अमेरिका की बेलगामी के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र की लाचारी
प्रमोद भार्गव
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सेलिया फ्लोरेस का अमेरिका द्वारा किए अपहरण और गिरफ्तारी ने महाकवि तुलसीदास की इस कहावत ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं‘ को चरितार्थ कर दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप चाहे जिन कुतर्कों को तर्क बताकर अपने हठ को सच बताते रहें, वास्तविकता यही है कि इस कार्यवाही को किसी भी कानून के परिप्रेक्ष्य में तर्कसम्मत नहीं ठहराया जा सकता है ? वेनेजुएला के पक्ष में आवाज उठाने वाले दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की आपात बैठक भी हुई, जिसमें अमेरिका ने अपना पक्ष रखा और अपने तानाशाही रवैये को जायज ठहराया। हालांकि चीन ने अमेरिका की इस सैन्य कार्यवाही को सीधे-सीधे दादागिरी बताया। रूस ने भी आपात्ति जताई है। लेकिन बैठक में संयुक्त राश्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता जताने के अलावा अमेरिका के विरुद्ध कोई भी कड़ी कार्यवाही करने के परिप्रेक्ष्य में लाचार नजर आए। गुटेरस ने कहा कि यह सैन्य कार्यवाही क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रभुत्व के लिए चेतावनी है। इस कार्यवाही में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियमों का पालन नहीं किया गया। संयुक्त राश्ट्र चार्टर के अनुसार किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल का प्रयोग नहीं किया जा सकता है, किंतु इसकी अनदेखी की गई। वेनेजुएला के प्रतिनिधि ने अमेरिका द्वारा किए इस हमले को अपने देश के प्राकृतिक संसाधनों और तेल को प्राप्त करना बताया। ऐसी ही निंदा रूस, चीन, मैक्सिको, क्यूबा और कई देशों ने अमेरिका की कड़ी आलोचना की, किंतु अमेरिका के मित्र देश उसके साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
दुनिया के तेल भंडार का 18.17 प्रतिशत तेल अर्थात 303 अरब बैरल तेल और दुर्लभ खनिज के भंडार वेनेजुएला की धरती में समाए हुए हैं। किंतु उसके पास कच्चे तेल को षोधन करने के तकनीकि संसाधन नहीं है। इसलिए इस तेल को ईंधन में नहीं बदल पा रहा है। इस तेल को षोधन के लिए जब मादुरो ने चीन से तेल और रूस से हथियार खरीदने की नीति को अंजाम दिया तो टं्रप की नाराजी बढ़ गई और मादुरो और उनकी पत्नी सेलिया का अपहरण कर लिया। इस अपहरण की घटनाक्रम को लेकर मादुरो के बेटे निकोलस मादुरो गुएरा ने कहा है कि इतिहास बताएगा कि हमारे भीतर के लोगों ने किस तरह से गद्दारी करते यह राष्ट्रघात किया ? मीडिया द्वारा ऐसी जानकारियां सामने लाई गई है कि वेनेजुएला सरकार में काम कर रहें लोगों ने ही उपहारों के लालच में आकर अमेरिकी सेना को राश्ट्रपति मादुरो के आवास तक पहुंचाने में मदद की है। हालांकि अमेरिका ने वेनेजुएला पर अमेरिका में मानक पदार्थों की तस्करी अमेरिका में करने का हवाला देकर इस सैन्य कार्यवाही को जायज ठहराया है। मादुरो को अमेरिकी कानून केर-फ्रिस्बी के तहत पकड़ा गया है। यह कानून अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद-2 के तहत राश्ट्रपति को गैर-कानूनी तरीकों से ऐसे लोगों और भागोड़ों को पकड़ने की अनुमति देता है, जो अमेरिका को किसी प्रकार से नुकसान पहुंचा रहे हों। इसमें प्रावधान है कि गिरफ्तारी का तरीका कितना भी गैर-कानूनी हो, एक बार अमेरिका में लाने के बाद अमेरिकी अदालत में मामला चलाया जा सकता है। इसे चुनौती नहीं दी जा सकती है। मादुरो पर मादक पदार्थ तस्करी के अपराधिक मामले अमेरिका में दर्ज हैं। इनमें कम से कम 20 साल की सजा से लेकर आजीवन कारावास हो सकता है।
अमेरिका ऐसा दुस्साहस 1990 में पनामा के तानाशाह मैनुअल नोरिएगा को गिरफ्तार करके दिखा चुका है। इन्हें अमेरिकी अदालत ने 40 साल की सजा सुनाई थी, किंतु 2011 में रिहा कर दिया गया था। यदि मादुरो को सजा सुनाई जाती है तो ट्रंप के राश्ट्रपति नहीं रहने के बाद कोई दूसरा राश्ट्रपति मादुरो को क्षमादान दे सकता है। खुद ट्रंप होडुरास के पूर्व राश्ट्रपति हर्नाडेज को 2025 में माफी दे चुके हैं। अमेरिका कभी मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी का बहाना ढूंढ़कर अपने षत्रु राश्ट्रों के मुखियाओं को सबक सिखाता रहा है। 2003 में अमेरिका के तत्कालीन राश्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश सरकार ने ईराक पर जैविक और रासायनिक हथियार होने का दावा कर ईराक को नेस्तनाबूद कर दिया था। वहां के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को भी अपदस्थ कर दिया था। इसी तरह 2011 में अमेरिका और नाटो ने लीबिया और सीरिया में भी सैन्य हस्तक्षेप कर वहां की वर्तमान सरकारों को अपदस्थ कर दिया था। इन हस्तक्षेपों के चलते आज भी इन देशों में गृहयुद्ध एवं अस्थिरता के हालात बने हुए है। यही हश्र अब वेनेजुएला का होना निश्चित है। अमेरिका के सरकारी शोध संस्थान कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट के अनुसार 1798 से लेकर अब तक अमेरिका 469 सैन्य हस्तक्षेप दुनिया में इसलिए कर चुका है, जिससे उसे महाशक्ति माना जाता रहे।
दुनिया में लगातार ऐसे हालातों की निर्मिति सामने आने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र की कार्य-संस्कृति लाचार बनी हुई है। उस पर निरंतर प्रश्न-चिन्ह उठ रहे हैं। अतएव यदि यह वैश्विक संस्था अपने भीतर समयानुकूल सुधार नहीं लाती है तो कालांतर में महत्वहीन होती चली जाएगी और फिर इसके सदस्य देशों को इसकी जरूरत ही नहीं रह जाएगी। भारत जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता से बाहर रखते हुए इस संस्था ने जता दिया है कि वहां चंद अलोकतांत्रिक या तानाशाह की भूमिका में आ चुके देशों की ही तूती बोलती है। संयुक्त राश्ट्र की उम्र लंबी हो चुकने के बावजूद इसके मानव कल्याण से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं। इसकी निश्पक्षता भी संदिग्ध है। इसीलिए वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राश्ट्र ताकतवर देशों की मनमानी रोकने, षांति स्थापित करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद षांतिप्रिय देशों के संगठन के रूप में संयुक्त राश्ट्र सुरक्षा परिशद् का गठन हुआ था। इसका अहम् मकसद भविश्य की पीढ़ियों को युद्ध की विभीशिका और आतंकवाद से सुरक्षित रखना था। इसके सदस्य देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को स्थायी सदस्यता प्राप्त है। याद रहे चीन जवाहरलाल नेहरू की अनुकंपा से ही सुरक्षा परिषद का सदस्य बना था। जबकि उस समय अमेरिका ने सुझाया था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाए और भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता दी जाए। लेकिन अपने उद्देश्य में परिषद को पूर्णतः सफलता नहीं मिली। भारत का ऑपरेशन सिंदूर समेत तीन बार पाकिस्तान और एक बार चीन से युद्ध हो चुका है। इराक और अफगानिस्तान, अमेरिका और रूस के जबरन दखल के चलते युद्ध की ऐसी विभीशिका के शिकार हुए कि आज तक उबर नहीं पाए हैं। रूस और यूक्रेन तथा इजराइल एवं फिलींस्तान के बीच युद्ध एक नहीं टूटने वाली कड़ी बन गया है। अनेक इस्लामिक देश गृह-कलह से जूझ रहे हैं। उत्तर कोरिया और पाकिस्तान बेखौफ परमाणु युद्ध की धमकी देते रहते हैं। दुनिया में फैल चुके इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। साम्राज्यवादी नीतियों के क्रियान्वयन में लगा चीन किसी वैश्विक पंचायत के आदेश को नहीं मानता।
संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, यूनिसेफ और शांति सेना जैसे संगठन काम करते हैं। लेकिन चंद देशों की ताकत के आगे ये संगठन नतमस्तक होते दिखाई देते हैं। इसीलिए षांति सेना की विश्व में बढ़ते सैनिक संघर्शों के बीच कोई निर्णायक भूमिका दिखाई नहीं दे रही है। अंतरराश्ट्रीय न्यायालय जरूर युद्ध में अत्याचारों से जुड़े कई दशकों पुराने अंतरराश्ट्रीय विवादों में न्याय देता दिख जाता है। परंतु संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक संगठन जी-20, जी-8, आसियान और ओपेक जैसे संगठन विभाजित दुनिया के क्रम में लाचारी का अनुभव कर रहे है। अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों द्वारा इन्हें दी जाने वाली आर्थिक मदद में कटौती कर दिए जाने के कारण भी उनका भविष्य संकट में है। इन सब खतरों के चलते इस वैश्विक मंच की विश्वसनीयता संकट में है, लिहाजा इसमें पर्याप्त सुधारों की तत्काल जरूरत तो है ही, वेनेजुएला के परिप्रेक्ष्य में कुछ ऐसा करना जरूरी है, जिससे इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा के प्रति सदस्य देशों में विश्वास पैदा करे।





