वेनेजुएला संकट के बहाने वैश्विक शक्ति-संतुलन

Venezuela crisis: global power imbalance

डॉ. सत्यवान सौरभ

हाल ही में वेनेजुएला में घटित राजनीतिक घटनाक्रम और उसमें अमेरिकी हस्तक्षेप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक पुरानी बहस को फिर से जीवित कर दिया है। अनेक विश्लेषक इसे उन्नीसवीं सदी के मुनरो सिद्धांत की संभावित वापसी के रूप में देख रहे हैं। मुनरो सिद्धांत मूलतः यह घोषित करता था कि पश्चिमी गोलार्द्ध में किसी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा और इस क्षेत्र को अमेरिका अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखेगा। समय के साथ यह सिद्धांत उपनिवेशवाद-विरोधी आदर्श से हटकर अमेरिकी प्रभुत्व और हस्तक्षेपवादी नीति का औजार बन गया। आज, जब विश्व बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है, तब वेनेजुएला जैसे देशों में अमेरिकी दखल यह संकेत देता है कि शक्ति-राजनीति के पुराने सिद्धांत नए संदर्भों में फिर उभर रहे हैं।

वेनेजुएला लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रहा है। अमेरिका ने लोकतंत्र, मानवाधिकार और आर्थिक कुप्रबंधन के नाम पर वहां प्रतिबंधों और राजनीतिक हस्तक्षेप को उचित ठहराया है। किंतु आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे असली कारण वेनेजुएला के विशाल तेल संसाधन और लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखने की रणनीति है। यह वही सोच है जो ऐतिहासिक रूप से मुनरो सिद्धांत के अंतर्गत विकसित हुई थी, जहाँ अमेरिका स्वयं को पूरे क्षेत्र का संरक्षक मानता रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में ब्रिक्स देशों की प्रतिक्रियाएँ विशेष ध्यान आकर्षित करती हैं। चीन और रूस ने अमेरिकी हस्तक्षेप का खुलकर विरोध किया और इसे संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया। उनके वक्तव्यों में न केवल वेनेजुएला के समर्थन का स्वर था, बल्कि अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व को चुनौती देने की व्यापक रणनीति भी निहित थी। इसके विपरीत, भारत का वक्तव्य अपेक्षाकृत संतुलित, संयमित और कूटनीतिक रहा। भारत ने न तो अमेरिका की नीति का समर्थन किया और न ही तीखा विरोध। यह अंतर भारत की विदेश नीति की विशिष्टता और उसकी रणनीतिक सोच को दर्शाता है।

भारत के इस संतुलित रुख के पीछे सबसे प्रमुख कारण उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति है। स्वतंत्रता के बाद से ही भारत ने किसी एक शक्ति गुट में शामिल होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की परंपरा अपनाई है। शीत युद्ध काल में गुटनिरपेक्ष आंदोलन इसका उदाहरण था, और आज के बहुध्रुवीय विश्व में यह नीति और भी प्रासंगिक हो गई है। अमेरिका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, विशेषकर रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में। ऐसे में वेनेजुएला जैसे मुद्दे पर तीखा विरोध भारत-अमेरिका संबंधों को अनावश्यक रूप से प्रभावित कर सकता था।

साथ ही, भारत रूस और अन्य ब्रिक्स देशों के साथ भी अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखना चाहता है। इस दोहरे संतुलन के लिए भारत को शब्दों और रुख में अत्यंत सावधानी बरतनी पड़ती है। भारत की कूटनीति टकराव से अधिक संवाद पर विश्वास करती है और यही कारण है कि वह विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अक्सर संतुलित भाषा का प्रयोग करता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कारण भारत की स्वयं की संवेदनशीलताएँ हैं। भारत लंबे समय से संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत का समर्थन करता रहा है, क्योंकि वह स्वयं कश्मीर और अन्य आंतरिक मुद्दों पर बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है। यदि भारत वेनेजुएला के मामले में किसी एक पक्ष के समर्थन में अत्यधिक मुखर होता, तो भविष्य में उसके अपने मामलों पर भी प्रश्न उठाए जा सकते थे। इसलिए भारत ने सिद्धांतों का समर्थन करते हुए भी व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा।

भारत का संतुलित वक्तव्य यह भी दर्शाता है कि वह स्वयं को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। भारत का उद्देश्य केवल प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देना है। यही कारण है कि भारत अक्सर शांतिपूर्ण समाधान, बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर देता है। यह रुख उसे वैश्विक दक्षिण के देशों में एक भरोसेमंद और संतुलित नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करता है।

बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत के लिए लैटिन अमेरिका का महत्व लगातार बढ़ रहा है। अब तक यह क्षेत्र भारत की विदेश नीति में अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा है, किंतु वर्तमान वैश्विक परिस्थितियाँ इस सोच में बदलाव की माँग करती हैं। लैटिन अमेरिका ऊर्जा संसाधनों, विशेषकर तेल और गैस, के साथ-साथ लिथियम, तांबा और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों का भी बड़ा स्रोत है। हरित ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के युग में ये संसाधन भारत की आर्थिक और तकनीकी आकांक्षाओं के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

इसके अतिरिक्त, लैटिन अमेरिका कृषि उत्पादों, फार्मास्यूटिकल्स और उभरते बाजारों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। भारत की दवा उद्योग और आईटी सेवाएँ इस क्षेत्र में व्यापक संभावनाएँ रखती हैं। यदि भारत अपनी कूटनीतिक और आर्थिक उपस्थिति को सशक्त करता है, तो वह चीन की बढ़ती पकड़ को संतुलित कर सकता है, जिसने हाल के वर्षों में लैटिन अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश और अवसंरचना परियोजनाएँ शुरू की हैं।

राजनीतिक दृष्टि से भी लैटिन अमेरिका भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भारत को स्थायी सुरक्षा परिषद सदस्यता जैसी आकांक्षाओं के लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता है। लैटिन अमेरिकी देशों का समर्थन इस दिशा में निर्णायक हो सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि भारत केवल संकट के समय प्रतिक्रिया देने के बजाय दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करे।

भारत को अपनी लैटिन अमेरिका नीति में बदलाव करते हुए अधिक सक्रिय, बहुआयामी और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। इसमें नियमित उच्चस्तरीय कूटनीतिक संवाद, व्यापार और निवेश समझौते, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विकास सहयोग शामिल होना चाहिए। साथ ही, भारत को यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह किसी भी क्षेत्र में प्रभाव क्षेत्रों की राजनीति का समर्थन नहीं करता, बल्कि संप्रभुता, समानता और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों पर आधारित संबंधों का पक्षधर है।

अंततः, वेनेजुएला संकट और मुनरो सिद्धांत की संभावित वापसी केवल एक क्षेत्रीय घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलावों का प्रतीक है। भारत का संतुलित रुख इस बात का संकेत है कि वह न तो अंधानुकरण करना चाहता है और न ही अनावश्यक टकराव। यह रुख उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक सोच, वैश्विक दक्षिण के प्रति प्रतिबद्धता और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थन को दर्शाता है। आने वाले समय में यदि भारत लैटिन अमेरिका के प्रति अधिक सक्रिय और दूरदर्शी नीति अपनाता है, तो वह न केवल अपने राष्ट्रीय हितों को सुदृढ़ करेगा, बल्कि एक अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में भी योगदान दे सकेगा।