आलोक भदौरिया
दुनिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका की दादागीरी से सारे देश त्रस्त हैं। राष्ट्रपति पद का दूसरा कार्यकाल शुरू करते ही डोनाल्ड ट्रंप ने अपने तेवर जाहिर कर दिए थे। ट्रंप के टैरिफ युद्ध से दुनिया जल्द ही आतंकित होने लगी थी। लेकिन, उनका मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) दुनिया पर दादागीरी का प्रतीक बन गया। वेनेजुएला पर हमला तो सीधे संसाधनों की लूट साबित हो गया। सवाल उठता है कि संसाधनों की लूट क्या नियमों पर आधारित वर्ल्ड ऑर्डर को ध्वस्त कर देगी? ग्रीनलैंड और ईरान को भी अमेरिका ने झुकाने की ठान ली है।
इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी देश के राष्ट्रपति को सेना अपहरण कर ले गई। राष्ट्रपति निकोलस माडुरो को पत्नी समेत अमेरिकी फौजें उठा ले गईं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि माडुरो ड्रग्स के कारोबार को बढ़ावा दे रहे थे। वे घुसपैठ को भी शह दे रहे थे। उनका धांधली के चलते निर्वाचन हुआ था। ट्रंप के आरोप बेहद हास्यास्पद थे। यह जरूर है कि माडुरो की तीसरी जीत विवादों के घेरे में रही है। विपक्ष के नेता एडमुंडो गॉन्जालेज धांधली के कारण चुनाव हार गए।
लेकिन, किसी देश के चुनाव में यदि धांधली होती भी है तो इसके कारण किसी और देश को वहां दखल देने का अधिकार नहीं मिल जाता। भले ही अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक औ सामरिक ताकत हो, उसे भी यह अधिकार नहीं है कि किसी राष्ट्र की संप्रभुता को ताक पर रख दे। हैरानी की बात तो यह है कि दुनिया में चीन और रूस के अलावा किसी भी देश ने इसकी सीधी और तीखी आलोचना नहीं की।
ऐसे हालात क्या ट्रंप को और बढ़ावा नहीं देते हैं? उन्होंने खुद को वहां कार्यकारी राष्ट्रपति घोषित कर दिया। उनकी मंशा साफ थी। वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर अमेरिकी तेल कंपनियों का वर्चस्व साबित करना। क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वेनेजुएला में ही हैं। कोई 307 अरब बैरल। दूसरा बड़ा भंडार सऊदी अरब में है। कोई 267 अरब बैरल। लेकिन, सबसे ज्यादा तेल सप्लाई सऊदी अरब ही करता है। वेनेजुएला की हिस्सेदारी महज एक फीसद के करीब है।
तो क्या अमेरिका ने वहां तेल का अकूत भंडार कब्जे में लेने के लिए राष्ट्रपति माडुरो का अपहरण किया? इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि ट्रंप ने पहली घोषणा में ही कहा कि इसका तकरीबन 2-3 अरब बैरल तेल अमेरिका बेचेगा। इससे प्राप्त रकम का इस्तेमाल वेनेजुएला की भलाई में खर्च किया जाएगा। तेल पाइपलाइन के इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारा जाएगा ताकि यहां फिर से दोहन किया जा सके। इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने तेल कंपनियों से ताबड़तोड़ बैठक भी कर ली है।
क्या यह इतना आसान है? क्या साल दो साल में वेनेजुएला से इतना तेल निकाला जा सकेगा? क्या पाइपलाइन या तेल से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर आनन-फानन में तैयार किया जा सकता है? क्या पूर्ण शांति और सि्थरता स्थापित होने से पहले कोई कंपनी भारी भरकम निवेश करने के लिए तैयार होगी? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि वेनेजुएला में क्या कठपुतली सरकार चलाई जा सकेगी? कब तक? इस सवाल का जवाब तो सामने दिख रहा है। जिस अंदाज में मारिया कोरिना मचाडो ने अपना नोबल पुरस्कार ट्रंप के हवाले किया है, वह बताता है कि सत्ता में बदलाव की रूपरेखा लिखी जा चुकी है।
मौजूदा अंतरिम सरकार चला रही डेल्सी रोड्रीगेज भी दौड़ में पीछे नहीं हैं। उन्होंने पचास मिलियन बैरल क्रूड अमेरिका को देने का समझौता कर लिया है। घटनाक्रम से यह तो तय है कि अमेरिका को मनमाफिक क्रू़ड सप्लाई मिलने में ज्यादा दिक्कत नहीं आने वाली है। यानी संसाधनों पर उसका कब्जा तय है।
अमेरिका ने ऐसा ही बंदोबस्त यूक्रेन में भी पिछले साल किया था। 30 अप्रैल को अमेरिका और यूक्रेन के बीच ‘मिनरल डील’ हुई थी। दोनों देशों ने मिलकर यूएस-यूक्रेन रीकंस्ट्रक्शन इन्वेस्टमेंट फंड बना लिया है। इसमें 150 मिलियन डॉलर निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई है। यहां भी संसाधनों की भरमार है। सत्तर के दशक में दुनिया का 70 फीसद से ज्यादा टाइटेनियम यूक्रेन में ही पाया जाता था। दुनिया का 5 फीसद से ज्यादा क्रिटिकल रेयर अर्थ मैटीरियल अभी भी यहां पाए जाने के आसार हैं।
संभावना इसलिए कि अभी इनकी आधुनिकतम तरीकों से खोज की नई तकनीक यूक्रेन के पास नहीं है। उन्नत तकनीक अमेरिका के पास है।
रेयर अर्थ मैटीरियल में यहां टाइटेनियम, यूरेनियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट, टंग्सटन, वैनेडियम, टेंटालम आदि पाए जाते हैं। ग्रेफाइट का तो 19 मिलियन टन का भंडार है। मोबाइल, ऑटोमोबाइल, ईवी, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स सहित कई सेक्टर में इसका इस्तेमाल होता है।
यूक्रेन के पूर्वी भाग डोनेत्स्क क्षेत्र पर रूस ने कब्जा कर लिया है। जैपोरिझि्या पर भी कब्जा कर लिया है। यह दुनिया का दूसरा बड़ा एटॉमिक संयंत्र है। ट्रंप ने जो शांति प्रस्ताव सामने रखा है उसमें इस पर रूस के कब्जे को माना गया है। यूक्रेन की प्रधानमंत्री यूलिया सेवरीडेंको के मुताबिक रूस के वर्तमान समय में कब्जे में आए क्षेत्रों में 350 अरब डॉलर के रेयर अर्थ मैटीरियल हैं।
वैसे रूस ने ‘नाटो’ को अपनी सीमा के पास पहुंचने से रोकने के लिए यूक्रेन पर ‘सीमित आक्रमण’ किया था। क्योंकि यूक्रेन को नाटो में शामिल करने की तैयारियां चल रही थीं। नाटो में शामिल करने से रूस की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। क्योंकि सीमा पर नाटो देश के उन्नत तकनीक वाले उपकरण तैनात हो जाएंगे। रूस के इस तर्क को खारिज भी नहीं किया जा सकता है। लेकिन, तर्क कोई भी क्यों न गढ़े जाएं, असली मंशा सामने आ रही है। चार साल तक महाशकि्त रूस का यूक्रेन पर हमले का किसी निष्कर्ष तक न पहुंचना भी कुछ तो संकेत देता ही है।
विश्व में सबसे ज्यादा मांग रेयर अर्थ मैटीरियल की है। आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस विकसित करने में सबसे ज्यादा जरूरी अवयव यही है। याद रखें कि चीन पर अमेरिका ने एक समय 145 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया था। जवाबी कार्रवाई में चीन ने बाद में रेयर अर्थ मैटीरियल की सप्लाई रोक दी थी। नतीजतन अमेरिका को झुकना पड़ा था। बाद में अमेरिका ने चीन को एनवीडिया के एच 1200 प्रोसेसर निर्यात करने की भी मंजूरी दी थी। लेकिन, चीन ने लेने से इनकार कर दिया था। ईवी, बैटरी, इलेक्टॉनिक्स, आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस में अब उसी देश का दबदबा बनेगा जो इनके लिए जरूरी रेयर अर्थ मैटीरियल पर कब्जा बनाए रखेगा।
अब तस्वीर थोड़ी साफ होती है। तो बंदरबाट क्या होने के आसार हैं? क्या रूस अपने कब्जे के क्षेत्रों पर कब्जा यानी रेयर अर्थ मैटीरियल पर कब्जा बनाए रखेगा? जिस तरह 2014 में रूस ने क्रीमिया को अपने में मिला लिया था, क्या डोनेत्स्क में भी इसकी पुनरावृति्त हो सकती है?
गौर करने लायक तथ्य यह है कि ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसा ही तर्क रखा है। उनका कहना है कि अमेरिका की सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर उसका कब्जा जरूरी है। अन्यथा रूस और चीन वहां अपना आधिपत्य स्थापित कर लेंगे। ट्रंप ने तो इसके लिए अपने सहयोगी नाटो देशों पर अतिरिक्त टैरिफ थोपने की घोषणा भी कर दी है। एक फरवरी से दस फीसद अतिरिक्त टैरिफ लागू हो जाएगा। यदि डेनमार्क या अन्य नाटो देश विरोध जारी रखते हैं तो इसे तीन महीने बाद और बढ़ाया जा सकता है।
यह तो बाद में ही पता चलेगा कि ट्रंप के दुस्साहस को नाटो देश कब तक चुनौती देते रहेंगे? दूसरे शब्दों में ग्रीनलैंड को अमेरिकी पंजे से कबतक सुरक्षित रख सकेंगे। फिलहाल डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की वार्ता विफल हो चुकी है। दरअसल, अमेरिका ने काफी पहले से ही यहां रडार और अन्य उच्च तकनीक के उपकरण निगरानी के लिए लगा रखे हैं। वह चाहे तो इसे और भी उन्नत कर सकता है, बगैर इसे खरीदे भी। लेकिन, माना जाता है कि यहां भी रेयर अर्थ मैटीरियल प्रचुर मात्रा में है। इसीलिए इसे अमेरिका नहीं छोड़ना चाहेगा।
कुछ ऐसा ही मामला ताईवान को लेकर भी है। दुनिया में सबसे ज्यादा सेमीकंडक्टर यही देश बनाता है। ताईवान को अमेरिका में अपना प्लांट लगाने के लिए खासी छूट मुहैया कराई है। चीन इसे अपना हिस्सा मानता है। अब देखना है कि चीन इसपर कब्जे की मंशा को छोड़ देगा? ईरान में भी तख्ता पलट की अमेरिका की तैयारी जारी है। खामनेई का सत्ता पर नियंत्रण पूरी तरह से खत्म कर वहां भी कठपुतली सरकार बनाने की मंशा है। यदि अमेरिका इसमें सफल हो जाता है तो मध्य पूर्व में उसका आखिरी कांटा भी निकल जाएगा।
तो क्या दुनिया में तेल के कारोबार पर अमेरिका का नियंत्रण स्थापित नहीं हो जाएगा? ऐसा लग रहा है कि दुनिया के ताकतवर देशों में संसाधनों की ‘लूट’ की होड़ मच गई है। इसे सिर्फ राजनीतिक महत्वाकांक्षा या सनक तक सीमित देखना आत्मघाती साबित हो सकता है।





