ट्रंप की मज़बूर ‘एग्जिट’ चाल, ईरान का भीषण प्रहार और इज़रायल की अग्निपरीक्षा

Trump's forced exit move, Iran's devastating attack, and Israel's ordeal

दिलीप कुमार पाठक

आज मध्य-पूर्व के तपते और बारूद की गंध से भरे रेगिस्तान में इतिहास की सबसे खतरनाक पटकथा लिखी जा रही है। यह वह दौर है जहाँ कूटनीति की मेजें टूट चुकी हैं और बंदूकों की नालें दहक रही हैं। पूरी दुनिया की सांसें थम गई हैं क्योंकि अप्रैल 2026 का यह महीना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो रहा है, जहाँ अमेरिका जैसी महाशक्ति की ‘हेकड़ी’ और उसका वैश्विक रसूख ईरान के फौलादी इरादों के सामने पस्त पड़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो व्हाइट हाउस की कुर्सी संभालते ही ईरान को ‘पत्थर युग’ में भेजने की गर्जना कर रहे थे, आज उसी ईरान की अभूतपूर्व सैन्य दृढ़ता और अचूक मिसाइल तकनीक के सामने खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पा रहे हैं। ट्रंप का हालिया और चौंकाने वाला बयान, जिसमें उन्होंने अगले 2 से 3 हफ्तों के भीतर ईरान से अपनी सेना को बाहर निकालने की बात कही है, दरअसल कोई सोची-समझी रणनीति या शांति की पहल नहीं है, बल्कि एक हारी हुई बाजी से सुरक्षित निकलने की छटपटाहट है।

ट्रंप की इस ‘एग्जिट’ चाल के पीछे की असलियत यह है कि अमेरिका की दादागिरी ईरान के आत्मसम्मान और उसकी मज़बूत घेराबंदी के सामने धराशायी हो चुकी है। ट्रंप जो खुद को ‘सर्वश्रेष्ठ डील मेकर’ कहते थे, आज ईरान की शर्तों के सामने बेबस नज़र आ रहे हैं। उनकी ‘शांति की बात’ दरअसल उनकी अपनी कमजोरी को छिपाने का एक पर्दा है। वे जानते हैं कि अगर वे अब बाहर नहीं निकले, तो अमेरिका को एक ऐसे क्षेत्रीय महायुद्ध का सामना करना पड़ेगा जिसकी आंच सीधे वाशिंगटन तक पहुँचेगी। ईरान ने साफ़ संदेश दे दिया है कि मध्य-पूर्व अब अमेरिका की जागीर नहीं है और यहाँ की हवाओं में अब तेहरान की मर्जी चलेगी। ट्रंप की धमकियाँ अब बेअसर साबित हो रही हैं क्योंकि ईरान ने अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य तंत्र को इस कदर मज़बूत कर लिया है कि उसे अब डराना मुमकिन नहीं रहा। अमेरिका के भीतर भी अब और युद्धों में पैसा और खून बहाने के खिलाफ उठती आवाज़ों ने ट्रंप के हाथ बांध दिए हैं, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए हैं।

ट्रंप के इस पीछे हटने वाले कदम ने मध्य-पूर्व में शक्ति का शून्य पैदा कर दिया है, जिसे भरने के लिए रूस और चीन भूखे भेड़ियों की तरह तैयार बैठे हैं। जैसे-जैसे अमेरिकी सेना के कदम पीछे हट रहे हैं, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग के लिए इस तेल-समृद्ध क्षेत्र में अपने पैर पसारने का सुनहरा मौका मिल गया है। रूस के लिए यह अपनी खोई हुई सोवियत कालीन साख को वापस पाने का अवसर है; वह पहले से ही सीरिया में मज़बूत है और अब ईरान के साथ सैन्य गठबंधन कर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने की फिराक में है। वहीं चीन, जो अपनी ‘ब्रोकर’ की भूमिका से पूरी दुनिया को चौंका चुका है, अब अपनी ‘बैटल और रोड पहल’ के ज़रिए इस पूरे क्षेत्र को आर्थिक रूप से अपना गुलाम बनाने की तैयारी में है। ट्रंप की इस ‘एग्जिट’ ने चीन के लिए वह रास्ता खोल दिया है जहाँ वह बिना एक भी गोली चलाए मध्य-पूर्व का नया ‘आर्थिक महाबली’ बनकर उभर सकता है।

दूसरी तरफ, ईरान का पक्ष आज इस संघर्ष में एक अजेय विजेता की तरह उभर कर सामने आया है। तेहरान ने साफ़ कर दिया है कि वह अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में नहीं रहेगा, बल्कि ‘आक्रामक रक्षा’ की नीति अपनाते हुए दुश्मन को उसके घर में घुसकर मारेगा। ईरान ने अपनी जिस मिसाइल शक्ति और आधुनिक ड्रोन तकनीक का प्रदर्शन हाल के दिनों में किया है, उसने पेंटागन से लेकर तेल अवीव तक के सैन्य विशेषज्ञों के होश उड़ा दिए हैं। ईरान की मिसाइलों ने न केवल इज़रायल की बहुप्रचारित सुरक्षा प्रणालियों आयरन डोम को धता बताया, बल्कि जॉर्डन और इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को भी सीधा निशाना बनाकर यह साबित कर दिया कि अमेरिका का ‘सुरक्षा कवच’ अब पुराना पड़ चुका है। ईरान आज अपनी ‘प्रॉक्सी’ सेनाओं, जैसे हिजबुल्लाह और हूतियों के ज़रिए इज़रायल को चारों तरफ से घेर चुका है, जिससे यह संघर्ष अब एक क्षेत्रीय महायुद्ध में बदलता जा रहा है जहाँ हर चाल ईरान के पक्ष में बैठ रही है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा बेचैनी, गुस्सा और असुरक्षा इज़रायल के खेमे में है। इज़रायल के लिए ट्रंप का यह ‘एग्जिट प्लान’ किसी बड़े धोखे और मौत के वारंट से कम नहीं है। इज़रायल का पक्ष पत्थर की लकीर की तरह स्पष्ट है, उनका मानना है कि अमेरिका का पीछे हटना ईरान को पूरे क्षेत्र का बेताज बादशाह बना देगा। इज़रायल को उम्मीद थी कि ट्रंप की वापसी के बाद ईरान के परमाणु और मिसाइल ठिकानों को जमींदोज कर दिया जाएगा, लेकिन यहाँ तो पासा ही पलट गया। ट्रंप की बेबसी ने इज़रायल को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ उसे अपने अस्तित्व के लिए अकेले ही बारूद के दरिया में उतरना पड़ेगा। इज़रायल आज छटपटा रहा है क्योंकि उसकी सुरक्षा का जो अमेरिकी ‘कवच’ दशकों से उसे अभयदान देता आ रहा था, उसमें अब ट्रंप खुद ही छेद कर रहे हैं। इज़रायल के लिए यह लड़ाई अब केवल सीमाओं की नहीं, बल्कि अपने नक्शे को बचाए रखने की अंतिम जद्दोजहद बन गई है।

इज़रायल आज चीख-चीख कर दुनिया को बता रहा है कि वह अधूरा युद्ध नहीं छोड़ेगा। उसने अपने रक्षा बजट में $10 बिलियन की जो ऐतिहासिक वृद्धि की है, वह दुनिया को यह बताने के लिए काफी है कि वह अब ‘करो या मरो’ की स्थिति में है। इज़रायली नेतृत्व को अच्छी तरह पता है कि अगर ट्रंप की सेना चली गई, तो ईरान के नेतृत्व में दुश्मन गुट उसे चारों तरफ से नोच खाएंगे। आज इज़रायल की वायुसेना और उसकी खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ अपनी पूरी ताकत झोंक रही हैं, लेकिन ईरान के भूमिगत ‘मिसाइल शहरों’ ने इज़रायल की नींद उड़ा रखी है। इज़रायल के लिए ‘एग्जिट’ जैसा कोई विकल्प नहीं है; उसके लिए केवल ‘आर-पार की जंग’ ही एकमात्र रास्ता बचा है, क्योंकि हार का मतलब उसके वजूद का अंत होगा।

अंततः, आज की वैश्विक हकीकत यह है कि अमेरिका की ‘हेकड़ी’ ईरान की फौलादी तैयारी के सामने खत्म हो चुकी है। ट्रंप जो कल तक ईरान को ‘मलबे’ में बदलने की बात करते थे, आज वहां से ‘इज्जत’ बचाने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। यह संघर्ष केवल दो देशों की जंग नहीं है, बल्कि यह उस पुराने विश्व-क्रम के अंत की शुरुआत है जहाँ अमेरिका की मर्जी ही कानून होती थी। ईरान ने अपनी ज़िद और ताकत से यह साबित कर दिया है कि एक क्षेत्रीय शक्ति भी दुनिया के सबसे बड़े ‘अहंकार’ को घुटनों पर ला सकती है। जहाँ एक तरफ रूस और चीन इस ‘शक्ति के बंटवारे’ का जश्न मना रहे हैं, वहीं इज़रायल अपनी ज़मीन बचाने के लिए लहू बहाने को आमादा है। आने वाले 21 दिन दुनिया को यह दिखा देंगे कि कैसे एक महाशक्ति के पैर उखड़ते हैं और कैसे मध्य-पूर्व का नया भूगोल बारूद की स्याही से लिखा जाता है।