उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने पूज्य मोरारी बापू की राम कथा के उद्घाटन दिवस में भाग लिया

Vice President Shri C.P. Radhakrishnan attended the inaugural day of Pujya Morari Bapu's Ram Katha

  • उपराष्ट्रपति ने राम कथा परंपरा में मोरारी बापू के वैश्विक योगदान की सराहना की
  • राम कथा धर्म और करुणा के शाश्वत मूल्यों का संचार करती है: उपराष्ट्रपति

प्रमोद शर्मा

नई दिल्ली : भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित पूज्य मोरारी बापू की नौ दिवसीय राम कथा के उद्घाटन दिवस में सहभागिता की। इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि राम कथा नैतिकता, करुणा, बंधुत्व और मानवता जैसे शाश्वत मूल्यों के प्रसार का एक सजीव और प्रभावशाली माध्यम है, जो भारत की सभ्यतागत परंपराओं में गहराई से निहित है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राम कथा केवल एक पवित्र महाकाव्य का कथन मात्र नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत दर्शन है, जो व्यक्ति को गरिमा, अनुशासन, भक्ति और करुणा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। प्रभु श्रीराम के जीवन और आदर्शों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये आदर्श धर्म के लिए मार्गदर्शक प्रकाश हैं, जिसे उन्होंने जीवन जीने की न्यायोचित और सदाचारपूर्ण पद्धति बताया।

पूज्य मोरारी बापू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने दशकों से भारत और विश्वभर में राम कथा की पवित्र परंपरा का प्रचार-प्रसार किया है, जिससे मानव चेतना का जागरण हुआ है और प्रेम, सेवा तथा धर्म जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को सुदृढ़ किया गया है। उन्होंने यह जानकर गहरी प्रशंसा व्यक्त की कि वर्तमान कथा पूज्य मोरारी बापू की 971वीं राम कथा है।

उपराष्ट्रपति ने 25 नवंबर 2025 को अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में आयोजित ऐतिहासिक ध्वजारोहण समारोह का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अवसर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, धैर्य और सदियों पुरानी भक्ति की पुनः पुष्टि का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि चुनौतियाँ चाहे कितनी भी आएँ, धर्म का कभी विनाश नहीं हो सकता और अंततः सत्य एवं धर्म की ही विजय होती है। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान श्रीराम केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में निवास करते हैं।

रामायण परंपरा की सार्वभौमिकता पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन और उनके आदर्श विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में अभिव्यक्त होते हैं—चाहे वह वाल्मीकि की संस्कृत रामायण हो, तुलसीदास की रामचरितमानस हो या तमिल में कंबन की रामायणम् तथा भारत और विश्व के अन्य अनेक रूपांतर। उन्होंने कहा कि भले ही भाषाएँ भिन्न हों, परंतु धर्म का सार एक ही है, जो विविध परंपराओं को साझा मूल्यों के माध्यम से एकजुट करता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के प्राचीन ग्रंथ विश्व शांति, सहअस्तित्व, सामंजस्य और संतुलन पर विशेष बल देते हैं, जिन्हें उन्होंने शाश्वत और सार्वभौमिक सिद्धांत बताया। उन्होंने रामचरितमानस, भगवद्गीता, आदि पुराण और जैन आगम जैसे ग्रंथों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान के स्रोत हैं, जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

श्रद्धालुओं से आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि वे इन नौ दिनों की राम कथा को केवल श्रोता बनकर नहीं, बल्कि साधक के रूप में ग्रहण करें। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भगवान श्रीराम के आदर्शों का एक छोटा सा अंश भी अपने दैनिक जीवन में आत्मसात कर ले, तो वह सच्चे आध्यात्मिक परिवर्तन की ओर अग्रसर हो सकता है।

उपराष्ट्रपति ने आयोजन से जुड़े आयोजकों, स्वयंसेवकों और सभी सहयोगियों की सराहना की और कहा कि इस प्रकार के आध्यात्मिक आयोजन न केवल व्यक्तिगत आस्था को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक निरंतरता को भी मजबूती प्रदान करते हैं।

अपने संबोधन के समापन में उपराष्ट्रपति ने आशा व्यक्त की कि राम कथा सभी के हृदयों को शांति, मन को स्पष्टता और जीवन को उद्देश्य से परिपूर्ण करेगी। उन्होंने पूज्य मोरारी बापू को अपनी श्रद्धापूर्ण प्रणाम अर्पित की और सभी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध राम कथा के लिए शुभकामनाएँ दीं।

इस अवसर पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद, अहिंसा विश्व भारती एवं वर्ल्ड पीस सेंटर के संस्थापक आचार्य लोकेश तथा अन्य गणमान्य अतिथि भी उपस्थित थे।