बालिका विकास के बन्द दरवाजे खोलने का समय

Time to open the closed doors of girl child development

ललित गर्ग

राष्ट्रीय बालिका दिवस बालिकाओं के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण के लिए जागरूकता बढ़ाने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने का दिन है, जिसकी शुरुआत 2008 में हुई; जिसके माध्यम से बालिकाओं की तस्वीर बदल रही है, जहाँ अब वे शिक्षा, खेल और नेतृत्व में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और कुपोषण जैसी चुनौतियां अभी भी हैं, जिन्हें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं और कानूनों से दूर करने का प्रयास जारी है, जिससे वे समाज का गौरव और प्रगति का चेहरा बन सकें। इस दिवस का उद्देश्य बालिकाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना, लैंगिक भेदभाव को कम करना, शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के महत्व पर जोर देना है। बालिकाएं अब विज्ञान, प्रौद्योगिकी, रक्षा और नेतृत्व जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। समाज में बेटियों के प्रति सोच में बदलाव आया है। कानूनी उपाय जैसे बाल विवाह निषेध अधिनियम, पोस्को अधिनियम और सरकारी योजनाएं जैसे मिशन वात्सल्य, पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन आदि बालिकाओं के कल्याण के लिए काम कर रही हैं। इन सबके बावजूद आज भी बालिकाएं शोषण एवं भेदभाव का शिकार है। बालिका लिंगानुपात में भले ही सुधार हुआ है, लेकिन बाल विवाह और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएँ अभी भी मौजूद हैं। बालिकाओं में एनीमिया और कम वजन जैसी पोषण संबंधी समस्याएं चिंता का विषय बनी हुई हैं। पितृसत्तात्मक मानसिकता को खत्म करने और बालिकाओं को समान अवसर देने की आवश्यकता है।

आजादी के अमृत काल में भारत स्वयं को एक नए आत्मविश्वास, नई आकांक्षाओं और नए संकल्पों के साथ गढ़ रहा है। इस परिवर्तनशील भारत की सबसे मजबूत आधारशिला यदि कोई है, तो वह है-बालिका। राष्ट्रीय बालिका दिवस आत्ममंथन का अवसर है कि आज हमारी बालिकाएं किस दशा में हैं, किस दिशा में बढ़ रही हैं और समाज उनके लिए कैसा भविष्य रच रहा है। यह भी प्रश्न है कि क्या हम वास्तव में उस भारत का निर्माण कर पा रहे हैं, जहां बालिका जन्म से ही बोझ नहीं, बल्कि भविष्य की निर्माता मानी जाए। दोनों हाथ एक साथ को चरितार्थ करते हुए पुरुष एवं नारी दोनों की शक्ति से नया भारत निर्मित हो।

पिछले कुछ दशकों में बालिकाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ी है, खेल, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति और उद्यमिता में बालिकाओं और महिलाओं ने असाधारण उपलब्धियां अर्जित की हैं। आज ग्रामीण भारत की बेटियां भी अंतरिक्ष विज्ञान, स्टार्टअप, सेना और सिविल सेवाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। यह परिवर्तन संकेत देता है कि आजादी के अमृत काल में महिलाओं और बालिकाओं की भूमिका केवल सहभागी नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी होगी और यही राष्ट्र के सर्वाेच्च शिखर की ओर ले जाने वाली शक्ति बनेगी। लेकिन इस उजली तस्वीर के समानांतर एक कड़वा यथार्थ भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आज भी बालिकाओं और महिलाओं के विरुद्ध अपराध, शोषण, यौन हिंसा, घरेलू अत्याचार, बाल विवाह और साइबर उत्पीड़न जैसी घटनाएं समाज की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

बलात्कार और हिंसा की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं हैं, वे हमारी सामूहिक मानसिकता की विफलता का परिणाम हैं। जब एक बच्ची की सुरक्षा घर, स्कूल, सड़क और डिजिटल दुनिया-कहीं भी सुनिश्चित नहीं होती, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि विकास के दावे अधूरे हैं।

नए भारत, विकसित भारत और समता-मूलक भारत की परिकल्पना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच का केंद्रबिंदु नारी-शक्ति और विशेषकर बालिकाओं का सशक्तिकरण है। उनका दृष्टिकोण केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता के रूपांतरण का आह्वान करता है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी अनेक योजनाओं ने बालिका को बोझ नहीं, बल्कि राष्ट्र की पूंजी के रूप में देखने की दृष्टि विकसित की है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, डिजिटल सशक्तिकरण और सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं ने बालिकाओं के लिए अवसरों के नए द्वार खोले हैं। प्रधानमंत्री का यह स्पष्ट संदेश है कि जब तक बालिका शिक्षित, सुरक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होगी, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा। उनकी व्यापक सोच बालिका को केवल संरक्षण की वस्तु नहीं, बल्कि नेतृत्व, नवाचार और राष्ट्र निर्माण की सक्रिय सहभागी मानती है। यही कारण है कि आज की बालिकाएं आत्मविश्वास के साथ विज्ञान, खेल, प्रशासन और उद्यमिता में आगे बढ़ रही हैं और आने वाला भारत नारी-शक्ति के नेतृत्व में संतुलित, समतामूलक और सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरता दिखाई देता है।

समस्या की जड़ केवल अपराधी नहीं, बल्कि वह सोच है जो बालिका को कमजोर, पराधीन और सहनशील मानती है। यह सोच परिवार से शुरू होकर समाज और संस्थानों तक फैलती है। बेटा-बेटी में भेद, आज भी कई घरों में संसाधनों, अवसरों और स्वतंत्रता के वितरण में दिखाई देता है। बालिकाओं को ‘संस्कार’ के नाम पर चुप रहना सिखाया जाता है, जबकि बालकों को अधिकार और स्वच्छंदता। यही असमान सामाजिक प्रशिक्षण आगे चलकर हिंसा और शोषण को जन्म देता है। आज जरूरत है एक नए सामाजिक दृष्टिकोण की-ऐसे दृष्टिकोण की, जिसमें अपराध के बाद की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि अपराध से पहले की रोकथाम केंद्र में हो। समाज को यह समझना होगा कि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक पराजय हैं। कानून सख्त हों, यह आवश्यक है, पर उससे भी अधिक आवश्यक है सामाजिक चेतना का परिवर्तन। जब तक हम पीड़िता से प्रश्न पूछते रहेंगे, उसके कपड़े, उसका समय, उसकी स्वतंत्रता-तब तक अपराधियों का मनोबल टूटेगा नहीं। इसी के साथ बालिकाओं और महिलाओं को भी अपनी सोच को नए सिरे से गढ़ना होगा। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, मानसिक और वैचारिक भी होनी चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री नहीं, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। बालिकाओं को यह सिखाना होगा कि वे अपने अधिकारों को पहचानें, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएं और स्वयं को किसी भी रूप में कमतर न मानें। आज की बालिका को ‘सहनशील’ नहीं, ‘सजग और सशक्त’ बनाना समय की मांग है।

शासन और प्रशासन की भूमिका भी इस परिवर्तन में निर्णायक है। योजनाएं तभी प्रभावी होंगी, जब वे जमीनी स्तर तक पहुंचें और उनका क्रियान्वयन संवेदनशीलता के साथ हो। पुलिस, न्यायपालिका, शिक्षा तंत्र और स्वास्थ्य व्यवस्था-सभी में जेंडर संवेदनशीलता को अनिवार्य बनाना होगा। फास्ट ट्रैक न्याय, पीड़िता केंद्रित प्रक्रियाएं और मानसिक परामर्श जैसी व्यवस्थाएं केवल कागजों में नहीं, व्यवहार में दिखनी चाहिए। डिजिटल युग में साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन उत्पीड़न से निपटने के लिए भी विशेष रणनीति आवश्यक है। साथ ही, पुरुषों और बालकों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लैंगिक समानता केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। बालकों को बचपन से ही सम्मान, सह-अस्तित्व और समानता के मूल्य सिखाने होंगे। जब पुरुष स्वयं को ‘रक्षक’ नहीं, बल्कि ‘सहयात्री’ मानेंगे, तभी समाज में वास्तविक संतुलन आएगा। पितृसत्ता की जड़ें तभी कमजोर होंगी, जब परिवार में पिता और मां दोनों समान रूप से बालिका की क्षमताओं पर विश्वास करेंगे।

आजादी के अमृत काल में भारत जिस ‘विकसित राष्ट्र’ की परिकल्पना कर रहा है, वह तब तक पूर्ण नहीं हो सकती, जब तक उसकी आधी आबादी भय, भेदभाव और असुरक्षा में जीती रहे। बालिका केवल भविष्य की नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान की निर्माता है। उसकी शिक्षा, सुरक्षा और सशक्तिकरण में किया गया निवेश, राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है। जब एक बालिका सुरक्षित, शिक्षित और आत्मविश्वासी होती है, तब वह केवल अपना जीवन नहीं बदलती-वह पीढ़ियों का भविष्य संवार देती है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस 2026 पर यह संकल्प आवश्यक है कि हम केवल नारों और दिवस-विशेष की औपचारिकताओं तक सीमित न रहें। हमें अपने घरों, स्कूलों, कार्यस्थलों और समाज में व्यवहारिक परिवर्तन लाना होगा। सोच बदलनी होगी-बालिका को दया या संरक्षण की नहीं, सम्मान और समान अवसर की जरूरत है। जब समाज, शासन और स्वयं बालिकाएं मिलकर इस परिवर्तन की जिम्मेदारी उठाएंगी, तब निश्चित ही आजादी के अमृत काल में भारतीय बालिका राष्ट्र के सर्वाेच्च शिखर पर अपनी भूमिका निभाती दिखाई देगी-न केवल प्रतीक के रूप में, बल्कि शक्ति, विवेक और भविष्य की दिशा तय करने वाली निर्णायक शक्ति के रूप में।