म्यूट मोड पर किशोर मन: स्क्रीन के पीछे का अनसुना शोर

The teenage mind on mute mode: The unheard noise behind the screen

दिलीप कुमार पाठक

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर मकान की मजबूती तो देखते हैं, लेकिन उसकी नींव में दबी दरारों को भूल जाते हैं। किशोरावस्था जीवन की वही नींव है जिसे अक्सर उम्र का तकाज़ा कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। हर साल मनाया जाने वाला विश्व किशोर मानसिक स्वास्थ्य दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारे घर के बच्चों के मन में भी कई बार गहरा अंधेरा छाया होता है। आज का किशोर कल के युवाओं की तुलना में कहीं अधिक साधन संपन्न और तकनीक का जानकार है, लेकिन विडंबना यह है कि वह पहले से कहीं अधिक अकेला और मानसिक दबाव में भी है।

आज के किशोरों के पास सबसे बड़ी चुनौती है दिखावे की संस्कृति। हाथ में स्मार्टफोन और आंखों में चमकदार भविष्य के सपने लेकर वे जिस डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, वह जितनी आकर्षक है, उतनी ही भ्रामक भी है। सोशल मीडिया पर लाइक्स, व्यूज और कमेंट्स की संख्या अब उनके आत्म-सम्मान का पैमाना बन गई है। किसी सहपाठी की फिल्टर लगी फोटो या उसकी महंगी छुट्टियों की तस्वीरें देखकर खुद को कमतर आंकना अब एक मानसिक महामारी का रूप ले रहा है। यह तुलना का रोग उन्हें धीरे-धीरे हीन भावना और अवसाद की ओर धकेल रहा है, जिसे वे किसी से साझा भी नहीं कर पाते। अखबारों की सुर्खियों और टीवी के शोर के बीच, क्या हमने कभी गौर किया है कि घर के कोने में चुपचाप बैठा किशोर क्या सोच रहा है? स्कूल में अव्वल आने का बोझ, नामी संस्थानों में दाखिले की अंधी दौड़ और फिर दोस्तों के बीच खुद को कूल दिखाने की होड़। इन सबके बीच उनका मासूम और असली व्यक्तित्व कहीं खो जाता है। वे बोलना चाहते हैं, चीखना चाहते हैं, लेकिन डरते हैं कि कहीं उन्हें कमजोर या बीमार न समझ लिया जाए। हमारे समाज में आज भी शारीरिक चोट तो दिखती है, लेकिन मन के घावों पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता। यही चुप्पी किशोरों को अंदर ही अंदर तोड़ देती है।

बीते कुछ वर्षों में तकनीक पर निर्भरता ने स्थितियां और जटिल कर दी हैं। स्क्रीन पर घंटों समय बिताने से वास्तविक मानवीय संवाद कम हो गया है। एक ही छत के नीचे, एक ही मेज पर खाना खाते हुए भी माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत की दूरी बढ़ती जा रही है। किशोरों की चिड़चिड़ाहट, नींद न आना, अचानक चुप हो जाना या खाने की आदतों में बदलाव को अक्सर अनुशासनहीनता या गुस्सा मान लिया जाता है। जबकि हकीकत में ये उनके अशांत मन की पुकार और खराब मानसिक स्वास्थ्य के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। उन्हें इस वक्त डांट या उपदेश की नहीं, बल्कि एक ऐसे भरोसेमंद दोस्त की जरूरत है जो उन्हें बिना किसी फैसले के सुन सके। शिक्षा व्यवस्था और करियर का दबाव भी एक गंभीर चिंता है। केवल अंकों के आधार पर सफलता का पैमाना तय कर देने वाली मानसिकता किशोरों के आत्मविश्वास की हत्या कर देती है। हमें एक समाज के रूप में यह समझना होगा कि हर बच्चा एक ही सांचे में नहीं ढल सकता। किसी के पास संगीत की अद्भुत लय होती है, तो किसी के पास रंगों की समझ या खेलों का जुनून। उनके भीतर छिपे उस अनूठे हुनर को पहचानना और उन्हें हार को सहजता से स्वीकार करना सिखाना ही मानसिक मजबूती की पहली सीढ़ी है। सफलता की कहानियों के साथ-साथ उन्हें संघर्ष और विफलता से उबरने की कहानियां सुनाना भी उतना ही जरूरी है।

इस विशेष दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार करेंगे जहां वे अपनी गलतियों पर शर्मिंदा न हों। डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर प्रकृति और शारीरिक खेलों से उनका नाता फिर से जोड़ना होगा। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने व्यस्त शेड्यूल से कुछ वक्त निकालकर बच्चों के साथ बिना किसी एजेंडे या मोबाइल के बैठें। उनकी छोटी-छोटी समस्याओं को ‘बचपना’ कहकर खारिज न करें। कभी-कभी सिर्फ यह कहना कि मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ और मैं हर हाल में तुम्हारे साथ हूँ, किसी भी महंगी थेरेपी से बड़ा असर कर जाता है। अंततः, किशोर मानसिक स्वास्थ्य केवल डॉक्टरों या विशेषज्ञों का विषय नहीं है, बल्कि यह एक साझा सामाजिक जिम्मेदारी है। यदि हम चाहते हैं कि देश का भविष्य मानसिक रूप से सशक्त और संतुलित हो, तो हमें उनकी वैचारिक उर्वरता और मन की शांति का निवेश आज ही करना होगा। याद रखिए, एक स्वस्थ और शांत मन ही एक सफल जीवन का असली आधार है। आइए, इस 2 मार्च को हम अपने किशोरों के प्रति और अधिक संवेदनशील, धैर्यवान और उदार बनने का वादा करें ताकि वे केवल इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में जिएं नहीं, बल्कि अपने पूरे सामर्थ्य के साथ खिलें और महकें।