बिनोद कुमार सिंह
वर्तमान परिपेक्ष में दुनिया में यदि कोई एक समुद्री मार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन को नियंत्रित करता है,तो वह है होर्मुज जलडमरूमध्य।फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा मार्ग केवल भौगोलिक सीमाओं का हिस्सा नहीं,बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे संवेदनशील द्वार बन चुका है।जब भी इस क्षेत्र में हलचल होती है, उसकी गूंज केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एशिया,यूरोप और अफ्रीका तक महसूस की जाती है।हाल के घटनाक्रमों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि होर्मुज में उत्पन्न संकट किसी एक देश या क्षेत्र का मसला नहीं,बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।यही कारण है कि ब्रिटेन की पहल पर 60 से अधिक देशों की भागीदारी के साथ एक उच्चस्तरीय ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। यह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी,बल्कि वैश्विक चिंता और सामूहिक समाधान की तलाश का संकेत भी था।इस बैठक में भारत की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। भारत की उपस्थिति ने यह स्पष्ट किया कि वह अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं,बल्कि वैश्विक विमर्श को दिशा देने वाला जिम्मेदार देश बन चुका है।भारत का प्रतिनिधित्व विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने किया,जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में निर्बाध आवागमन और नौवहन की स्वतंत्रता किसी भी वैश्विक व्यवस्था की आधारशिला है।सच्चाई यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला तेल केवल ईंधन नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था का प्रवाह है।प्रतिदिन लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तेल आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है।ऐसे में जब इस क्षेत्र में जहाजों पर हमले होते हैं,नाविक फंसते हैं और आवागमन बाधित होता है, तो उसका असर सीधे वैश्विक बाजारों पर दिखाई देता है।आज की स्थिति में 25 से अधिक जहाजों को निशाना बनाए जाने और हजारों नाविकों के फंसे होने की घटनाएं केवल आंकड़े नहीं, बल्कि वैश्विक असुरक्षा की कहानी कहती हैं।इस बैठक की अध्यक्षता करते हुए यवेट कूपर ने इस संकट के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया और इसे वैश्विक आर्थिक सुरक्षा पर सीधा आघात बताया।उनके अनुसार, इस स्थिति ने न केवल तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित किया है,बल्कि जेट ईंधन,उर्वरक और अन्य आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता को भी संकट में डाल दिया है।इस वैश्विक्र संकट का सबसे बड़ा प्रभाव उन देशों पर पड़ रहा है,जो इस संघर्ष का हिस्सा नहीं हैं,लेकिन इसकी कीमत चुका रहे हैं। एशिया और अफ्रीका के विकासशील देश,जिनकी अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है,इस अस्थिरता के कारण और अधिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।भारत के लिए यह स्थिति और भी अधिक गंभीर है।देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है और होर्मुज उसका प्रमुख मार्ग है।ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की बाधा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करती है।विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी यह स्पष्ट किया कि भारत इस संकट को केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा विषय मानता है।वर्तमान की स्थिति संवेदनशीलता इस बात से भी समझी जा सकती है कि हाल के हमलों में भारतीय नाविकों की जान गई है।यह केवल एक मानवीय त्रासदी नहीं,बल्कि भारत की समुद्री सुरक्षा और वैश्विक उपस्थिति के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है।ऐसे समय में भारत ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है,वह उसकी विदेश नीति की गहराई को दर्शाता है।भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस संकट का समाधान युद्ध या सैन्य कार्रवाई में नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति में निहित है।यह दृष्टिकोण भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति के अनुरूप है,जिसमें वह किसी शक्ति गुट का हिस्सा बने बिना अपने हितों को संतुलित ढंग से साधता है।कीर स्टार्मर की पहल पर आयोजित इस बैठक में भारत ने यह संदेश दिया कि तनाव को कम करना और सभी पक्षों को वार्ता की मेज पर लाना ही इस संकट से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है।यह रुख न केवल व्यावहारिक है,बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों और सिद्धांतों के अनुरूप भी है।अंर्तराष्ट्रीय समुद्री कानून, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS),यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में बाधा उत्पन्न करने का अधिकार नहीं है।ऐसे में होर्मुज का संकट इन सिद्धांतों की भी परीक्षा ले रहा है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है,तो यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए खतरनाक उदाहरण बन सकती है।इस संकट का प्रभाव केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला,जो पहले ही कई झटकों से कमजोर हो चुकी है, अब एक और बड़े दबाव का सामना कर रही है। परिवहन लागत में वृद्धि,वस्तुओं की कमी और महंगाई का बढ़ता दबाव-ये सभी संकेत एक व्यापक आर्थिक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।भारत के सामने इस चुनौती से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, सामरिक भंडारण को मजबूत करना,अर्न्तराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना और समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना – ये सभी कदम समय की मांग हैं।
संक्षेप में होर्मुज जलडमरूमध्य का यह संकट हमें यह सिखाता है कि आज की दुनिया में स्थिरता केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह सकती।जब तक वैश्विक स्तर पर सहयोग, संवाद और संतुलन नहीं होगा, तब तक इस प्रकार के संकट बार-बार सामने आते रहेंगे।
भारत ने इस कठिन समय में जिस संयम,संतुलन और दूरदर्शिता का परिचय दिया है, वह उसे एक जिम्मेदार और परिपक्व वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है। अब आवश्यकता इस बात की है कि पूरा विश्व एकजुट होकर इस संकट का स्थायी समाधान खोजे, ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी जीवनरेखा भविष्य में किसी भी प्रकार के तनाव का शिकार न बने और वैश्विक शांति व समृद्धि का मार्ग अविरल बना रहे।





