जगराम गुर्जर
भारत के पारंपरिक मेले केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, वे हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का जीवंत हिस्सा हैं। गांव-गांव, शहर-शहर लगने वाले ये मेले सदियों से लोगों के मेल-मिलाप, लोक संस्कृति और आजीविका का आधार रहे हैं। यहां झूले लगाने वाले, खिलौने बेचने वाले, बर्तन, चूड़ी, हस्तशिल्प बेचने वाले दुकानदार, बुनकर, लोक कलाकार और छोटे कुटीर उद्योगों से जुड़े हजारों परिवार अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं लेकिन आज यह पारंपरिक कारोबार गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। विशेष रूप से गुजरात में तो स्थिति ऐसी बन गई है कि मेले लगभग समाप्ति की ओर हैं। अन्य राज्यों में भी कड़े नियमों की आशंका से मेला आयोजकों और झूला संचालकों के बीच असुरक्षा का माहौल है।
राजकोट में एक गेमिंग जोन में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस हादसे के बाद राज्य सरकार ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सख्त नियम लागू किए। जन सुरक्षा सर्वोपरि है, इसमें कोई मतभेद नहीं हो सकता। सरकार का दायित्व है कि वह नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। लेकिन नियम बनाते समय इस बात पर शायद ध्यान ही नहीं दिया गया कि राजकोट की घटना एक बंद, पक्के और अवैध गेमिंग जोन में हुई थी जबकि पारंपरिक मेले और झूले खुले वातावरण में अस्थायी ढांचे में लगाए जाते हैं।
खुले मेलों के झूले न तो पक्के भवनों में होते हैं, न ही उनमें जटिल बिजली व्यवस्था या आग पकडऩे वाली बनावट होती हैं। इसके बावजूद नए नियमों का सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं छोटे मेला आयोजकों और झूला संचालकों पर पड़ा है। नए प्रावधानों के तहत महंगे इंजीनियरिंग सर्टिफिकेट, भारी बीमा कवर, जटिल लाइसेंस प्रक्रिया और बार-बार निरीक्षण जैसी शर्तें लागू कर दी गई हैं। छोटे स्तर पर काम करने वाले ये लोग पहले ही भारी कर्ज लेकर अपने झूले खरीदते हैं। उनके लिए महंगे प्रमाण पत्र और बीमा प्रीमियम जुटाना लगभग असंभव है। परिणामस्वरूप, गुजरात में मेले लगने बंद हो गए हैं, झूले खुले मैदानों में जंग खा रहे हैं और हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। मेले और झूले वालों में से अधिकांश के पास इस पारंपरिक काम के अलावा कोई वैकल्पिक रोजगार नहीं है। पीढिय़ों से यही इनका पेशा रहा है। यह केवल व्यवसाय नहीं, इनकी पहचान भी है। यदि यह बंद होता है तो केवल रोजगार ही नहीं, एक जीवंत लोक परंपरा भी समाप्त हो जाएगी।
गौर करने वाली बात है कि कोई भी मेला आयोजक या झूला संचालक सुरक्षा नियमों को हटाने की मांग नहीं कर रहा। बंद गेमिंग जोनों के लिए कठोर नियम आवश्यक हैं और उनका पालन होना चाहिए लेकिन खुले मेलों के पारंपरिक झूलों के लिए अलग, सरल और व्यवहारिक नियम बनाए जाने चाहिए।
सरकार यदि श्रेणीकरण (कैटेगराइजेशन) की व्यवस्था करे तो भी झूले वालों को राहत मिल सकती है। जैसे बड़े यांत्रिक राइड्स और छोटे पारंपरिक झूलों के लिए अलग-अलग मानक बनाए जाएं तो इससे संतुलन बन सकता है। इसके साथ ही समूह बीमा योजना, कम लागत निरीक्षण प्रणाली और लाइसेंस प्रक्रिया को सरल बनाने जैसे कदम उठाए जाएं तो मेला व्यवसायी सुरक्षा मानकों का पालन भी कर सकेंगे और अपनी आजीविका भी बचा पाएंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नए नियमों को लागू करते समय ग्रेस पीरियड दिया जाए। यदि दो से तीन वर्षों का समय दिया जाए तो छोटे संचालक धीरे-धीरे आवश्यक प्रावधानों को पूरा कर सकते हैं। अचानक लागू की गई कठोर शर्तों ने पूरे तंत्र को ठप कर दिया है।
हाल में सूरजकुंड में झूला टूटने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना भी सामने आई। ऐसी घटनाएं निश्चित रूप से चिंताजनक हैं लेकिन हर हादसे का पूरा दोष झूला संचालक पर डाल देना न्यायसंगत नहीं है। यह भी जांच का विषय है कि कहीं झूलों के निर्माण में तकनीकी खामी या मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट तो नहीं था। आज देश में अनेक झूला निर्माता कार्यरत हैं। क्या उनके निर्माण मानकों की नियमित जांच होती है? क्या यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर झूला तकनीकी कसौटियों पर खरा उतरता है? यदि निर्माण स्तर पर ही त्रुटि रह जाए तो उसका खामियाजा अंतिम संचालक और आम जनता को भुगतना पड़ता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल संचालन स्तर पर कठोरता बढ़ाने में नहीं है बल्कि निर्माण से लेकर संचालन तक एक संतुलित और व्यवहारिक निगरानी व्यवस्था बनाने में है।
पारंपरिक मेलों को समाप्त होने देना केवल आर्थिक क्षति नहीं होगी बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत के लिए भी आघात होगा। आज जब बड़े मॉल और डिजिटल मनोरंजन के साधन तेजी से बढ़ रहे हैं, तब भी मेले लोगों को खुला, सामुदायिक और पारिवारिक मनोरंजन प्रदान करते हैं। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को संबल देने में इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आवश्यक है कि सरकार, प्रशासन और मेला आयोजकों के प्रतिनिधि मिलकर एक व्यवहारिक नीति तैयार करें। एक ऐसी नीति जो भले ही सुरक्षा से समझौता न करे लेकिन छोटे व्यवसायियों को काम करने से भी नहीं रोके। यदि समय रहते संतुलित निर्णय नहीं लिया गया तो आने वाली पीढिय़ां शायद केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी हमारे गांव-शहरों में रंग-बिरंगे मेले लगते थे जिनमें बच्चों की हंसी और लोकगीतों की गूंज होती थी। सुरक्षा और आजीविका के बीच संतुलन ही इस संकट का वास्तविक समाधान है। यही समय की मांग है।
(लेखक मेला आयोजकों के संगठन भारतीय मेला एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)





