अमेरिका–इजरायल–ईरान युद्ध और वैश्विक तेल संकट: भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

The US-Israel-Iran War and the Global Oil Crisis: Potential Impact on India's Economy

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

मध्य पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। यू एस, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को चुनौती दी है, बल्कि विश्व ऊर्जा बाजार को भी अस्थिर कर दिया है। यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका सबसे अधिक प्रभाव तेल आयात पर निर्भर देशों पर पड़ेगा, जिनमें भारत भी प्रमुख है।

मध्य पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं। इस क्षेत्र से गुजरने वाला स्टेट ऑफ हॉर्मुज बन विश्व ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के लगभग एक-तिहाई तेल का परिवहन इसी जलडमरूमध्य से होकर होता है। यदि युद्ध के कारण इस मार्ग में बाधा आती है या सुरक्षा जोखिम बढ़ता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल की कीमतों में उछाल से देश का आयात बिल बढ़ जाता है और इससे व्यापार घाटा भी बढ़ने लगता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार के लिए वित्तीय संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

तेल संकट का सबसे प्रत्यक्ष असर महंगाई पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ जाती है, जिसका प्रभाव खाद्य वस्तुओं, सब्जियों, फलों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है। इससे आम नागरिक की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां बड़ी आबादी अभी भी सीमित आय पर निर्भर है, वहां ऊर्जा कीमतों में वृद्धि सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर दबाव पैदा कर सकती है।

तेल की बढ़ती कीमतों का असर उद्योग और परिवहन क्षेत्र पर भी व्यापक रूप से पड़ता है। विमानन कंपनियों के लिए विमान ईंधन सबसे बड़ी लागतों में से एक है। इसी प्रकार ट्रक और माल परिवहन की लागत बढ़ने से औद्योगिक उत्पादन महंगा हो जाता है। परिणामस्वरूप वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। कई बार सरकार को महंगाई को नियंत्रित करने के लिए करों में कटौती या अन्य राहत उपायों का सहारा लेना पड़ता है।

इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू मध्य पूर्व में रहने वाले भारतीयों से जुड़ा है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं और वे हर साल बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं। यदि क्षेत्र में युद्ध की स्थिति गंभीर होती है तो वहां की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं, जिससे भारतीय कामगारों की स्थिति भी अस्थिर हो सकती है। ऐसे हालात में भारत सरकार को अपने नागरिकों की सुरक्षा और संभावित वापसी के लिए विशेष कदम उठाने पड़ सकते हैं।

हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। देश में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार किए जा रहे हैं ताकि संकट की स्थिति में कुछ समय तक तेल की आपूर्ति बनाए रखी जा सके। इसके अलावा भारत ने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने की नीति भी अपनाई है और रूस, अमेरिका तथा अफ्रीकी देशों से भी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है।

साथ ही, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित ऊर्जा के अन्य स्रोतों को बढ़ावा देकर भारत दीर्घकालीन ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर बढ़ता जोर भविष्य में ऐसे वैश्विक संकटों के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकता है।

कुल मिलाकर, अमेरिका–इजरायल–ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि इसके आर्थिक प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किए जा सकते हैं। भारत के लिए यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता की दृष्टि से एक बड़ी चुनौती बन सकती है। इसलिए आवश्यक है कि भारत संतुलित कूटनीतिक नीति के साथ-साथ ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को मजबूत कर भविष्य के संभावित संकटों के लिए तैयार रहे।