अजय कुमार बियानी
गणतंत्र दिवस केवल एक तिथि नहीं है, यह उस सामूहिक चेतना का उत्सव है, जिसने सदियों की गुलामी के बाद भारत को अपने भाग्य का स्वामी बनाया। 26 जनवरी 1950 का दिन भारतीय इतिहास में इसलिए अमर है क्योंकि इसी दिन हमने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। यह घोषणा केवल काग़ज़ पर नहीं थी, यह उस आत्मविश्वास की उद्घोषणा थी जो हर भारतीय के भीतर धड़कता है।
हमारा गणतंत्र संविधान की नींव पर खड़ा है। यह संविधान केवल विधियों का संकलन नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों, संघर्षों और बलिदानों की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसमें स्वतंत्रता संग्राम की आग है, सामाजिक न्याय की लौ है और भविष्य के भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण है। संविधान ने हमें अधिकार दिए, पर साथ ही कर्तव्यों का बोध भी कराया। अधिकार हमें शक्ति देते हैं और कर्तव्य हमें जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं—यही संतुलन किसी भी राष्ट्र को महान बनाता है।
आज जब तिरंगा हमारे हाथों में लहराता है, तो वह केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं रहता। वह हमारे अतीत के बलिदानों, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं का प्रतीक बन जाता है। केसरिया त्याग और साहस की याद दिलाता है, श्वेत शांति और सत्य का मार्ग दिखाता है और हरा रंग विकास, समृद्धि तथा आशा का संकेत देता है। अशोक चक्र हमें निरंतर गति और न्याय की सीख देता है—ठहराव नहीं, निरंतर प्रगति।
गणतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता होती है। भारत का गणतंत्र इसलिए विशिष्ट है क्योंकि यहाँ विविधता में एकता केवल नारा नहीं, बल्कि जीवनशैली है। भाषाएँ अनेक हैं, पर भाव एक है। पंथ अलग-अलग हैं, पर राष्ट्र सर्वोपरि है। यही कारण है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी विशाल जनसंख्या के बावजूद निरंतर आगे बढ़ रही है। यहाँ मतभेद हो सकते हैं, पर मनभेद नहीं; विचार टकरा सकते हैं, पर राष्ट्रहित अडिग रहता है।
आज का भारत आत्ममंथन भी कर रहा है और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ठोस कदम भी उठा रहा है। आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सामरिक क्षेत्रों में भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि नवाचार और नेतृत्व करने वाला राष्ट्र है। अंतरिक्ष से लेकर समुद्र की गहराइयों तक, सीमाओं की सुरक्षा से लेकर डिजिटल व्यवस्था तक—भारत ने अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है। यह सब गणतंत्र की उस व्यवस्था के कारण संभव हुआ, जिसने प्रतिभा को अवसर और परिश्रम को सम्मान दिया।
हालाँकि गणतंत्र दिवस हमें आत्मसंतोष का अवसर नहीं देता, बल्कि आत्मविश्लेषण की प्रेरणा देता है। क्या हम अपने संविधान के मूल्यों को व्यवहार में उतार पा रहे हैं? क्या सामाजिक समानता, नारी सम्मान, शिक्षा और स्वास्थ्य सभी तक समान रूप से पहुँच रहे हैं? क्या हम अपने कर्तव्यों को उतनी ही गंभीरता से निभा रहे हैं, जितनी गंभीरता से अधिकारों की बात करते हैं? ये प्रश्न हमें विचलित करने के लिए नहीं, बल्कि मजबूत बनाने के लिए हैं।
राष्ट्रवाद का अर्थ केवल भावनात्मक उफान नहीं होता। सच्चा राष्ट्रवाद जिम्मेदारी, अनुशासन और ईमानदारी से जुड़ा होता है। कर चुकाना, नियमों का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, कमजोर की आवाज़ बनना और देश की प्रतिष्ठा को हर स्तर पर ऊँचा रखना—यही व्यावहारिक राष्ट्रवाद है। जब नागरिक जागरूक होते हैं, तब गणतंत्र स्वतः सशक्त हो जाता है।
आज का युवा भारत गणतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी है। उसकी ऊर्जा, उसकी सोच और उसका आत्मविश्वास आने वाले भारत की दिशा तय करेगा। यदि यह युवा संविधान के मूल्यों से जुड़ा रहेगा, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व देने वाला राष्ट्र बनेगा। तभी वह दिन दूर नहीं जब भारत पुनः “सोने की चिड़िया” नहीं, बल्कि न्याय, ज्ञान और मानवता की रोशनी फैलाने वाला विश्वगुरु बनेगा।
गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल प्राप्त करने की वस्तु नहीं, उसे सहेजना और मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है। यह कार्य सरकार अकेले नहीं कर सकती; इसके लिए हर नागरिक का योगदान आवश्यक है। जब हम अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाते हैं, तभी संविधान के शब्द जीवंत हो उठते हैं।
आइए, इस गणतंत्र दिवस पर संकल्प लें कि हम न केवल तिरंगे को सलामी देंगे, बल्कि उसके आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे। गणतंत्र की ताकत को संविधान के मान से जोड़ेंगे और एक ऐसे भारत के निर्माण में सहभागी बनेंगे, जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व कर सकें।
तिरंगा हमारी जान है और हिंदुस्तान हमारी शान। यही पहचान, यही संकल्प—यही है मेरे भारत का गणतंत्र।





