नरेंद्र तिवारी
इस वक़्त मानव समाज की प्रमुख चिंता, शांति की स्थापना के प्रयास होना चाहिए। युद्ध का अंतिम परिणाम विनाश और सिर्फ विनाश है। यह मानव जाति के अस्तित्व के लिए भी खतरा है। मानव जाति का कल्याण शांति में ही सम्भव है। निर्माण के रथ को दौड़ने के लिए शांति के पथ की आवश्यकता होती है। युद्ध निर्माण के रथो के मार्ग को अवरुद्ध करता है। यह कोरी कल्पना नहीं है, जमीनी हकीकत है। भारत के प्रख्यात कवि गोपालदास नीरज युद्ध से जुडी प्रसिद्ध कविता की अंतिम पंक्तियों में लिखते है –
‘बढ़ चुका बहुत अब आगे रथ निर्माणों का,
‘बम्बो के दलबल से अवरुद्ध नही होगा,
मानव जाति वर्तमान में विकास के जिस सोपान पर आज ख़डी है। वहाँ युद्ध का विचार कितना असभ्य और बर्बरता लिए हुए है। प्रगति पथ पर बढ़ती दुनियाँ को युद्ध की विभीषिका में झोकने की सनक बेहद विनाशकारी और अमानवीय है।
इजरायल-अमेरिका, ईरान युद्ध जारी है। रूस-युक्रेन युद्ध तीन बरसों से चल रहा है। युद्ध महायुद्ध की शक्ल इख़्तियार करें, इससे पहले इसे रोकना होगा। जिस गति से दुनियाँ के देश आपस में लड़ रहे है। युद्ध का क्षेत्र बढ़ता जा रहा है, समय के साथ इसके और बढ़ने की संभावना है। हर दिन एक नया देश इस युद्ध की चपेट में आ रहा है। युद्ध के प्रभाव ने सारी दुनियाँ को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। जब दुनियाँ की महाशक्ति कहलाने वाले राष्ट्र युद्ध की विनाशकारी सोच के पक्षधर दिखाई दे रहे हो, दुनियाँ के शांति पसंद देशों ने ख़ामोशी इख़्तियार कर रखी हो, तब इस युद्ध के महायुद्ध में बदल जाने की पूरी सम्भवना है।
महायुद्ध का अर्थ होगा महाविनाश। घातक हथियारों के प्रयोग से दुनियाँ में तबाही मच जाएगी। यह हालात अल्बर्ट आइंस्टिन के कथनो को सच साबित करते है, उनके अनुसार – तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा यह पता नहीं, लेकिन चौथा विश्व युद्ध लाठी और पत्थरों से लड़ा जाएगा। अल्बर्ट आइंस्टिन के जहन में आया यह विचार दूसरे महायुद्ध से उपजी विभीषिका को देखने के बाद ही आया होगा। तीसरा महायुद्ध 1939 से शुरू होकर 1945 तक चला जिसमे 8 करोड़ के लगभग जाने गयी।
मानव इतिहास के घातक संघर्षों में शुमार जिसमे न केवल सैनिक बल्कि आम नागरिक भी मारे गए। इस महायुद्ध का सबसे अधिक नुकसान सोवियत संघ को हुआ जहां 2.4 से 2.7 करोड़ लोग मारे गए। कुलमिलाकर 50 मिलियन नागरिक हताहत हुए।
यूरोप और जापान के प्रमुख शहर खंडहर बन गए थै। वारसा, पोलैंड का अधिकांश हिस्सा नष्ट कर दिया गया। जर्मनी के 49 सबसे बड़े शहरों में 40 प्रतिशत घर नष्ट हो गए थै। इस दूसरे महायुद्ध में जापान के शहर हीरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिकी परमाणु बम के हमले में 2 लाख से अधिक आमजन मारे गए थै।
दूसरा महायुद्ध मानव जाति के लिए विनाश और बर्बादी का कारण बना था। जिसमे मानव जाति का भारी नुकसान हुआ था। जन, धन और मानव निर्मित विकास को बहुत नुकसान पहुंचा। दूसरे महायुद्ध के प्रकाश में तीसरे महायुद्ध की परिकल्पना से मन सिंहर उठता है। अब सवाल उठता है, कौन है जो दुनियाँ को महायुद्ध की और धकेल रहा है? प्रश्न यह भी है की इस अवस्था में कौन है जो दुनियाँ में शांति स्थापना के प्रयास करेगा? इन दोनों प्रश्नों के जवाब वर्तमान के हालातों से ढूढ़ना होंगे। युद्ध महाशक्तियों के अंहकार से जन्मी हिंसा है। जिसके पीछे दुनियाँ के संसाधनों पर एकाधिकार की भावना कार्य करती है। रूस और अमेरिका इसी अंहकार से पीड़ित है। पुतिन ने रूस-युक्रेन युद्ध का आरम्भ किया तो ट्रम्प की सनक ने इजरायल ईरान के युद्ध की इबारत को लिखा जिसकी गिरफ्त में तेजी से दुनियाँ के दूसरे देश आ रहे है, युद्ध पूरी दुनियाँ को प्रभावित कर रहा है।
अब जबकि 20 से अधिक दिन हो गए है युद्ध बढ़ता जा रहा है। इस बिच सयुंक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों पक्षो से शत्रुता को तत्काल समाप्त करने और संयम बरतने का आह्वान किया। इस प्रकार के प्रयासों में और तेजी लाना अनिवार्य है।
इस विषय में युद्धरत देशों की जनता की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अधिकांश युद्ध शासक की सनक का नतीजा होते है, जनता की युद्ध के निर्णय में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती है। सभ्य और शिक्षित और आधुनिक विश्व में आमजनता युद्ध की पक्षधर नहीं है। किंतु जनता की खामोशी को शासक वर्ग सहमति समझने की भूल करते है। अतएव युद्ध विराम के लिए युद्धरत देशों की जनता को प्रभावी भूमिका निभाने की आवश्यकता है। इस संबंध में अमेरिकी जनता को ट्रम्प की युद्धनीति का विरोध करना चाहिए। शांति में प्रमुख भूमिका भारत भी निभा सकता है। भारत का विचार ही सदैव विश्व शांति का रहा है। विश्व का कल्याण हो की आदर्श भावना या सर्वें भवन्तु सुखिनम सर्वे संतु निरामया की प्रार्थना और वसूदैव कुटुंमकम की सनातनी भावना पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानने का आदर्श भाव जो वैदो और उपनिषधो की भावना से प्रेरित है। याने भारत विश्व शांति की स्थापना में अपनी महती भूमिका निभा सकता है। दुनियाँ के लोग भारत की तरफ शांति स्थापना के प्रयासों की आस लगाए बैठे है। भारत की जनता भी चाहती है की विश्व में शांति बनी रहे। युद्ध महायुद्ध की शक्ल इख़्तियार न कर पाए। शांति स्थापना के प्रयास दुनियाँ में भारत के महत्व को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। भारत की विश्व बंधुता वाली सोच दुनियाँ के नागरिकों को आकर्षित करेगी।
अब जबकि दुनियाँ के सामने महायुद्ध का संकट मुंह बाए खड़ा है। भारत को किसी एक पक्ष की तरफ खड़ा होने की बजाए निर्भीकता से युद्ध विराम की बात कहनी होंगी। शांति के सार्थक प्रयासों में जो देश वर्तमान परिस्थितियों में अपनी सार्थक भूमिका निभाएगा विश्व पटल पर उस देश का न सिर्फ सम्मान बढ़ेगा, उस देश को वैश्विक नैतृत्व का सुनहरा अवसर भी मिलेगा। भारत अपने विचार और नीति से शांति पसंद रहा है। विश्व को एक देश समझने की हमारी भावना भी रही है। भारत के पास दुनियाँ में अपनी उपयोगिता साबित करते हुए शांति पसंद मुल्को के नैतृत्व करने का सुनहरा अवसर है। दुनियाँ के अधिकांश देश और वहां की जनता शांति पसंद है। शांति के प्रयासों को व्यापक सराहना मिलेगी।





