वसंत पंचमी: जब प्रकृति, प्रेम और कला एक साथ गुनगुनाते हैं

Vasant Panchami: When nature, love and art hum together

सुनील कुमार महला

23 जनवरी 2026 को हम सभी वसंत पंचमी का पावन पर्व मनाने जा रहे हैं। इसे माघ मास की शुक्ल पंचमी, सरस्वती पूजन दिवस और विद्या-आराधना के पर्व के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और प्रकृति के नवजीवन का उत्सव भी है। वसंत पंचमी को माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसी कारण यह ज्ञान, कला, संगीत, सृजन और बुद्धि की उपासना का विशेष अवसर बन जाती है।

पुराणों के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तब उन्हें चारों ओर मौन और निस्तब्धता अनुभव हुई। उस नीरवता को तोड़ने के लिए उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक दिव्य देवी प्रकट हुईं, जिनके हाथों में वीणा थी। जैसे ही उन्होंने वीणा का मधुर नाद छेड़ा, संसार को वाणी, शब्द और अभिव्यक्ति का वरदान मिला। वह दिन माघ शुक्ल पंचमी का ही था, इसीलिए इसे देवी सरस्वती का जन्मदिन माना जाता है। यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रतीक है कि ज्ञान और वाणी के बिना सृष्टि भी अधूरी है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वसंत पंचमी अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। दक्षिण भारत में इसे ‘श्री पंचमी’ कहा जाता है, जहाँ ‘श्री’ शब्द देवी लक्ष्मी का प्रतीक है, जो समृद्धि और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं। इस प्रकार वसंत पंचमी ज्ञान और समृद्धि—दोनों शक्तियों के संगम का पर्व बन जाती है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की ‘सिग्नेचर ट्यून’ भी वसंत ही है। स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-‘ऋतुनां कुसुमाकरः’, अर्थात ऋतुओं में मैं वसंत हूँ। इसका अर्थ है कि वसंत वह काल है जब संपूर्ण सृष्टि स्वयं एक जीवंत संगीत बन जाती है।

वसंत पंचमी को ‘मदनोत्सव’ भी कहा जाता है। ‘मदन’ कामदेव का ही एक नाम है, इसलिए यह पर्व प्रेम, आकर्षण और सौंदर्य का उत्सव भी माना जाता है। इस समय प्रकृति में यौवन का संचार स्पष्ट दिखाई देता है। वृक्ष अपने पुराने पत्ते त्याग कर नई कोंपलों का स्वागत करते हैं। खेतों में लहलहाती सरसों किसानों की मुस्कान बन जाती है और पलाश (टेसू) के लाल फूल जंगलों में प्रेम की अग्नि-से दहकते प्रतीत होते हैं। कोयल की कूक, मधुमक्खियों की गूंज, भौंरों का गुंजार और तितलियों की उड़ान-सब मिलकर वातावरण में एक अनोखा नशा घोल देते हैं।

यह दिन बुद्धि और कला के अद्भुत संगम का प्रतीक है। माँ सरस्वती का जन्म केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि ज्ञान की शक्ति का उत्सव है। लेखकों की कलम, गायकों के सुर, चित्रकारों के रंग और विचारकों के दृष्टिकोण को नई ऊर्जा देने के लिए वसंत पंचमी से श्रेष्ठ कोई मुहूर्त नहीं माना जाता। इसी कारण इस दिन ‘अक्षर अभ्यासम’ की परंपरा है। विद्या और कला से जुड़े लोग अपनी पुस्तकों, कलम और वाद्य यंत्रों की पूजा करते हैं। बंगाल और दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर लिखना इसी दिन सिखाया जाता है, जिसे ‘विद्यारंभ संस्कार’ कहा जाता है।

वसंत पंचमी में पीले रंग का विशेष महत्व है। पीला रंग केवल सूर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से उत्साह, आशा और ऊर्जा बढ़ाने वाला माना जाता है। इस समय सरसों की पीली फसलें धरती के श्रृंगार का दृश्य रचती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, वसंत ऋतु में शरीर में कफ की अधिकता होती है और पीले रंग से जुड़े तत्व—जैसे हल्दी और केसर—शरीर में ऊष्मा और स्फूर्ति बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसी कारण पीत वस्त्र, पीले पकवान और पीले पुष्प इस पर्व का अभिन्न अंग हैं।

स्वास्थ्य और योग की दृष्टि से भी वसंत पंचमी एक ‘नेचुरल हीलिंग’ का समय है। वसंत ऋतु की स्वच्छ और सुगंधित हवा रक्त संचार को संतुलित करने में सहायक होती है। ध्यान, प्राणायाम और योग का आरंभ करने के लिए यह मौसम अत्यंत अनुकूल माना जाता है। इस ऋतु की ताजगी मन को एकाग्र करने में सहज और प्राकृतिक सहायता प्रदान करती है। सच कहा जाए तो वसंत पंचमी हमें यह सिखाती है कि जीवन में ज्ञान (सरस्वती) और प्रेम (कामदेव) का संतुलन ही वास्तविक आनंद का स्रोत है।

‘चरक संहिता’ के अनुसार, वसंत ऋतु में प्रकृति और मनुष्य-दोनों के भीतर नया उत्साह और यौवन उमड़ पड़ता है। यह पर्व केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं, बल्कि ब्रज की गलियों में राधा-कृष्ण के दिव्य रास का भी प्रतीक है। मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन श्रीकृष्ण ने पीत वस्त्र धारण किए थे, तभी से पीला रंग शुभता, उल्लास और ज्ञान का प्रतीक माना जाने लगा। इसी दिन माता पार्वती ने भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव को भेजा था, जिससे अंततः शिव-पार्वती विवाह और भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथा जुड़ी हुई है।

वास्तव में वसंत पंचमी का संबंध हिंदू धर्म की तीनों देवियों-‘सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती’ से माना जाता है। यह ज्ञान, समृद्धि और सृजनशीलता—इन तीनों शक्तियों की आराधना का पर्व है। यह देवी सरस्वती और सरस्वती नदी से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक और वैदिक मान्यताओं के अनुसार, सरस्वती नदी उत्तर-पश्चिमी भारत में बहने वाली एक प्राचीन नदी थी, जो कालांतर में लुप्त हो गई। वसंत ऋतु में हिमालयी हिमनदों के पिघलने से इस नदी में जल प्रवाह बढ़ जाता था और उसके तटों पर दूर-दूर तक सरसों के पीले फूल खिल उठते थे।

कहा जाता है कि महर्षि वेदव्यास और अनेक ऋषियों के आश्रम सरस्वती नदी के तट पर स्थित थे। यहीं वेदों, उपनिषदों और अन्य महान ग्रंथों की रचना एवं संकलन हुआ। इस कारण सरस्वती नदी ज्ञान और बुद्धि की देवी सरस्वती का पर्याय बन गई। वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती का श्रृंगार पीताम्बरी वस्त्रों से किया जाता है और कई परंपराओं में इसी दिन से बच्चों की औपचारिक शिक्षा का आरंभ किया जाता है। प्राचीन काल में वसंत पंचमी से ही महीने भर चलने वाले वसंतोत्सव की शुरुआत होती थी, जिसका समापन होली के रंगोत्सव पर होता था।

वसंत पंचमी से जुड़ी पौराणिक कथाओं में कामदेव और शिव की कथा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि इसी दिन कामदेव कैलाश पर्वत पर गए और भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए एक मायावी इंद्रधनुष रचा। अंततः शिव की समाधि तो भंग हुई, लेकिन क्रोध में उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में पार्वती से विवाह और कार्तिकेय के जन्म के माध्यम से तारकासुर का अंत हुआ।

भारत के विभिन्न प्रांतों में वसंत पंचमी के लोक-रंग भी अत्यंत मनोहारी हैं। पंजाब में यह पर्व पतंग उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं, पीले चावल बनाते हैं और सिख पुरुष पीली पगड़ियाँ पहनते हैं। महाराष्ट्र में विवाह के बाद पहली वसंत पंचमी पर दंपति पीले वस्त्र पहनकर मंदिर दर्शन करते हैं। राजस्थान में लोग चमेली के फूलों की मालाएँ धारण करते हैं। बिहार में इस दिन सूर्य देव की प्राचीन मूर्ति को स्नान कराकर सजाया जाता है और भव्य उत्सव मनाया जाता है।

यह पर्व मुस्लिम सूफी परंपरा में भी विशेष स्थान रखता है। मध्यकाल में सूफी संत हजरत अमीर खुसरो ने हिंदू संस्कृति से प्रेरित होकर सूफी दरगाहों पर वसंत मनाने की परंपरा शुरू की। आज भी दिल्ली की निजामुद्दीन औलिया दरगाह पर ‘सूफी बसंत’ मनाया जाता है, जहाँ कव्वाल पीले वस्त्र पहनकर बसंती कलाम गाते हैं।

ज्योतिष शास्त्र में वसंत पंचमी को ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है, अर्थात इस दिन किसी भी शुभ कार्य—विवाह, गृह प्रवेश, नये व्यापार के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। पूरा दिन ही शुभ और दोषमुक्त माना जाता है। वसंत ऋतु भारतीय पंचांग का वह ‘गोल्डन पीरियड’ है, जिसमें होली की मस्ती से लेकर रामनवमी की भक्ति तक की यात्रा पूरी होती है।

अंततः वसंत पंचमी हमें यह सिखाती है कि भयमुक्त होकर खिलना ही वसंत का सार है। यह वह समय है जब मन के भय, विकार और जड़ता स्वतः दूर होने लगते हैं। गाते हुए पक्षी, खिलखिलाते फूल और मुस्कुराती प्रकृति हमें जीवन में उमंग, प्रेम और सृजन का संदेश देती है। किसानों के लिए यह संकेत है कि रबी की फसल अब पकने को है, इसलिए यह एक कृषि उत्सव का भी प्रारंभिक प्रतीक है। निष्कर्षतः, वसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान, प्रेम और सृजन का दिव्य संगम है, जो हमें यह प्रेरणा देता है कि सीखना कभी न रुके और मन सदा वसंत-सा खिलता रहे।