दिलीप कुमार पाठक
आज 28 फरवरी का दिन पूरे भारत के लिए गौरव और आत्मसम्मान का प्रतीक है, क्योंकि आज हम राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मना रहे हैं। यह दिन महान भारतीय भौतिक विज्ञानी सर सी.वी. रमन की उस अद्भुत खोज ‘रमन प्रभाव’ को समर्पित है, जिसने पूरी दुनिया की वैज्ञानिक समझ को एक नई दिशा दी और भारत को भौतिकी के क्षेत्र में पहला नोबेल पुरस्कार दिलाया। अक्सर हम विज्ञान को केवल बंद कमरों की प्रयोगशालाओं और जटिल सूत्रों का समूह मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में विज्ञान हमारी जिज्ञासा और सत्य की खोज का दूसरा नाम है। सर रमन का सफर हमें सिखाता है कि बड़े आविष्कारों के लिए केवल महंगे उपकरणों की नहीं, बल्कि एक पैनी नजर और कुछ नया सोचने के जुनून की जरूरत होती है। समुद्र के पानी का रंग नीला क्यों होता है, इस एक साधारण से सवाल ने उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी खोजों में से एक तक पहुँचा दिया। यह जानना दिलचस्प है कि जिस उपकरण से उन्होंने इतनी बड़ी खोज की, उसकी कुल लागत उस समय मात्र 200 रुपये के आसपास थी, जो आज के युग के लिए एक बड़ी प्रेरणा है कि आविष्कार बजट से नहीं बल्कि बुद्धि से होते हैं। अक्सर लोग समझते हैं कि आज सर रमन का जन्मदिन है, लेकिन असल में 28 फरवरी वह तारीख है जिस दिन उन्होंने अपनी खोज की घोषणा की थी, इसीलिए भारत सरकार ने 1986 में इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मान्यता दी।
आज जब हम 21वीं सदी के भारत की बात करते हैं, तो विज्ञान और तकनीक इसके सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरे हैं। अंतरिक्ष की गहराइयों को नापने वाले हमारे चंद्रयान और मंगलयान मिशन से लेकर वैश्विक महामारी के दौरान रिकॉर्ड समय में तैयार की गई स्वदेशी वैक्सीन तक, भारतीय वैज्ञानिकों ने बार-बार यह साबित किया है कि ‘नवाचार’ ही आत्मनिर्भरता का असली रास्ता है। विज्ञान का असली उत्सव तब सफल होता है जब इसकी पहुँच खेतों में काम करने वाले किसान से लेकर स्कूल में पढ़ने वाले एक साधारण विद्यार्थी तक हो। हमें यह समझना होगा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को तर्क की कसौटी पर परखना और समस्याओं के रचनात्मक समाधान खोजना है। आज भारत जिस तरह से स्टार्टअप्स और डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रहा है, उसमें युवाओं की भूमिका सबसे अहम है। नवाचार केवल नई मशीनों को बनाना नहीं है, बल्कि कम संसाधनों में बेहतर जीवन जीने के तरीके खोजना भी है। आज हमारे सामने ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और जल संकट जैसी बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं, जिनका सामना हम पुरानी सोच से नहीं बल्कि वैज्ञानिक चेतना से ही कर सकते हैं। सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में हो रहे नए प्रयोग इस बात का प्रमाण हैं कि विज्ञान ही भविष्य की सुरक्षा की गारंटी है।
विज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के इस दौर में हमें मानवीय संवेदनाओं और वैज्ञानिक प्रगति के बीच एक संतुलन बनाना होगा। हमें अपने ग्रामीण क्षेत्रों में विज्ञान मेलों और प्रयोगशालाओं का जाल बिछाना होगा ताकि गाँवों की प्रतिभा को भी पंख मिल सकें। स्थानीय स्तर पर होने वाले छोटे-छोटे नवाचार ही भविष्य में बड़े वैश्विक बदलावों की नींव रखते हैं। विज्ञान हमें धैर्य और निरंतर प्रयास की शक्ति सिखाता है, जहाँ हर असफलता अनुसंधान का एक नया रास्ता खोलती है। सर रमन के व्यक्तित्व का एक और पहलू उनका संगीत के प्रति प्रेम था; उन्होंने तबला और मृदंगम जैसे वाद्य यंत्रों की ध्वनि पर भी शोध किया था, जो दर्शाता है कि विज्ञान और कला साथ-साथ चलते हैं। विद्यार्थियों के लिए विज्ञान केवल परीक्षा पास करने का जरिया नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक ऐसी खिड़की होनी चाहिए जिससे वे पूरी दुनिया को नए नजरिए से देख सकें। स्कूलों में जब तक ‘रटने’ की जगह ‘सवाल पूछने’ की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक हम नए ‘रमन’ पैदा नहीं कर पाएंगे। सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों की सफलता भी इसी बात पर निर्भर है कि हम तकनीक के मामले में दुनिया के पीछे चलने के बजाय दुनिया को रास्ता दिखाएं। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने भीतर की जिज्ञासा को कभी मरने नहीं देंगे और हर कार्य को वैज्ञानिक तर्क के साथ करने का प्रयास करेंगे। जब देश का हर नागरिक तार्किक सोच के साथ आगे बढ़ेगा, तभी हम ‘विकसित भारत’ के सपने को हकीकत में बदल पाएंगे। विज्ञान के इस उजाले को समाज के हर कोने तक पहुँचाना और आने वाली पीढ़ियों को नवाचार के लिए प्रेरित करना ही इस दिवस की सच्ची सार्थकता होगी।





