स्त्री का मूल्य अब कोख नहीं, उसके विचार हैं

The value of a woman is no longer her womb, but her thoughts

कृति आरके जैन

जिस दिन कोई युवती यह कह देती है—“मुझे माँ नहीं बनना”, उस दिन समाज की सबसे सुरक्षित मान्यता असुरक्षित हो जाती है। यह वाक्य भावनाओं से नहीं, चेतना से पैदा होता है, इसलिए डराता है। यह उस अदृश्य स्क्रिप्ट को जला देता है, जिसमें स्त्री का भविष्य जन्म के साथ ही लिख दिया गया था। लोग चौंकते इसलिए हैं कि पहली बार स्त्री अपनी देह को विरासत नहीं, निर्णय का क्षेत्र घोषित करती है। यह इंकार न तो आक्रामक है, न ही विद्रोही दिखता है, फिर भी यह सबसे गहरी बगावत है क्योंकि यह बिना चीखे, बिना अनुमति माँगे, व्यवस्था के केंद्र में सीधा सवाल खड़ा कर देता है।

सदियों से स्त्री को यह पाठ पढ़ाया गया कि उसका अस्तित्व स्वयं के लिए नहीं, दूसरों की जरूरतों के लिए है—पहले परिवार, फिर पति और अंततः संतान के लिए। मातृत्व को इतना ऊँचा उठाया गया कि उसके भार तले स्त्री की पहचान दबकर रह गई। उसे सिखाया गया कि त्याग उसका सौंदर्य है और सहनशीलता उसका स्वभाव। आज की बेटियाँ इसी शिक्षा को जाँच की निगाह से देख रही हैं। वे पूछ रही हैं—यदि त्याग ही स्त्री की नियति है, तो पुरुष की नियति क्या है? यह प्रश्न किसी एक भूमिका पर नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक संरचना पर सीधा प्रहार करता है।

शिक्षा ने इन सवालों को भाषा दी है और चेतना ने उन्हें निडरता। आज की युवा महिलाएँ जीवन को केवल निभाने की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीने का अधिकार मानती हैं। वे जानती हैं कि मातृत्व भावनाओं का उत्सव भी हो सकता है, लेकिन प्रायः यह अदृश्य श्रम, लगातार थकान और स्वयं से मिटते जाने की प्रक्रिया भी बन जाता है। वे साफ देखती हैं कि बराबरी के दावे संकट के समय सबसे पहले टूटते हैं। जब मातृत्व की कीमत एकतरफा वसूली जाए, तब उससे इंकार करना स्वार्थ नहीं, बल्कि न्याय की स्पष्ट माँग बन जाता है।

आर्थिक यथार्थ इस निर्णय को और ठोस बना देता है। आज का समय महँगा है, अनिश्चित है और अस्थिर है। एक बच्चे का पालन-पोषण अब केवल प्रेम का विस्तार नहीं, बल्कि वर्षों तक चलने वाला आर्थिक दबाव है। नौकरी छोड़ना, अवसर खोना और निर्भरता स्वीकार करना अब भी ज़्यादातर स्त्रियों के हिस्से आता है। युवा महिलाएँ इस गणित को भावनाओं से नहीं, विवेक से हल करती हैं। वे पूछती हैं—क्या मातृत्व का अर्थ आर्थिक असुरक्षा को स्थायी बनाना होना चाहिए? यह सवाल सुंदर नहीं, लेकिन सच है।

मानसिक स्वास्थ्य वह सच है जिसे सबसे लंबे समय तक दबाया गया। माँ को देवी बनाकर उसकी थकान को अदृश्य कर दिया गया। प्रसवोत्तर अवसाद, अकेलापन और हर हाल में “अच्छी माँ” बने रहने का दबाव वर्षों तक मौन में छिपा रहा। नई पीढ़ी की महिलाएँ इस चुप्पी को तोड़ रही हैं। वे स्वीकार कर रही हैं कि हर स्त्री माँ बनने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होती, और यह स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है। वे साफ कहती हैं—यदि मातृत्व के नाम पर स्वयं को खोना पड़े, तो स्वयं को बचाना अधिक ज़रूरी है।

पर्यावरणीय चेतना ने इस बहस को निजी दायरे से बाहर निकालकर वैश्विक धरातल पर ला खड़ा किया है। जलवायु संकट, सिकुड़ते संसाधन और भविष्य की भयावह अनिश्चितता के बीच अनेक युवतियाँ यह कठोर प्रश्न उठा रही हैं कि क्या ऐसे संसार में बच्चे को जन्म देना नैतिक रूप से उचित है। उनके लिए माँ न बनना जिम्मेदारी से भागना नहीं, बल्कि उसे गंभीरता से लेना है। वे मातृत्व को केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि पृथ्वी पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के संदर्भ में देखती हैं। यह दृष्टि भावनाओं से नहीं, विवेक से उपजी है, और शायद इसी कारण यह पारंपरिक सोच को असहज करती है।

समाज की प्रतिक्रिया आज भी कटु और दंडात्मक है। कहा जाता है कि वे अधूरी हैं, स्वार्थी हैं, या भविष्य में पछताएँगी। लेकिन ये आरोप स्त्री के नहीं, समाज के भय को उजागर करते हैं—उस भय को, जो उसे स्त्री की स्वायत्तता से लगता है। नई पीढ़ी की महिलाएँ अब स्पष्टीकरण नहीं देतीं। वे जानती हैं कि जीवन की पूर्णता किसी एक भूमिका में कैद नहीं होती। वे रिश्तों, सृजन, सामाजिक सहभागिता और आत्मसम्मान में भी जीवन का अर्थ तलाशती हैं। उनका आत्मविश्वास इसलिए चुभता है, क्योंकि यह नियंत्रण और आदेश की भाषा को सिरे से नकार देता है।

यह विमर्श मातृत्व के विरोध में नहीं, बल्कि उसके एकाधिकार के विरुद्ध खड़ा है। नई पीढ़ी माँ बनने की संभावना को नकार नहीं रही, बल्कि उसे अनिवार्यता से मुक्त कर रही है। वे साफ कहती हैं—माँ बनना तभी अर्थपूर्ण है जब वह इच्छा से जन्म ले, भय या दबाव से नहीं। यह सोच स्त्री को पहली बार सम्पूर्ण मनुष्य के रूप में स्वीकार करती है, न कि केवल भविष्य की जननी के रूप में। जब चयन स्वतंत्र होगा, तभी मातृत्व भी सच्चे अर्थों में सम्मान का पात्र बनेगा।

“बेटियाँ जो माँ नहीं बनना चाहतीं” कोई क्षणिक फैशन नहीं, बल्कि चेतना की नई क्रांति है। यह बदलाव असहज है, क्योंकि यह उन गहरी और पक्की मान्यताओं को चुनौती देता है जिनमें समाज ने सदियों तक स्त्री को बाँध रखा था। इतिहास सिखाता है कि हर बड़ा परिवर्तन पहले बेचैनी और अव्यवस्था लाता है। आज की बेटियाँ केवल इतना पूछ रही हैं—क्या स्त्री का मूल्य उसकी कोख से तय होगा, या उसके विचार, उसकी चेतना और उसकी स्वतंत्रता से? इसका जवाब समय ही देगा। संभव है कि आने वाला समय अधिक ईमानदार, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक मानवतावादी हो—जहाँ मातृत्व सम्मानित विकल्प हो, आदेश या बाध्यता नहीं।