टोल विवाद के बहाने पंजाब–हिमाचल के बीच उभरती पुरानी दरारें

Toll dispute sparks old rift between Punjab and Himachal

अजेश कुमार

हिमाचल प्रदेश और पंजाब के रिश्तों को अक्सर ‘बड़े और छोटे भाई’ की संज्ञा दी जाती रही है। यह केवल एक भावनात्मक उपमा नहीं, बल्कि साझा इतिहास, सांस्कृतिक जुड़ाव, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक संपर्कों की उस विरासत का प्रतीक है, जिसने दशकों तक इन दोनों राज्यों के संबंधों को सहज और संतुलित बनाए रखा, लेकिन हालिया घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि इस आत्मीयता के पीछे कई ऐसे अनसुलझे प्रश्न छिपे हुए हैं, जो समय-समय पर सतह पर आकर रिश्तों में तनाव पैदा करते हैं।

इस बार विवाद की शुरुआत भले ही टोल शुल्क में वृद्धि से हुई हो, लेकिन इसका दायरा केवल राजस्व या प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है। यह उन गहरे राजनीतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक मतभेदों का प्रतिबिंब है, जो वर्षों से सुलग रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा एक अप्रैल 2026 से अन्य राज्यों में पंजीकृत वाहनों पर प्रवेश शुल्क में भारी बढ़ोतरी का निर्णय इस विवाद का तात्कालिक कारण बना। नई नीति के तहत निजी वाहनों से लेकर भारी व्यावसायिक ट्रकों तक, सभी श्रेणियों में शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है, जबकि राज्य के भीतर पंजीकृत वाहनों को पूरी तरह छूट दी गई है। सरकार का तर्क है कि यह निर्णय पर्यटन के बढ़ते दबाव और सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी राज्य की बुनियादी संरचना को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है। साथ ही, केंद्र से मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान में कमी ने राज्य की वित्तीय स्थिति को कमजोर किया है, जिसके चलते नए संसाधनों की तलाश अनिवार्य हो गई है।

हिमाचल जैसे राज्यों के सामने यह एक सामान्य चुनौती है कि वे विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें। पर्यटन जहां आय का बड़ा स्रोत है, वहीं यह स्थानीय संसाधनों पर दबाव भी बढ़ाता है। ऐसे में प्रवेश शुल्क जैसी नीतियां एक प्रकार से ‘डिमांड मैनेजमेंट’ का काम करती हैं, हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह का भेदभावपूर्ण शुल्क संघीय ढांचे की भावना के अनुरूप है? यही वह बिंदु है जहां से पंजाब की आपत्ति शुरू होती है।

पंजाब सरकार ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और जवाबी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। राज्य के वित्त मंत्री ने ‘एक राष्ट्र, एक कर’ की अवधारणा का हवाला देते हुए इसे असंवैधानिक बताया और संकेत दिया कि पंजाब भी हिमाचल के वाहनों पर समान शुल्क लगाने पर विचार कर सकता है। यह प्रतिक्रिया केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। पंजाब से बड़ी संख्या में पर्यटक हिमाचल जाते हैं, और इस निर्णय का सीधा असर वहां के नागरिकों पर पड़ेगा। ऐसे में, राज्य सरकार पर यह दबाव स्वाभाविक है कि वह अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए कड़ा रुख अपनाए।

लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि भारत का संघीय ढांचा राज्यों को कुछ हद तक कर लगाने और राजस्व जुटाने की स्वतंत्रता देता है। प्रवेश कर या टोल जैसे प्रावधान पूरी तरह नए नहीं हैं, हालांकि जीएसटी लागू होने के बाद इस तरह के शुल्कों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी है।

टोल शुल्क का यह विवाद दरअसल उन कई लंबित मुद्दों को फिर से सामने ले आया है, जो वर्षों से दोनों राज्यों के बीच तनाव का कारण बने हुए हैं। पहला, शानन जलविद्युत परियोजना विवाद। दरअसल, मंडी जिले में स्थित यह परियोजना लगभग एक सदी पुरानी है और इसकी लीज अवधि 2024 में समाप्त हो चुकी है। हिमाचल का दावा है कि चूंकि भूमि और जल स्रोत उसके हैं, इसलिए परियोजना का स्वामित्व उसे मिलना चाहिए। दूसरी ओर, पंजाब का तर्क है कि पुनर्गठन अधिनियम और केंद्र की अधिसूचनाओं के आधार पर यह परियोजना उसके अधिकार में है। मामला फिलहाल न्यायालय में लंबित है और केंद्र सरकार ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह विवाद केवल संपत्ति के स्वामित्व का नहीं, बल्कि जल संसाधनों और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा रणनीतिक प्रश्न है।

दूसरा, भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड विवाद। हिमाचल का दावा है कि उसे अपनी हिस्सेदारी के आधार पर हजारों करोड़ रुपये मिलने चाहिए, जबकि उसने हाल ही में हाइडिल परियोजनाओं पर भूमि राजस्व सेस भी लगा दिया है। पंजाब और अन्य राज्यों ने इसे संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है। यह विवाद दर्शाता है कि प्राकृतिक संसाधनों के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच स्पष्ट और स्थायी व्यवस्था का अभाव है। तीसरा, चंडीगढ़ और क्षेत्रीय हिस्सेदारी। चंडीगढ़ में हिमाचल की हिस्सेदारी का मुद्दा भी समय-समय पर उठता रहा है, हालांकि यह अक्सर राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।

इन सभी मुद्दों की एक समान विशेषता है, इनका समाधान टलता रहा है, जिससे असंतोष समय-समय पर नए रूप में सामने आता रहता है। राजनीतिक और आर्थिक विवादों के अलावा कुछ सामाजिक घटनाओं ने भी दोनों राज्यों के संबंधों को प्रभावित किया है। 2025 में धार्मिक प्रतीकों को लेकर हुए विवाद और उसके बाद बसों पर हमले जैसी घटनाओं ने माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया था, हालांकि सरकारों ने उस समय स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि राजनीतिक विवादों को समय रहते हल नहीं किया गया, तो वे सामाजिक तनाव में भी बदल सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्यटन आधारित राज्यों में सांस्कृतिक संवेदनशीलता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होता है। बाहरी पर्यटकों और स्थानीय समुदायों के बीच संतुलन बिगड़ने पर छोटे मुद्दे भी बड़े विवाद का रूप ले सकते हैं। पंजाब और हिमाचल के संबंधों की जड़ें इतिहास में गहराई तक फैली हुई हैं। हिमाचल का गठन विभिन्न पहाड़ी रियासतों को मिलाकर हुआ और बाद में पंजाब के पुनर्गठन के दौरान कई क्षेत्र इसमें शामिल किए गए।

दोनों राज्यों के बीच भौगोलिक निकटता, व्यापारिक संपर्क और सांस्कृतिक समानताएं आज भी मजबूत हैं। हजारों लोग रोज़गार, शिक्षा और व्यापार के लिए एक-दूसरे के राज्यों में आते-जाते हैं। यही कारण है कि इन संबंधों में तनाव केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय स्तर पर भी असर डालता है।

यह पूरा विवाद भारत के संघीय ढांचे की भी परीक्षा है। एक ओर राज्यों को आर्थिक स्वायत्तता की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता और समानता का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है।

केंद्र सरकार की भूमिका यहां निर्णायक हो सकती है। उसे मध्यस्थता करते हुए ऐसे तंत्र विकसित करने होंगे, जिससे राज्यों के बीच संसाधनों और राजस्व को लेकर विवादों का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

साथ ही, राज्यों को भी यह समझना होगा कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए कदम दीर्घकालिक संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस स्थिति से निकलने का सबसे प्रभावी तरीका संवाद और सहयोग ही हो सकता है। दोनों राज्यों के बीच नियमित संवाद के लिए एक स्थायी मंच बनाया जा सकता है। साथ ही, पर्यटन और संसाधनों के उपयोग के लिए साझा नीति बनाई जा सकती है। कानूनी स्पष्टता के साथ लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सांस्कृतिक संवाद: सामाजिक स्तर पर विश्वास बहाली के लिए पहल जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन उपायों को गंभीरता से लागू किया जाए, तो न केवल वर्तमान विवाद सुलझ सकते हैं, बल्कि भविष्य में ऐसे टकरावों की संभावना भी कम हो सकती है। पंजाब और हिमाचल के बीच मौजूदा तनाव यह दर्शाता है कि मजबूत दिखने वाले रिश्तों के भीतर भी कई अनसुलझे प्रश्न छिपे हो सकते हैं। टोल शुल्क का यह विवाद केवल एक ट्रिगर है, जिसने इन सभी मुद्दों को एक साथ सामने ला दिया है।

अंततः यह सवाल नहीं है कि कौन बड़ा भाई है और कौन छोटा। असली प्रश्न यह है कि क्या दोनों राज्य अपने ऐतिहासिक संबंधों की परिपक्वता को बनाए रखते हुए संवाद और सहयोग का रास्ता चुनते हैं, या फिर हर नया निर्णय एक नए विवाद को जन्म देता रहेगा। यदि, समझदारी और दूरदृष्टि से काम लिया गया, तो यह विवाद एक अवसर भी बन सकता है। रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने और उन्हें अधिक संतुलित तथा टिकाऊ बनाने का। अन्यथा, यह केवल एक और उदाहरण बनकर रह जाएगा कि कैसे छोटी-छोटी नीतिगत असहमतियां बड़े संबंधों में दरार पैदा कर सकती हैं।