कृति आरके जैन
आज का समय परिवर्तन की दहलीज़ पर खड़ा है, जहां परंपरा की जड़ें गहरी हैं और आधुनिकता की हवाएं तीव्र। महिलाएं इसी द्वंद्व के केंद्र में खड़ी हैं, अपने लिए दिशा तय करती हुई। एक तरफ पारिवारिक रूढ़ियां, सांस्कृतिक बंधन, तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता की आकांक्षा और करियर की उड़ान। यह संघर्ष केवल टकराव नहीं, बल्कि चेतना की परख है, जहां महिलाएं चुनौती ही नहीं दे रहीं, बल्कि नया इतिहास गढ़ रही हैं। परंपरा उन्हें जड़ों से बांधती है, जबकि आधुनिकता पंख देती है। प्रश्न यही है कि क्या वे दोनों को संतुलित कर पा रही हैं? या फिर चुनाव में खो रही हैं अपनी पहचान? आज की महिलाएं इस द्वंद्व को अवसर में ढाल रही हैं, आत्मबल से खुद को सशक्त बनाते हुए। वे न घर से विमुख हैं, न सपनों से समझौता कर रही हैं। यह उनकी निरंतर यात्रा है, जहां प्रत्येक कदम बदलाव की घोषणा है।
परंपरा की छाया में महिलाओं की भूमिका सदियों से निर्धारित रही है। घर की चारदीवारी, विवाह और संतान पालन ही उनके जीवन की परिधि मानी गई। भारतीय समाज में विशेष रूप से सतीत्व, समर्पण और त्याग को आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया गया। सीता से रानी लक्ष्मीबाई तक, परंपरा ने महिलाओं को देवी का स्थान तो दिया, पर सीमाओं में बांधे रखा। आधुनिकता ने इसी दायरे को चुनौती दी। शिक्षा की रोशनी, रोजगार की स्वतंत्रता और वैश्विक सोच ने उन्हें नई दिशा दिखाई। आज की महिलाएं परंपरा का सम्मान करती हैं, पर उसे बंधन स्वीकार नहीं करतीं। वे पर्व-त्योहार भी निभाती हैं और करियर की सीढ़ियां भी चढ़ती हैं। यही संतुलन उनकी वास्तविक शक्ति है, जहां पुरानी रीतियां नए अर्थ ग्रहण कर रही हैं। पारिवारिक दायित्वों के साथ वे कॉर्पोरेट दुनिया में अपनी पहचान बना रही हैं। यह किसी एक का चयन नहीं, बल्कि सामंजस्य की सशक्त मिसाल है।
आधुनिकता की लहर ने महिलाओं को वैश्विक मंच प्रदान किया है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन शिक्षा ने दूरियों को मिटा दिया। अब वे घर बैठे दुनिया से जुड़ रही हैं। कहीं उद्यमी बनकर स्टार्टअप चला रही हैं, तो कहीं राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। हालांकि यह राह सरल नहीं है। समाज की दृष्टि आज भी कठोर है। देर रात काम करने पर सवाल उठते हैं, और घर से बाहर कदम रखने पर संस्कृति की दुहाई दी जाती है। इसके बावजूद वे निरंतर आगे बढ़ रही हैं। इंद्रा नूयी से प्रियंका चोपड़ा तक, ये उदाहरण परंपरा को नई चुनौती देते हैं। वे साड़ी में बोर्डरूम जाती हैं और जींस में मंदिर। यही द्वंद्व उनकी पहचान है, जहां वे न झुकती हैं, न बिखरती हैं।
चुनौतियां हर कदम पर मौजूद हैं। परिवार की अपेक्षाएं, विवाह का दबाव और मातृत्व की जिम्मेदारियां परंपरा की कठोर कसौटियां हैं। आधुनिकता स्वतंत्रता का संदेश देती है, लेकिन समाज अनुकूलन की शर्त रखता है। अनेक महिलाएं इसी द्वंद्व में उलझकर मानसिक दबाव का सामना करती हैं। किंतु नई पीढ़ी का दृष्टिकोण अलग है। वे काउंसलिंग अपनाती हैं, नेटवर्क मजबूत करती हैं और सपोर्ट ग्रुप्स से जुड़ती हैं। वे परंपरा को नए अर्थ दे रही हैं, जहां विवाह विकल्प है, बंधन नहीं। करियर और घर के बीच संतुलन बनाते हुए वे नई परिभाषाएं रच रही हैं। यही उनकी उपलब्धि है, जहां बिना अपराधबोध वे स्वयं को प्राथमिकता दे रही हैं।
उदाहरण प्रेरणा का स्रोत बनते हैं। किरण मजूमदार-शॉ ने परंपरागत सीमाओं को तोड़कर विज्ञान और उद्योग में पहचान बनाई। उनका संदेश स्पष्ट है कि सम्मान के साथ प्रगति भी आवश्यक है। मलाला यूसुफजई ने हिंसा के बाद भी शिक्षा की मशाल थामे रखी। भारतीय परिप्रेक्ष्य में पी.वी. सिंधु ने खेल के क्षेत्र में उन धारणाओं को चुनौती दी, जहां लड़कियों की भूमिका सीमित मानी जाती थी। आज की महिलाएं इनसे सीख लेकर आगे बढ़ रही हैं। वे गांवों से निकलकर प्रशासनिक सेवाओं में पहुंच रही हैं और तकनीकी स्टार्टअप्स का नेतृत्व कर रही हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से परंपरा को आधुनिक रंग दे रही हैं, जैसे पारंपरिक व्यंजनों को वैश्विक पहचान दिलाना। यह उनका निर्णय है, जहां वे इतिहास को दोहराने के बजाय नया रचती हैं।
महिलाएं अब संतुलन की कला साध रही हैं। परंपरा का पूर्ण त्याग उचित नहीं, क्योंकि वही संस्कृति की आधारशिला है। वहीं आधुनिकता को बिना सोचे अपनाना भी जोखिमपूर्ण है। इसलिए वे मिश्रित मार्ग चुन रही हैं। वर्क फ्रॉम होम ने इस संतुलन को सहज बनाया है, जहां घरेलू दायित्वों के साथ पेशेवर जीवन आगे बढ़ रहा है। योग और ध्यान से परंपरा जुड़ती है, जबकि डिजिटल ऐप्स से जीवन प्रबंधन होता है। परिवारों में संवाद बढ़ा है, जहां पति और सास-ससुर का सहयोग भी दिखने लगा है। यह परिवर्तन धीमा जरूर है, पर स्थायी है। महिलाएं अब अपनी बेटियों के लिए आदर्श बन रही हैं। वे सिखा रही हैं कि परंपरा का सम्मान करो, लेकिन आधुनिकता से भय मत खाओ। यही संतुलन उनकी असली शक्ति है।
समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुरुषों को भी सोच में बदलाव लाना होगा, ताकि महिलाएं बिना किसी बोझ के निर्णय ले सकें। महिला आरक्षण जैसे कानून सहायक हैं, पर वास्तविक परिवर्तन जमीनी स्तर पर आवश्यक है। इसकी शुरुआत शिक्षा से होनी चाहिए, जहां लड़कियां परंपरा और आधुनिकता दोनों को समझें। एनजीओ और सरकारी योजनाएं इस दिशा में सक्रिय हैं। फिर भी महिलाएं स्वयं नेतृत्व कर रही हैं। वे मतदान कर रही हैं, सवाल उठा रही हैं और परिवर्तन को गति दे रही हैं। जलवायु परिवर्तन से लेकर राजनीति तक, हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। परंपरा उन्हें धैर्य सिखाती है, आधुनिकता उन्हें साहस देती है। दोनों का मेल उन्हें अजेय बनाता है। यह उनका समय है, जहां वे केवल जी नहीं रहीं, बल्कि आगे बढ़ रही हैं।
भविष्य आशाजनक दिखाई देता है। तकनीक ने महिलाओं को और सशक्त बनाया है। एआई और वर्चुअल रियलिटी के माध्यम से वे घर से ही दुनिया को प्रभावित कर रही हैं। हालांकि चुनौतियां अब भी मौजूद हैं, जैसे जेंडर पे गैप और घरेलू हिंसा। इसके बावजूद संघर्ष जारी है। परंपरा अब बोझ नहीं, बल्कि ऊर्जा बन चुकी है। वे दीवाली मनाती हैं, फैशन में आगे हैं और साथ ही निवेश के फैसले भी लेती हैं। यह उनका चयन है, जहां वे स्वयं को परिभाषित कर रही हैं। समाज को स्वीकार करना होगा कि महिलाएं अब सीमाओं में नहीं बंधीं। वे व्यापक हैं, बहुआयामी हैं। उनका मार्ग स्वनिर्धारित है, जहां परंपरा और आधुनिकता साथ चलते हैं।
आज की महिलाएं परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल बना रही हैं। वे न झुकती हैं, न टूटती हैं, बल्कि आगे बढ़ती हैं। उनका चुनाव सशक्तिकरण का है, जहां परिवार, समाज और स्वयं में संतुलन है। यह यात्रा प्रेरक है, हर महिला एक मिसाल। परंपरा उन्हें जड़ें देती है, आधुनिकता पंख, और वे खुले आकाश की ओर उड़ान भर रही हैं। समाज का सहयोग जरूरी है, ताकि यह परिवर्तन स्थायी बने। महिलाएं रुकने वाली नहीं, क्योंकि उनका रास्ता उनका अपना है। यह संघर्ष उनकी शक्ति का प्रतीक है—वे केवल चुन नहीं रहीं, बल्कि जीत रही हैं। कुल मिलाकर यह द्वंद्व उन्हें और सशक्त बनाता है। वे परंपरा का सम्मान करती हैं और आधुनिकता को अपनाती हैं। उनका निर्णय व्यक्तिगत है, पर प्रभाव समाज पर पड़ता है। भविष्य में वे और चमकेंगी, समाज को नई दिशा देंगी। यह उनकी क्रांति है—शांत, संयमित और अजेय।





