1.2 बिलियन बैरल अमेरिकी शेल तेल खरीदने का समझौता शामिल है, जिसकी वैल्यू 125 बिलियन डॉलर है, शेष 175 बिलियन डॉलर बनने वाले रिफाइंड उत्पादों की वैल्यू है. रिफ़ायनरी बनाने के लिए रिलायंस को महज 1.2 बिलियन डॉलर जुटाने होंगे जो अंतर्राष्ट्रीय क़र्ज़ और इक्विटी वगैरा के रास्ते से भी आ जायेंगे और एशिया के सबसे रईस आदमी की कंपनियों के पास इससे अधिक का कैश रिज़र्व भी है.
अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फायदा, ट्रम्प की राजनीति को महाफायदा
डोनाल्ड ट्रंप के लिए रिलायंस के साथ यह $300 बिलियन की डील केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि यह उनकी राजनीतिक और आर्थिक रणनीति का एक बड़ा हिस्सा है। ट्रंप इस डील को अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति की एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं। 50 साल बाद अमेरिका में पहली बार कोई नई बड़ी रिफाइनरी बन रही है, जो यह दर्शाती है कि उनकी नीतियाँ (जैसे टैक्स में कटौती और परमिट प्रक्रियाओं को आसान बनाना) विदेशी निवेश को वापस अमेरिका ला रही हैं। वे इसे अमेरिका का ऊर्जा प्रभुत्व (Energy Dominance) बढ़ाने वाला कदम बता रहे हैं और अमेरिका को दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उत्पादक और निर्यातक बनाने को अपना लक्ष्य। यह रिफाइनरी विशेष रूप से अमेरिकी शेल तेल (Shale Oil) को प्रोसेस करने के लिए बनाई जा रही है। इससे अमेरिका की विदेशी तेल (जैसे मिडिल ईस्ट) पर निर्भरता कम होगी और उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी। ट्रंप इससे संभावित हज़ारों नौकरियों को अमेरिकी श्रमिकों और दक्षिण टेक्सास के लोगों के लिए एक “ऐतिहासिक जीत” बता रहे हैं, जो उनके राजनीतिक आधार या वोट बैंक को मजबूत करने में मदद करेगा। इस डील के तहत भारत (रिलायंस) अरबों डॉलर का अमेरिकी तेल खरीदेगा, जिससे अमेरिका का व्यापार घाटा (Trade Deficit) कम होगा। ट्रंप ने दावा किया है कि यह “दुनिया की सबसे स्वच्छ रिफाइनरी” होगी, इससे उन्हें उन आलोचकों को जवाब देने में मदद मिलेगी जो उनके जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) के समर्थन को पर्यावरण विरोधी बताते हैं।
अमेरिका और ट्रम्प के लिए इस रिफ़ायनरी के भू -राजनीतिक या जिओ पॉलिटिकल लाभ भी कम नहीं। वर्तमान में चल रहे ईरान-इजरायल युद्ध और मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच, घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाना ट्रंप के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचने का एक तरीका है। इससे अमेरिका वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों को नियंत्रित करने और निर्यात बढ़ाने में सक्षम होगा। संक्षेप में, यह डील ट्रंप को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करती है जो “नौकरियां वापस ला रहा है,” “अमेरिकी ऊर्जा को सुरक्षित कर रहा है,” और “विदेशी निवेश को आकर्षित कर रहा है”।
मुकेश अंबानी की उड़ान : भारतीय उद्योगपति से वैश्विक ऊर्जा पॉवरहाउस
रिलायंस इंडस्ट्रीज और निजी तौर पर मुकेश अम्बानी के कद पर पर इस $300 बिलियन की डील का असर काफी गहरा और दूरगामी हो सकता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ पहले ही गुजरात के जामनगर में दुनिया के सबसे बड़े रिफ़ाइनरी कॉम्प्लेक्स का संचालन करती है। अमेरिका जैसे विकसित और अत्यधिक विनियमित ऊर्जा बाजार में निवेश करना इस बात का संकेत होगा कि वह अब सिर्फ घरेलू दिग्गज नहीं बल्कि ExxonMobil, Shell plc और Saudi Aramco जैसे वैश्विक खिलाड़ियों की श्रेणी में दिखने लगेगी। 20 साल के लिए कच्चे तेल की सप्लाई सुनिश्चित होना रिलायंस के ‘एनर्जी और रिटेल’ पोर्टफोलियो को मजबूती देता है। विश्लेषक रिलायंस की ग्रॉस रिफ़ाइनिंग मार्जिन GRM (प्रति बैरल कच्चे तेल को रिफाइन करने पर होने वाली कमाई) पर कड़ी नजर रखते हैं। अमेरिकी शेल तेल अक्सर सस्ता होता है और इससे तैयार माल जेट फ्यूल – डीज़ल आदि को महंगे अमेरिकी/यूरोपीय बाज़ारों में बेचने से रिलायंस का मुनाफा बढ़ेगा। इस डील के बाद मूडीज़ (Moody’s) और एसएंडपी (S&P) जैसी वैश्विक एजेंसियाँ रिलायंस की क्रेडिट रेटिंग बढ़ा सकती हैं। इससे रिलायंस को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से बहुत कम ब्याज दर पर क़र्ज़ मिल सकेगा, जो शेयर की वैल्यू के लिए सकारात्मक है। रिलायंस पहले से ही भारत की सबसे मूल्यवान कंपनी है। इस डील के जरिए अमेरिका में अपनी भौतिक उपस्थिति दर्ज कराके, रिलायंस वैश्विक निवेशकों (FIIs) के लिए और भी आकर्षक हो जाएगी, जिससे इसका मार्केट कैप कई गुना बढ़ सकता है। रिफाइनिंग से निकलने वाले बाय-प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल रिलायंस के पेट्रोकेमिकल्स और प्लास्टिक बिज़नेस में होता है। अमेरिका में गैस और कच्चे माल की प्रचुरता रिलायंस के इस सेगमेंट को भी वैश्विक स्तर पर और प्रतिस्पर्धी बनाएगी। मुकेश अंबानी की रिलायंस अब केवल अमेरिकी तेल नहीं खरीदेगी, बल्कि अमेरिकी ऊर्जा ढांचे का हिस्सा बन रही है। इससे रिलायंस को मध्य पूर्व की अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।
लेकिन मुकेश अम्बानी ने यह डील सिर्फ आर्थिक फायदे के लिए नहीं की है बल्कि उन्हें कई रणनीतिक, राजनीतिक और वैश्विक प्रभाव वाले फायदे भी मिल सकते हैं. रिलायंस को अमेरिकी राजनीतिक-व्यावसायिक नेटवर्क तक सीधी पहुँच मिलेगी। इससे कंपनी को भविष्य की ऊर्जा नीतियों, लॉबिंग और रणनीतिक साझेदारियों में फायदा मिल सकता है। और सबसे बड़ा लाभ दुनिया के सबसे. शक्तिशाली व्यक्ति ट्रम्प से नज़दीकी के बाद मिलने वाला सुरक्षा कवच है. ट्रम्प का भारत की नीतियों पर भी प्रत्यक्ष असर दिखता है. ऐसे में व्हाइट हाउस की ‘गुड बुक’ में होना देश में भी कई मामलों में अलग वज़न रखता है और कुछ विशेषाधिकार दिलाता है .
डील की चमक के पीछे भारत की संभावित चिंताएँ
जहाँ यह डील रिलायंस और ट्रंप के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है, वहीं राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए इसमें कुछ चुनौतियाँ और संभावित नुकसान भी हो सकते हैं। इन्हें भी समझना आवश्यक है . पहला नुक़सान है कच्चे तेल के “डॉलर” में भुगतान से विदेशी मुद्रा का बाहर जाना या Forex Outflow. भारत पहले से ही अपने व्यापार घाटे और गिरते रुपये से जूझ रहा है। जब रिलायंस अमेरिका से सैकड़ों बिलियन का तेल खरीदेगा जिसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में होगा। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) पर दबाव पड़ सकता है और रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले और अधिक कमजोर हो सकती है। दूसरा संभावित नुकसान है रूस के साथ रिश्तों पर असर. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से बहुत सस्ता तेल खरीदा है, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को काफी सहारा मिला है। अगर भारत रिलायंस के जरिए अमेरिका की ओर ज़्यादा झुकता है तो पुराने और भरोसेमंद सहयोगी रूस के साथ हमारे रणनीतिक और ऊर्जा संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
“मेक इन इंडिया” बनाम “मेक इन अमेरिका” का सवाल भी इस डील से उभरेगा। प्रधानमंत्री मोदी का एक घोषित लक्ष्य भारत को एक ‘ग्लोबल रिफ़ाइनिंग हब’ बनाना है। जब भारत की सबसे बड़ी कंपनी नई रिफाइनरी अमेरिका में लगाती है, तो वह निवेश, व्यवसाय और रोज़गार भारत के बजाय अमेरिका को मिल रहा है. भविष्य में अमेरिका में सत्ता बदलती है या उनकी नीतियां बदलती हैं (जैसे प्रतिबंध या टैरिफ), तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा एक नए किस्म के अमेरिकी दबाव में आ सकती है।
अमेरिका अक्सर अपनी ऊर्जा सप्लाई को कूटनीतिक हथियार (Diplomatic Tool) के रूप में इस्तेमाल करता है। एक मुद्दा घरेलू तेल की कीमतों पर असर का भी है. यह ज़रूरी नहीं है कि रिफ़ाइन होने वाले तेल उत्पाद भारतीय उपभोक्ताओं को सस्ते मिलें क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की कीमतों और लंबी शिपिंग दूरी पर निर्भर करेगा। इसलिए भारत में कीमतों में कटौती की गारंटी नहीं है। अभी रिलायंस के साथ भारतीय सरकारी कंपनियां – इंडियन ऑइल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और निजी रिफ़ाइनर जैसे भारतीय-रूसी तेल शोधन कंपनी नायरा एनर्जी यूरोप और अफ्रीका को भारी मात्रा में डीजल और पेट्रोल निर्यात करते हैं। चूँकि रिलायंस अब अमेरिका के अंदर ही रिफ़ाइनरी लगा रही है, वह सीधे तौर पर इन वैश्विक बाजारों में कम शिपिंग लागत के साथ उत्पाद बेच पाएगी जिससे अन्य भारतीय कंपनियों का निर्यात मार्जिन कम हो सकता है।
एक बड़ी चिंता यह भी है कि यदि अमेरिकी रिफाइनिंग क्षमता बहुत बढ़ जाती है तो वैश्विक ईंधन बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे भारत की अपनी रिफाइनरी निर्यात क्षमता पर दबाव पड़ सकता है।
निष्कर्ष: किसके हिस्से क्या?
यह डील रिलायंस के लिए एक “बिजनेस मास्टरस्ट्रोक” है, लेकिन भारत सरकार के लिए यह एक संतुलन बनाने की चुनौती होगी। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि अमेरिका के साथ नज़दीकी बढ़ाने के चक्कर में हमारे पुराने सहयोगी रूस और मिडिल ईस्टके देश नाराज़ न हों और देश का पैसा बाहर जाने के साथ-साथ देश के भीतर भी निवेश आता रहे। भारत का व्यापार संतुलन या बैलेंस ऑफ़ ट्रेड अनुकूल बना रहे जिससे रूपये का और अवमूल्यन न हो . आख़िरकार यह रिफाइनरी डील केवल ऊर्जा व्यापार का मामला नहीं, बल्कि सत्ता, पूंजी और वैश्विक रणनीति के जटिल गठजोड़ की कहानी है। इससे रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और उसके मुखिया मुकेश अम्बानी को वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में नई ताक़त मिल सकती है, जबकि राजनीतिक स्तर पर इसका तात्कालिक लाभ डोनाल्ड ट्रम्प को भी मिलता दिख रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी डीलें केवल कॉरपोरेट और राजनीतिक विजय के रूप में देखी जाएँ, या फिर उन्हें राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता की कसौटी पर भी कसा जाए।





