मणिपुर में नई सरकार की वापसी और खेमचंद सिंह की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा

The return of a new government in Manipur, and Khemchand Singh's toughest political test

अजय कुमार

करीब एक साल तक राष्ट्रपति शासन में रहने के बाद मणिपुर में फिर से चुनी हुई सरकार बनने जा रही है और इस बार सत्ता की कमान युमनाम खेमचंद सिंह के हाथों में होगी. यह बदलाव सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि उस राज्य के लिए एक नई शुरुआत का संकेत है, जो मई 2023 से जातीय हिंसा, विस्थापन और अविश्वास के दौर से गुजर रहा है. मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुआ संघर्ष धीरे-धीरे इतना गहरा हो गया कि पूरा राज्य घाटी और पहाड़ के दो हिस्सों में बंटता दिखने लगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस हिंसा में अब तक 200 से ज्यादा लोगों की जान गई, 60 हजार से अधिक लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए और करीब 350 गांवों में सामान्य जीवन ठप हो गया. हजारों घर, स्कूल, चर्च और मंदिर जला दिए गए, जिससे सामाजिक ढांचा ही नहीं, आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हुईं.

हिंसा के चलते राज्य का प्रशासन लगभग पंगु हो गया था. राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन बाधित हुआ, कई महीनों तक इंटरनेट बंद रहा और व्यापारिक गतिविधियां ठप पड़ गईं. अनुमान है कि इस संकट से मणिपुर की अर्थव्यवस्था को करीब 10 से 12 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. पर्यटन उद्योग पूरी तरह रुक गया और छोटे व्यापारियों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा. स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हुईं, क्योंकि कई जिलों में डॉक्टरों और दवाइयों की आपूर्ति बाधित रही. शिक्षा का हाल यह रहा कि हजारों बच्चों की पढ़ाई महीनों तक बंद रही और कई स्कूल राहत शिविरों में बदल दिए गए.

इसी हालात में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह पर कुकी समुदाय ने पक्षपात का आरोप लगाया. धीरे-धीरे बीजेपी के भीतर भी असंतोष बढ़ा. अक्टूबर 2024 में पार्टी के करीब डेढ़ दर्जन विधायकों ने केंद्रीय नेतृत्व को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री बदलने की मांग की. दबाव इतना बढ़ा कि फरवरी 2025 में बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और इसके बाद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया. संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति शासन एक साल से ज्यादा नहीं चल सकता, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर यह मजबूरी बन गई कि नई सरकार का गठन किया जाए. इसी राजनीतिक और संवैधानिक दबाव के बीच युमनाम खेमचंद सिंह का नाम सामने आया.

खेमचंद सिंह का चयन केवल पार्टी के भीतर संतुलन साधने का फैसला नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर लिया गया कदम माना जा रहा है. वे मैतेई समुदाय से आते हैं, जिसकी आबादी मणिपुर में करीब 53 प्रतिशत है, लेकिन उन्हें कुकी और नागा समुदायों के बीच भी स्वीकार्यता वाला नेता माना जाता है. हिंसा के दौरान वे उन गिने-चुने मैतेई नेताओं में थे, जिन्होंने कुकी राहत शिविरों का दौरा किया और विस्थापित परिवारों से मुलाकात की. नागा बहुल उखरुल जिले में कुकी गांव के राहत शिविर में उनकी मौजूदगी को मानवीय संदेश के तौर पर देखा गया. उस समय जब घाटी और पहाड़ के बीच भरोसे की दीवार सबसे ऊंची थी, खेमचंद की यह पहल एक अलग संकेत थी कि वे केवल अपनी जाति की राजनीति नहीं करना चाहते.

राजनीतिक अनुभव के लिहाज से भी खेमचंद सिंह को मजबूत दावेदार माना गया. वे 2017 और 2022 में सिंगजामेई सीट से विधायक चुने गए. 2017 में पहली बार सत्ता में आने पर उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया और उन्होंने पूरे पांच साल सदन की कार्यवाही संभाली. 2022 में वे मंत्री बने और ग्रामीण विकास, पंचायती राज, नगर प्रशासन, आवास और शिक्षा जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी निभाई. मणिपुर की राजनीति में करीब दो दशक से सक्रिय रहने वाले खेमचंद को संगठन और प्रशासन दोनों की समझ रखने वाला नेता माना जाता है. पार्टी नेतृत्व को लगा कि संकट के दौर में एक ऐसा चेहरा जरूरी है, जो अनुभव के साथ-साथ अपेक्षाकृत विवाद रहित भी हो.

मणिपुर विधानसभा का अंकगणित भी इस फैसले को मजबूती देता है. 60 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास फिलहाल 37 विधायक हैं. 2022 के चुनाव में पार्टी को 32 सीटें मिली थीं, लेकिन बाद में जेडीयू के पांच विधायक बीजेपी में शामिल हो गए. एक सीट फिलहाल रिक्त है. इसके अलावा एनपीएफ के 5, जेडीयू के 1 और 3 निर्दलीय विधायक सरकार का समर्थन कर रहे हैं. इस तरह एनडीए के पास कुल 46 विधायकों का समर्थन है, जबकि विपक्ष 14 पर सिमटा है. संख्या के लिहाज से सरकार मजबूत है, लेकिन मणिपुर की राजनीति में असली चुनौती बहुमत नहीं, सामाजिक भरोसा है.

राज्य में आज भी करीब 50 हजार लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं. प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार अब तक केवल 25 से 30 प्रतिशत विस्थापित परिवार ही स्थायी रूप से अपने घर लौट पाए हैं. घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच आवाजाही पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है. कई इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती के बिना लोगों का आना-जाना संभव नहीं है. सबसे बड़ी चिंता अवैध हथियारों की है. अनुमान है कि हिंसा के दौरान हजारों हथियार लूटे गए या अवैध रूप से जमा किए गए, जिनमें से अब तक केवल एक हिस्सा ही वापस लिया जा सका है. यह स्थिति शांति बहाली के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही है.

नई सरकार के सामने प्राथमिक चुनौती पुनर्वास और सुरक्षा की होगी. हजारों परिवार जिनके घर जल गए, उनके लिए स्थायी आवास, मुआवजा और रोजगार की व्यवस्था करना आसान काम नहीं है. केंद्र सरकार ने पुनर्वास के लिए विशेष पैकेज देने की बात कही है, लेकिन जमीन पर इसका असर तभी दिखेगा, जब प्रशासन निष्पक्ष तरीके से काम करे. स्वास्थ्य और शिक्षा को भी दोबारा पटरी पर लाना होगा. आंकड़ों के मुताबिक हिंसा के कारण 100 से ज्यादा स्कूल और दर्जनों स्वास्थ्य केंद्र आंशिक या पूरी तरह बंद हो गए थे. इन्हें दोबारा चालू करना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होगी.

बीजेपी की रणनीति यह भी मानी जा रही है कि मुख्यमंत्री मैतेई समुदाय से होंगे, जबकि उपमुख्यमंत्री पद पर कुकी और नागा समुदाय से प्रतिनिधित्व देकर संतुलन बनाया जाएगा. यह फार्मूला सियासी तौर पर जरूरी है, क्योंकि 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और पार्टी का लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना है. लेकिन चुनावी गणित से पहले सामाजिक गणित को दुरुस्त करना ज्यादा जरूरी है. संवाद की प्रक्रिया शुरू करना, रास्ते खोलना, राहत शिविरों को धीरे-धीरे खाली कराना और प्रशासन पर भरोसा लौटाना सरकार की प्राथमिकता होगी.

खेमचंद सिंह की पृष्ठभूमि उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है. वे पेशे से ताइक्वांडो खिलाड़ी और शिक्षक रहे हैं. 1977 में उन्होंने इस खेल की शुरुआत की और करीब 20 साल तक सक्रिय खिलाड़ी रहे. दक्षिण कोरिया में प्रशिक्षण लेकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारतीय ताइक्वांडो टीम के कप्तान भी बने. बाद में वे खेल प्रशासक बने और ताइक्वांडो फेडरेशन ऑफ इंडिया में उपाध्यक्ष रहे. असम ताइक्वांडो एसोसिएशन की स्थापना से लेकर मणिपुर ताइक्वांडो एसोसिएशन के अध्यक्ष तक का सफर उन्हें अनुशासन और संगठन की अहमियत सिखाता है. उनके समर्थक मानते हैं कि खेल से आई यही सोच उन्हें राजनीति में भी संतुलित बनाती है.

खेमचंद सिंह को स्वच्छ छवि वाला नेता माना जाता है. विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री रहते हुए उन पर किसी बड़े भ्रष्टाचार या गंभीर विवाद का आरोप नहीं लगा. हिंसा के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से शांति की अपील की और कहा कि यह संघर्ष बच्चों के भविष्य को बर्बाद नहीं करना चाहिए. यही बातें बीजेपी नेतृत्व को यह भरोसा दिलाती हैं कि वे सख्ती और संवेदना के बीच संतुलन बना सकते हैं. मणिपुर की राजनीति में यह संतुलन सबसे कठिन काम है, क्योंकि यहां मुद्दे केवल विकास या रोजगार तक सीमित नहीं, बल्कि पहचान, जमीन और अस्तित्व से जुड़े हैं.

राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य में अपेक्षाकृत शांति जरूर लौटी, लेकिन यह शांति प्रशासनिक नियंत्रण से बनी है, सामाजिक मेल-मिलाप से नहीं. नई सरकार के सामने असली चुनौती यही है कि वह लोगों के बीच भरोसा बहाल करे. अगर राहत शिविरों में रह रहे हजारों परिवार अपने घर लौटते हैं, बाजार फिर से खुलते हैं और बच्चे बिना डर के स्कूल जाते हैं, तभी यह माना जाएगा कि सरकार सफल हो रही है. मणिपुर की जनता अब भाषण नहीं, जमीन पर बदलाव देखना चाहती है.

युमनाम खेमचंद सिंह के लिए मुख्यमंत्री बनना केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक अग्निपरीक्षा है. उन्हें साबित करना होगा कि वे केवल पार्टी के नेता नहीं, पूरे राज्य के नेता हैं. अगर वे घाटी और पहाड़ दोनों को साथ लेकर चल पाए, संवाद की राजनीति को प्राथमिकता दी और प्रशासन को निष्पक्ष बनाया, तो वे मणिपुर को हिंसा के अंधेरे से बाहर निकाल सकते हैं. लेकिन अगर अविश्वास और असुरक्षा की दीवारें जस की तस रहीं, तो यह सरकार भी उसी सवालों के घेरे में आ जाएगी, जिनसे बचने के लिए नेतृत्व बदला गया है. मणिपुर की राजनीति में अब असली लड़ाई सत्ता की नहीं, शांति और भरोसे की है, और इसी मोर्चे पर खेमचंद सिंह की सबसे बड़ी परीक्षा होने वाली है.