राज्यसभा में गूंजती गरीब की आवाज़ ‘न्यूनतम बैलेंस’ के नाम पर चुपचाप लूट का सच

The voice of the poor echoes in the Rajya Sabha; the truth of silent loot in the name of 'minimum balance'

बिनोद कुमार सिंह

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली शक्ति केवल चुनावों में नहीं,बल्कि उन आवाज़ों में निहित होती है जो संसद के भीतर उठती हैं और समाज के सबसे कमजोर, सबसे वंचित और सबसे अनसुने वर्गों की पीड़ा को स्वर देती हैं।जब राज्यसभा जैसे उच्च सदन में कोई जनप्रतिनिधि गरीब की बात करता है,तो वह महज एक भाषण नहीं होता-वह उस मौन पीड़ा का उद्घाटन होता है जो वर्षों से व्यवस्था के भीतर दबाई जाती रही है।

हाल के समय में ‘न्यूनतम बैलेंस’ के नाम पर बैंकों द्वारा गरीबों से वसूले गए हजारों करोड़ रुपये का मुद्दा इसी मौन पीड़ा का विस्फोट है।यह केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं है,बल्कि यह उस असमानता का प्रतीक है जो हमारे आर्थिक ढांचे में गहराई तक जड़ें जमा चुकी है।जब यह तथ्य सामने आता है कि बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस न रखने के कारण लगभग 19,000 करोड़ रुपये वसूल लिए,तो यह आंकड़ा एक सवाल बनकर खड़ा हो जाता है , क्या यह व्यवस्था वास्तव में गरीब के हित में है,या उसके खिलाफ एक सुनियोजित तंत्र बन चुकी है?

भारत ने बीते वर्षों में वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।केन्द्र सरकार द्वारा ‘जन-धन योजना’ के माध्यम से करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया।डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया गया, गाँव- गाँव तक बैंकिंग सेवाओं का विस्तार हुआ।इन पहलों का उद्देश्य यह था कि समाज का अंतिम व्यक्ति भी आर्थिक मुख्यधारा में शामिल हो सके।

लेकिन विडंबना यह है कि जिस बैंकिंग प्रणाली को गरीब के लिए सुरक्षा और सशक्तिकरण का माध्यम बनना था, वही धीरे-धीरे उसके लिए बोझ बनती जा रही है। वही न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता और उससे जुड़ी पेनल्टी ने उस व्यक्ति को भी दंडित करना शुरू कर दिया है, जिसकी आय ही इतनी नहीं कि वह नियमित रूप से खाते में निर्धारित राशि बनाए रख सके।एक दिहाड़ी मजदूर की कल्पना कीजिए – वह सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करता है, तब जाकर 250 या 300 रुपये मात्र कमाता है। इस मामूली आय में से भी वह कुछ रुपये बचाकर बैंक में जमा करता है,ताकि भविष्य में किसी आपात स्थिति में उसका सहारा बन सके।जब बैंक उसके खाते से ‘न्यूनतम बैलेंस’ के नाम पर शुल्क काट लेता है,तो वह केवल एक आर्थिक नुकसान नहीं होता – वह उसके विश्वास पर एक आघात होता है।उसके मजबुर मजदूर के लिए यह 100 या 200 रुपये नहीं,बल्कि उसके बच्चों की एक वक्त की रोटी,उनकी कॉपी-किताब या उसकी अपनी दवा का खर्च होता है।बैंकिंग शुल्क का यह ‘सूक्ष्म आघात’ धीरे-धीरे उसकी पूरी आर्थिक संरचना को प्रभावित करता है।

छोटे किसान की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।वह मौसम की मार,बाजार की अनिश्चितता और लागत के बढ़ते दबाव के बीच अपनी थोड़ी-सी बचत को बैंक में सुरक्षित रखता है।जब वही बचत बार-बार शुल्कों में कटती है,तो उसका बैंकिंग प्रणाली पर से विश्वास डगमगाने लगता है।वही दूसरी ओर बुजुर्ग पेंशनभोगी, जिनकी आय पहले ही सीमित होती है,इस व्यवस्था से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।हर महीने मिलने वाली पेंशन उनके जीवन का एकमात्र सहारा होती है।यदि उसी में से बैंकिंग शुल्क कटने लगें,तो उनके जीवन स्तर पर इसका सीधा असर पड़ता है।गृहिणियाँ,जो घर के सीमित बजट को बड़ी सावधानी से संभालती हैं,उनकी छोटी-छोटी बचत भी इन ‘छिपे हुए शुल्कों’ के कारण धीरे-धीरे समाप्त होती जाती है।यह केवल आर्थिक क्षरण नहीं है,बल्कि उस आत्मनिर्भरता पर भी चोट है जो वे अपने छोटे-छोटे प्रयासों से निर्मित करती हैं।

यह पूरी स्थिति एक गहरे प्रश्न को जन्म देती है – क्या यही वित्तीय समावेशन है? क्या बैंकिंग प्रणाली में शामिल होना गरीब के लिए एक नई तरह की आर्थिक सजा बन गया है?आज भारतीय बैंकिंग सेवाओं के नाम पर अनेक प्रकार के शुल्क लगाए जा रहे हैं – न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी,एटीएम उपयोग शुल्क, एसएमएस अलर्ट शुल्क,खाता स्टेटमेंट शुल्क, निष्क्रिय खाता शुल्क।ये सभी शुल्क अलग-अलग देखने में छोटे लगते हैं, लेकिन जब इन्हें जोड़कर देखा जाता है,तो यह एक बड़ी राशि का रूप ले लेते हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह भार मुख्यतः उसी वर्ग पर पड़ता है, जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है।

दूसरी ओर,यह भी एक कटु सत्य है कि बड़े उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपये के ऋण ‘एनपीए’ बन जाते हैं।उन्हें पुनर्गठन, राहत और समय विस्तार जैसी सुविधाएं मिल जाती हैं। लेकिन एक गरीब ग्राहक,जो अपने खाते में 500 या 1000 रुपये का न्यूनतम बैलेंस नहीं रख पाता,उसे तुरंत दंडित किया जाता है।यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। rयह व्यवस्था यह संदेश देती है कि बड़ी चूकें क्षम्य हैं, लेकिन छोटी त्रुटियाँ दंडनीय।यह दृष्टिकोण लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।लोकतंत्र के मंदिर संसद के राज्य सभा में उठी यह आवाज़ इसी असंतुलन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है।

यह केवल एक मुद्दे को उठाने भर की बात नहीं है,बल्कि यह उस सोच को चुनौती देने का प्रयास है जो गरीब को केवल ‘ग्राहक’ के रूप में देखती है,न कि एक नागरिक के रूप में।आज आवश्यकता है कि बैंकिंग व्यवस्था को पुनः मानवीय बनाया जाए।छोटे खाताधारकों के लिए न्यूनतम बैलेंस की बाध्यता को समाप्त किया जाए या उसे पूरी तरह लचीला बनाया जाए।‘बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट’ को पूरी तरह शुल्क-मुक्त किया जाना चाहिए,ताकि गरीब व्यक्ति बिना किसी भय और असुरक्षा के बैंकिंग सेवाओं का उपयोग कर सके।

इसके साथ ही, बैंकिंग शुल्कों में पूर्ण पारदर्शिता अनिवार्य की जानी चाहिए। ग्राहकों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि उनसे किस मद में कितना शुल्क लिया जा रहा है। ‘फाइन प्रिंट’ में छिपी शर्तें किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वे विश्वास के साथ छल के समान हैं।नियामक संस्थाओं की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि बैंक केवल लाभ कमाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्वों को ध्यान में रखते हुए कार्य करें। बैंकिंग केवल एक व्यवसाय नहीं है – यह एक सार्वजनिक सेवा भी है, जो आम आदमी के जीवन से सीधे जुड़ी हुई है।आज हमें यह समझने की आवश्यकता है कि आर्थिक नीतियाँ केवल आंकड़ों से नहीं चलतीं, बल्कि वे मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों से भी संचालित होती हैं। यदि कोई नीति गरीब को और अधिक कमजोर बनाती है, तो उसकी समीक्षा और पुनर्विचार अनिवार्य हो जाता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि समाज में जागरूकता बढ़े। लोग अपने अधिकारों को समझें,बैंकिंग नियमों के प्रति सजग रहें और अनावश्यक शुल्कों के खिलाफ आवाज़ उठाएं। जब तक जनमानस सक्रिय नहीं होगा,तब तक इस प्रकार की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

संसद में उठी यह आवाज़ एक शुरुआत है -एक संकेत कि अब देश का नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहा है। लेकिन यह शुरुआत तभी सार्थक होगी, जब इसे ठोस नीतिगत परिवर्तनों में बदला जाएगा।

सरकार, संसद और नियामक संस्थाओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि बैंकिंग प्रणाली वास्तव में समावेशी बने – ऐसी प्रणाली,जो गरीब को सशक्त बनाए, न कि उसका शोषण करे।

अंततः, यह प्रश्न केवल 19,000 करोड़ रुपये का नहीं है। यह उस विश्वास का प्रश्न है, जो एक गरीब व्यक्ति बैंक में अपना पैसा जमा करते समय रखता है। यह उस भरोसे का प्रश्न है, जो वह व्यवस्था पर करता है कि उसका पैसा सुरक्षित रहेगा, और उसके साथ न्याय होगा।