अजेश कुमार
बीते 9 फरवरी को अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए रेसिप्रोकल टैरिफ़ (परस्पर शुल्क) समझौते ने दक्षिण एशियाई व्यापार समीकरण में हलचल पैदा कर दी है। नौ महीनों तक चली बातचीत के बाद हस्ताक्षरित इस समझौते के तहत अमेरिका ने बांग्लादेश पर लागू 37 प्रतिशत टैरिफ़ को घटाकर पहले 20 प्रतिशत और अब 19 प्रतिशत कर दिया है, लेकिन असली बदलाव इस एक प्रतिशत कटौती में नहीं, बल्कि उस प्रावधान में छिपा है, जिसके तहत अमेरिकी कपास और कृत्रिम रेशों से बने कुछ विशेष बांग्लादेशी टेक्सटाइल और परिधानों को अमेरिकी बाज़ार में शून्य शुल्क पर प्रवेश मिलेगा।
यह प्रावधान केवल एक व्यापारिक सुविधा नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला की दिशा बदलने वाला संभावित गेम-चेंजर है। समझौते के कुछ ही घंटों बाद भारतीय कपड़ा और सूत कंपनियों के शेयरों में आई गिरावट इस बात का संकेत है कि बाज़ार ने इसे गंभीर चुनौती के रूप में लिया है।
सतह पर देखा जाए तो भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए अमेरिकी टैरिफ़ दर लगभग समान 18-19 प्रतिशत दिखाई देती है, लेकिन बारीकी में जाएं तो अंतर साफ़ है। बांग्लादेश को अमेरिकी कच्चे माल के उपयोग की शर्त पर शून्य टैरिफ़ की विशेष छूट मिल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कम मार्जिन वाले टेक्सटाइल उद्योग में कुछ प्रतिशत की लागत भी निर्णायक हो सकती है।
यदि,वोबांग्लादेश अमेरिकी कपास का उपयोग कर शून्य शुल्क पर अमेरिकी बाज़ार में प्रवेश करता है, तो भारतीय निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाएगी। यह मूल्य-अंतर दीर्घकाल में ऑर्डर शिफ्ट होने का कारण बन सकता है।
चिंता का दूसरा आयाम भारत के कपास किसानों और धागा (यार्न) उद्योग से जुड़ा है। 2024-25 में भारत ने बांग्लादेश को लगभग 1.47 अरब डॉलर मूल्य का सूती धागा निर्यात किया। बांग्लादेश भारतीय यार्न का सबसे बड़ा खरीदार है। इसके अलावा भारत से लाखों गांठ कपास भी वहां भेजी जाती रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बांग्लादेश अमेरिकी कपास और इनपुट्स की ओर झुकता है, तो भारतीय धागा उद्योग के लिए उसका कैप्टिव मार्केट कमजोर पड़ सकता है। बांग्लादेश अब अमेरिकी कपास आयात कर अपने यहां धागा तैयार कर सकता है, और उसी आधार पर शून्य शुल्क का लाभ उठाकर अमेरिका को निर्यात कर सकता है।
इसका अर्थ है कि भारत के कपास किसानों और सूत उद्योग—दोनों पर दबाव बढ़ सकता है। पहले से ही वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव और घरेलू लागत संरचना की चुनौतियों से जूझ रहे इस क्षेत्र के लिए यह नई अनिश्चितता है। यह समझौता केवल द्विपक्षीय व्यापार नहीं, बल्कि अमेरिका की व्यापक व्यापार रणनीति का हिस्सा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका विभिन्न देशों को प्रतिस्पर्धा में डालकर अधिक से अधिक लाभ लेने की नीति पर चल रहा है। पहले भारत के साथ समझौता, फिर बांग्लादेश के साथ यह क्रम संकेत देता है कि वाशिंगटन ‘केस-टू-केस’ आधार पर टैरिफ़ पुनर्संतुलन कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका ऊंचे टैरिफ़ से शुरुआत करता है, फिर बातचीत के माध्यम से आंशिक रियायत देता है और इसे सफलता के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन कुल मिलाकर अमेरिकी बाज़ार अधिक संरक्षणवादी होता जा रहा है। अमेरिकी उद्योगों और कच्चे माल के निर्यात को प्रोत्साहित करना उसकी प्राथमिकता है। बांग्लादेश के साथ शून्य टैरिफ़ की शर्त अमेरिकी कपास और सिंथेटिक फाइबर के निर्यात को बढ़ावा देने का स्पष्ट संकेत है। यह अमेरिकी कृषि और टेक्सटाइल लॉबी के लिए रणनीतिक लाभ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता दक्षिण एशिया में डोमिनो प्रभाव पैदा कर सकता है। भारत और बांग्लादेश दोनों ही अमेरिकी कपड़ा बाज़ार में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। बांग्लादेश के कुल कपड़ा निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत और भारत के सूती परिधान निर्यात का लगभग 26 प्रतिशत अमेरिका जाता है। यदि, बांग्लादेश को शून्य टैरिफ़ का लाभ मिलता है, तो वह उच्च मूल्य वाले सेगमेंट में तेजी से विस्तार कर सकता है। इससे भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर पड़ सकती है, खासकर उन उत्पादों में जहां मूल्य-संवेदनशीलता अधिक है, हालांकि विशेषज्ञ यह भी जोड़ते हैं कि भारत के पास विविध औद्योगिक आधार, कच्चे माल की उपलब्धता और बड़े घरेलू बाज़ार जैसे अन्य फायदे हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी कि भारत पूरी तरह पिछड़ जाएगा, लेकिन अल्पकालिक चिंता वास्तविक है।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब भारत और बांग्लादेश के राजनीतिक संबंध पहले जैसे सहज नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि राजनीतिक विश्वास कमजोर हो, तो आर्थिक झटकों का प्रभाव और गहरा होता है।
भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापारिक परस्परता गहरी रही है। भारतीय यार्न और कपास बांग्लादेशी गारमेंट उद्योग की रीढ़ रहे हैं, लेकिन यदि व्यापारिक ढांचा अमेरिकी शर्तों की ओर झुकता है, तो द्विपक्षीय आर्थिक निर्भरता का संतुलन बदल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में राजनीतिक माहौल स्थिर होता है, तो दोनों देश वैकल्पिक तंत्र जैसे आपूर्ति श्रृंखला सहयोग, संयुक्त निवेश, या क्षेत्रीय व्यापार समझौते के जरिए गिरावट को संतुलित कर सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिदृश्य में इसे चुनौती के रूप में ही देखा जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस घटनाक्रम ने एक बार फिर द्विपक्षीय व्यापार समझौतों की सीमाएं उजागर की हैं। विश्व व्यापार संगठन के ढांचे में बहुपक्षीय वार्ता सभी देशों को एक मंच पर रखती है, जिससे ‘फूट डालो और शासन करो’ की रणनीति सीमित होती है, लेकिन जब बड़े देश अलग-अलग राष्ट्रों के साथ अलग-अलग समझौते करते हैं, तो प्रतिस्पर्धा असमान हो जाती है। विकासशील देश एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, और बड़े बाज़ार वाले देश बेहतर सौदे हासिल कर लेते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका की वर्तमान नीति इसी मॉडल पर आधारित है। वह देशों को प्रतिस्पर्धा में डालता है और अपने लिए अधिकतम लाभ सुनिश्चित करता है।
क्या चिंता बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही है?
कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि तत्काल प्रतिक्रिया भावनात्मक हो सकती है। भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के सामने पहले भी प्रतिस्पर्धी चुनौतियां रही हैं, चाहे वह वियतनाम हो, बांग्लादेश हो या चीन। भारत की ताकत केवल कपास या यार्न में नहीं, बल्कि विविध उत्पादन क्षमता, डिज़ाइन, ब्रांडिंग और घरेलू उपभोग में भी है। यदि भारत मूल्य-वर्धित उत्पादों, तकनीकी वस्त्रों और स्थायी (सस्टेनेबल) उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ता है, तो प्रतिस्पर्धा का संतुलन बदला जा सकता है।
लेकिन यह भी सच है कि कम मार्जिन वाले बेसिक गारमेंट सेगमेंट में बांग्लादेश की लागत संरचना पहले से ही प्रतिस्पर्धी रही है। अब यदि शून्य टैरिफ़ की सुविधा भी जुड़ जाती है, तो भारत के लिए चुनौती बढ़ेगी।
इस परिदृश्य में भारत के लिए कुछ स्पष्ट रणनीतिक विकल्प सामने आते हैं। पहला, अमेरिका के साथ पुनः वार्ता। भारत अपने समझौते की समीक्षा कर विशेष सेगमेंट में समान रियायतें मांग सकता है।
दूसरा, आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण। भारत और बांग्लादेश मिलकर क्षेत्रीय टेक्सटाइल हब बना सकते हैं, जहां कच्चा माल भारत से और अंतिम उत्पाद बांग्लादेश से निर्यात हो। तीसरा, मूल्य-वर्धन और ब्रांडिंग। भारत को केवल यार्न निर्यातक नहीं, बल्कि उच्च मूल्य वाले परिधान और टेक्निकल टेक्सटाइल निर्माता के रूप में उभरना होगा।
चौथा, घरेलू सुधार। लॉजिस्टिक्स लागत, श्रम सुधार और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं को सुदृढ़ करना आवश्यक होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत केवल प्रतिक्रिया की मुद्रा में रहेगा, तो नुकसान होगा, लेकिन यदि इसे अवसर में बदला जाए, तो दीर्घकाल में उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है। कुल मिलाकर, चेतावनी की घंटी या अवसर का संकेत? अमेरिका–बांग्लादेश रेसिप्रोकल टैरिफ़ समझौता केवल एक व्यापारिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार राजनीति का संकेतक है। यह बताता है कि संरक्षणवाद और द्विपक्षीय सौदेबाज़ी का युग तेज़ी से लौट रहा है। भारत के लिए यह एक चेतावनी है कि प्रतिस्पर्धा अब केवल उत्पादन लागत की नहीं, बल्कि कूटनीतिक सक्रियता और रणनीतिक समझदारी की भी है।
अल्पकाल में भारतीय टेक्सटाइल और कपास क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन दीर्घकाल इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इस चुनौती का सामना कैसे करता है।क्या वह क्षेत्रीय सहयोग और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बना पाता है, या केवल प्रतिक्रियात्मक राजनीति में उलझा रहता है। दक्षिण एशिया के दो बड़े परिधान निर्यातक देशों के बीच यह प्रतिस्पर्धा यदि समझदारी से प्रबंधित न की गई, तो इसका लाभ तीसरा पक्ष उठाएगा, लेकिन यदि इसे रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह उद्योग को अधिक सुदृढ़ और नवोन्मेषी बनाने का अवसर भी बन सकता है।





