कवि, सम्मेलन और आत्ममुग्धता का सच

The truth about poets, conferences, and narcissism

आज के अधिकांश कवि सम्मेलनों का दृश्य विचित्र है—
कवि ही आयोजक है,
कवि ही श्रोता है,
कवि ही किताब ख़रीद रहा है,
कवि ही कवि को बुला रहा है,
और सम्मान भी आपस में बाँट लिए जाते हैं।

ऐसे मंचों पर लानत है,
ऐसे सम्मेलनों पर सवाल है,
और उन सम्मानों पर शर्म है
जो सत्ता, संस्थानों और सेल्फ़ी के बदले बाँटे जा रहे हैं।

कवि का जन्म दबे-कुचले, हाशिये पर खड़े,
आवाज़हीनों की पीड़ा से हुआ था।
लेकिन आज का तथाकथित कवि
एसी हॉल, पाँच सितारा संस्थान
और फ़ोटोशूट के फ्रेम में सिमट गया है।

बड़े-बड़े संस्थानों में जाकर
मुस्कुराते हुए तस्वीरें खिंचवाने का
मतलब आखिर क्या है, कवियो?
क्या कविता अब संघर्ष नहीं,
केवल नेटवर्किंग और प्रमाण-पत्र है?

अगर कविता सवाल नहीं उठाती,
अगर वह सड़क, खेत, कारख़ाने और बस्ती तक नहीं पहुँचती,
तो वह कविता नहीं—
सिर्फ़ एक सुसज्जित झूठ है।

  • डॉ. सत्यवान सौरभ