कुल-सीज़न में ‘कुल’पतित कांड

The 'Total' scandal erupted in the second season of the series

विनोद कुमार विक्की

जनवरी की रिकॉर्ड तोड़ ठंड के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डोनाल्ड का और राष्ट्रीय स्तर पर डॉग का आतंक समानांतर रूप से जारी है। फर्क बस इतना है कि एक भौंकता हैं और दूसरा ट्वीट करता हैं, किंतु काटने का अवसर दोनों में से कोई नहीं छोड़ रहा। नोबेल शांति पुरस्कार की अभिलाषा रखने वाले शांति पुरूष और वफ़ादारी के लिए मशहूर जीव जब भौंकने और काटने पर उतर जाएँ, तो इंसानियत और समाज दोनों के लिए खतरा बन जाता है। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर पटना तक आम नागरिक आवारा कुत्तों से त्रस्त है। पहले जो जीव केवल भौंककर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे, अब काटने पर आमादा हो चुके हैं। समस्या यह नहीं कि यह भौंक और काट रहे हैं, समस्या यह है कि उनकी जिम्मेदारी कौन ले? रोचक तथ्य यह है कि ट्रम्प के बावलेपन की जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र भले न ले, लेकिन उत्तर प्रदेश में बावले कुत्तों की जिम्मेदारी सरकारी शिक्षकों को सौंप दी गई है। यानी अब गुरुजी पढ़ाने से पहले कुत्तों की हाज़िरी भी लगाएंगे।

कुत्तों की चर्चा चली तो हाल ही में छत्तीसगढ़ के विवि में आयोजित साहित्यिक समारोह के राष्ट्रीय परिसंवाद की याद आ गई, जहाँ माननीय कुलपति महोदय ने एक लेखक को सार्वजनिक रूप से खदेड़ दिया। खदेड़ना भी लाजिमी था—आखिर जब मंच पर आयोजक को ही ‘भौंकने’ मेरा मतलब बोलने का मौका न मिले, तो आयोजन कैसा? यह तो अच्छा हुआ कि संबंधित लेखक उनके विश्वविद्यालय का छात्र नहीं था, वरना मौके पर ही ‘रस्टिकेट’ कर दिया जाता।

मौके पर उपस्थित अन्य लेखक विश्वविद्यालय के अनुशासित विद्यार्थियों की तरह खामोशी से कुलपति के कुकृत्य को एक ज्ञानवर्धक घटना मानकर आत्मसात कर लेते हैं। वैसे भी सोशल मीडिया और एआई के दौर में लेखक प्रजाति का अस्तित्व संकट में है। “जो लिखते हैं, वे संपादकीय कृपा से दिखते नहीं; और जो आयोजक कृपा से दिखते हैं, वे लिखते नहीं।” ऐसे में आमंत्रित लेखकों द्वारा विद्रोह या बहिष्कार की कल्पना बेमानी साबित होता है। समाज के निरीह प्राणी लेखक को अब तक घर में धर्म’पत्नी’ से दुत्कार मिलती थी, अब बाहर कुल’पति’ भी दुत्कार दें, तो क्या ही फ़र्क पड़ता है।”

कुल मिलाकर इस कुल-सीज़न में यह साफ़ हो गया है कि देश में केवल आवारा कुत्तों का ही नहीं, कुलपति का भी आतंक बराबर बना हुआ है। फर्क बस इतना है कि कुत्ता काट कर भाग जाता हैं और कुलपति डांट कर भगा देता है। बहरहाल, कुल पतित कांड के पश्चात अब लेखक साहित्यिक कार्यक्रमों में जाने से पूर्व यह सुनिश्चत अवश्य करेंगे कि उस कार्यक्रम के ‘पति’ अथवा आयोजक कोई हॉट मूड वाले कुलपति तो नहीं हैं !