इलाज से वंचित गाँव, सुविधाओं से भरा शहर

Villages deprived of treatment, cities full of facilities

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

भोर की हवा जब गाँव की सूनी गलियों में बहती है, तो वह केवल मिट्टी की गंध नहीं लाती, बल्कि अधूरी साँसों, टूटी उम्मीदों और अनकहे दर्द की कहानियाँ भी साथ लाती है। यहाँ सूरज हर रोज़ उगता है, पर स्वास्थ्य की रोशनी कभी नहीं पहुँचती। यहाँ जीवन जन्म लेते ही संघर्ष सीख लेता है, और बीमारी आते ही हार मान लेता है। किसी माँ की गोद में तड़पता बच्चा, किसी बुज़ुर्ग की काँपती देह, किसी युवा की बुझती आँखें—सब एक ही सवाल पूछते हैं, “क्या हमारा जीवन इतना सस्ता है?” इस गाँव में डॉक्टर नहीं हैं, दवाइयाँ नहीं हैं, इलाज नहीं है, लेकिन सत्ता के पास सुविधाओं का अंबार है। यह केवल अभाव की कहानी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित उपेक्षा का दस्तावेज़ है।

यहाँ बीमार पड़ना किसी अपराध से कम नहीं माना जाता। क्योंकि बीमार होने का मतलब है, कर्ज़ लेना, ज़मीन गिरवी रखना, या चुपचाप मर जाना। जब रात में किसी को तेज़ बुखार चढ़ता है, तो पूरा परिवार डर के साए में बैठ जाता है। मोबाइल नेटवर्क नहीं, एंबुलेंस नहीं, सड़कें टूटी हुई—और अस्पताल कई कोस दूर। गर्भवती महिला की प्रसव पीड़ा यहाँ जीवन की परीक्षा बन जाती है। कई बार बच्चे रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं, और कई बार माँ लौटकर नहीं आती। यह मौत प्राकृतिक नहीं होती, यह व्यवस्था की हत्या होती है। फिर भी इन मौतों का कोई रिकॉर्ड नहीं बनता, कोई आँकड़ा नहीं बढ़ता, कोई मंत्री बयान नहीं देता। वे चुपचाप मिट्टी में मिल जाती हैं, जैसे कभी थीं ही नहीं।

गाँव का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बाहर से देखने में सरकारी उपलब्धि लगता है। नीली दीवारें, टूटा बोर्ड, जंग लगा ताला और भीतर सन्नाटा। यह इमारत इलाज का नहीं, धोखे का प्रतीक बन चुकी है। यहाँ कभी डॉक्टर नहीं आते, नर्सें महीनों गायब रहती हैं, और दवाइयाँ कागज़ों में दर्ज रहती हैं। मरीजों के लिए यह भवन केवल छाया देने वाला खंडहर है। कभी कोई निरीक्षण होता भी है, तो पहले से सूचना देकर। उस दिन ताले खुलते हैं, फाइलें सजती हैं, और झूठ सच बनकर प्रस्तुत होता है। निरीक्षक चले जाते हैं, और फिर वही वीरानी लौट आती है। यह स्वास्थ्य केंद्र नहीं, बल्कि सरकारी संवेदनहीनता का स्मारक है।

इसके ठीक विपरीत, गाँव की राजनीति विलासिता में डूबी रहती है। नेता जब आते हैं, तो धूल उड़ाती गाड़ियों का काफिला साथ लाते हैं। दस गाड़ियाँ, दर्जनों समर्थक, महँगे कपड़े और बनावटी मुस्कान। मंच से वे कहते हैं—“स्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता है।” नीचे बैठा बीमार किसान जानता है कि यह झूठ है। क्योंकि उसके बेटे की दवा के लिए पैसे नहीं थे, और नेता के पास नई कार के लिए थे। नेता के परिवार का इलाज बड़े शहरों के आलीशान अस्पतालों में होता है, विदेशों में होता है, लेकिन गाँव के लिए सिर्फ वादे होते हैं। सत्ता और जनता के बीच की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि अब आवाज़ भी वहाँ तक नहीं पहुँचती।

सरकारी योजनाएँ यहाँ एक मज़ाक बन चुकी हैं। कागज़ों में सब कुछ है—मुफ्त इलाज, मोबाइल क्लिनिक, मातृत्व सहायता, पोषण अभियान। लेकिन ज़मीनी हकीकत में कुछ भी नहीं। बजट आता है, फाइलें घूमती हैं, टेंडर निकलते हैं, और पैसा रास्ते में ही गायब हो जाता है। कहीं भ्रष्टाचार निगल जाता है, कहीं लापरवाही मार देती है। जो कर्मचारी ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, वे अकेले पड़ जाते हैं। उन्हें ट्रांसफर का डर दिखाया जाता है, दबाव में लाया जाता है, और अंततः खामोश कर दिया जाता है। सिस्टम ईमानदारी को दंड देता है, और बेईमानी को पुरस्कार।

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार आम ग्रामीण बनता है। वह न मीडिया में है, न संसद में, न अदालत में। उसकी पीड़ा केवल उसके घर की चार दीवारों तक सीमित रहती है। वह इलाज के लिए अपनी भैंस बेच देता है, खेत गिरवी रख देता है, बेटी की पढ़ाई छुड़ा देता है। फिर भी कई बार इलाज नहीं मिल पाता। तब वह खुद को दोष देता है, किस्मत को कोसता है, भगवान से सवाल करता है। उसे कभी यह एहसास नहीं कराया जाता कि यह उसकी नहीं, व्यवस्था की विफलता है। उसे नागरिक नहीं, केवल सहनशील प्राणी बना दिया गया है।

फिर भी, इस अँधेरे में कुछ दीपक अब भी जल रहे हैं। कोई युवा मोबाइल से वीडियो बनाकर सच्चाई दिखाता है, कोई सामाजिक कार्यकर्ता गाँव-गाँव जाकर जागरूकता फैलाता है, कोई माँ अपनी खोई संतान को आवाज़ बना देती है। ये लोग बताते हैं कि बदलाव अभी संभव है। लेकिन बदलाव तब आएगा, जब ग्रामीण खुद को कमजोर नहीं, जागरूक समझेगा। जब वह नेता से जाति नहीं, इलाज माँगेगा। जब वह शराब और राशन से ऊपर अस्पताल को रखेगा। जब वह वोट को केवल सौदा नहीं, हथियार बनाएगा।

असल में, गाँव से डॉक्टर का गायब होना सिर्फ इलाज की कमी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का पतन है। यह चीख-चीखकर बताता है कि विकास की रोशनी केवल महानगरों तक सीमित है, सुविधाएँ सिर्फ रसूखदारों की बपौती हैं, और आम आदमी का जीवन सत्ता की सूची में सबसे नीचे दर्ज है। जब तक यह अमानवीय सोच नहीं बदलेगी, तब तक नेताओं के गैराज में गाड़ियों की संख्या बढ़ती रहेगी और गाँव के अस्पतालों में सन्नाटा पसरा रहेगा। जब तक सत्ता को जनता के सामने झुकाकर जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक निर्दोष लोगों की साँसें यूँ ही बिना शोर, बिना खबर, बिना इंसाफ के बुझती रहेंगी।

एक स्वस्थ देश की पहचान उसकी इमारतों से नहीं, उसके नागरिकों की सेहत से होती है। अगर गाँव बीमार हैं, तो देश भी बीमार है। अगर ग्रामीण असहाय हैं, तो लोकतंत्र भी कमजोर है। आज ज़रूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य को दया नहीं, अधिकार बनाया जाए। डॉक्टर को बोनस नहीं, जिम्मेदारी दी जाए। नेता को सम्मान नहीं, जवाबदेही सौंपी जाए। तभी वह दिन आएगा, जब गाँव की गलियों में कराह नहीं, हँसी गूँजेगी। जब बीमार बच्चा इलाज पाएगा, और माँ निश्चिंत होकर सो पाएगी। और तब सच में कहा जा सकेगा—यह देश आगे बढ़ रहा है, सिर्फ दिखावे में नहीं, इंसानियत में भी।