बिशन पपोला
भारत के पांच राज्यों—पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही देश की राजनीति एक नए चुनावी दौर में प्रवेश कर चुकी है। गत दिनों मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में चुनाव कार्यक्रम का ऐलान करते हुए बताया कि पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा, जबकि सभी राज्यों के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे।
इन चुनावों में सबसे अधिक राजनीतिक रूप से चर्चित और राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने वाला मुकाबला पश्चिम बंगाल का है। यहां का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बनाए रखने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसे, राजनीतिक ध्रुवीकरण और प्रशासनिक पारदर्शिता की भी परीक्षा बन गया है। चौथी बार सत्ता की तलाश में ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले डेढ़ दशक से मुख्यतः ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2011 में वाम मोर्चे के 34 वर्ष लंबे शासन का अंत कर सत्ता में आई ममता बनर्जी ने 2016 और 2021 के चुनावों में भी जीत दर्ज की। यदि, इस बार भी उनकी पार्टी सत्ता में लौटती है, तो वे लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाली पहली नेता बन जाएंगी। यह उपलब्धि उन्हें देश के राजनीतिक इतिहास में सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली महिला नेताओं की श्रेणी में स्थापित कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता, जमीनी संगठन और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े राजनीतिक विमर्श में निहित है। राज्य में ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘कन्याश्री’ और ‘रूपश्री’ जैसी योजनाओं ने बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं को प्रभावित किया है, हालांकि दूसरी ओर उनके सामने भ्रष्टाचार के आरोपों, प्रशासनिक आलोचनाओं और विपक्ष के तीखे हमलों जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं।
पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीतकर राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। उस चुनाव में भाजपा ने किसी मुख्यमंत्री चेहरे को सामने नहीं रखा था और चुनाव अभियान मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था।
विशेषज्ञों के अनुसार भाजपा इस बार भी उसी रणनीति को दोहरा सकती है, यानी राष्ट्रीय नेतृत्व और संगठनात्मक शक्ति के आधार पर चुनाव लड़ना। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने कई राज्यों में इसी मॉडल को अपनाया है, जहां चुनाव जीतने के बाद अपेक्षाकृत नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा का चुनावी अभियान मुख्यतः भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दों पर केंद्रित रहने की संभावना है। राज्य की राजनीति में इस समय सबसे अधिक चर्चा जिन मुद्दों की है, उनमें कथित ‘शिक्षक भर्ती घोटाला’ और कोयला तस्करी से जुड़े मामले शामिल हैं।
भाजपा इन मामलों को लगातार चुनावी मुद्दा बना रही है और तृणमूल सरकार पर संस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगा रही है। तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताती रही है। पार्टी का कहना है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी सरकारों को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार भ्रष्टाचार के आरोप पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बने रहेंगे, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि ये आरोप मतदाताओं के अंतिम निर्णय को किस हद तक प्रभावित करेंगे, हालांकि इस चुनाव में सबसे बड़ा और अप्रत्याशित विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा कराई गई इस प्रक्रिया में राज्य की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए हैं। अंतिम सूची से लगभग 63 लाख 66 हजार मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं,
जबकि लगभग 60 लाख मतदाता अभी भी जांच के दायरे में हैं। आजादी के बाद यह पहला अवसर है, जब पश्चिम बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या पिछले चुनाव के मुकाबले कम हुई है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य में लगभग 7.3 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे और मतदान प्रतिशत 82.3 प्रतिशत रहा था, जो देश में सबसे अधिक मतदान दरों में से एक था। विशेषज्ञों के अनुसार मतदाता सूची में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े कर सकते हैं।
इस विवाद ने इतना बड़ा रूप ले लिया कि मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच भरोसे की कमी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने 500 से अधिक न्यायिक अधिकारियों को विवादित मतदाता प्रविष्टियों के निपटारे की जिम्मेदारी सौंपी।
इसके अलावा 10 मार्च 2026 को अदालत ने विशेष अपीलेट ट्रिब्यूनल गठित करने का निर्देश दिया, जिनकी अध्यक्षता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश करेंगे। ये ट्रिब्यूनल उन मतदाताओं की अपीलों की सुनवाई करेंगे, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए आवश्यक था, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि मतदाता सूची का मुद्दा इस चुनाव में अत्यंत संवेदनशील बन चुका है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर तृणमूल कांग्रेस ने तीखा विरोध दर्ज कराया। पार्टी ने पाँच दिनों तक विरोध प्रदर्शन किया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की आलोचना करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह विवाद चुनावी अभियान को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि इससे मतदाताओं के बीच अविश्वास की भावना भी पैदा हो सकती है।
इस बार पश्चिम बंगाल में केवल दो चरणों में मतदान कराया जाएगा—23 और 29 अप्रैल को। यह निर्णय भी चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि 2021 के चुनाव आठ चरणों में हुए थे, जो 27 मार्च से 29 अप्रैल तक चले थे।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अनुसार आयोग ने व्यापक चर्चा के बाद चरणों की संख्या कम करने का निर्णय लिया ताकि चुनाव प्रक्रिया अधिक सुगम और प्रभावी हो सके।
विशेषज्ञों के अनुसार कम चरणों में चुनाव कराने से राजनीतिक तनाव और प्रशासनिक बोझ दोनों कम हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ सुरक्षा व्यवस्था की चुनौती भी बढ़ सकती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीसरे मोर्चे की भूमिका भी दिलचस्प बनी हुई है। पिछले चुनाव में वाम दलों, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट ने मिलकर चुनाव लड़ा था, हालांकि यह गठबंधन अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया। उस चुनाव में आईएसएफ के नेता नौशाद सिद्दीकी भांगर सीट जीतने में सफल रहे थे और वे टीएमसी तथा भाजपा के अलावा किसी अन्य खेमे से जीतने वाले एकमात्र उम्मीदवार बने थे।
इस बार वाम दल और आईएसएफ सीटों के बंटवारे पर सहमत हो गए हैं, जबकि कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। विपक्षी खेमे का बिखराव तृणमूल कांग्रेस को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचा सकता है, क्योंकि भाजपा विरोधी वोट कई हिस्सों में बंट सकते हैं। राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ तब आया जब भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर ‘जनता उन्नयन पार्टी’ नाम से एक नया राजनीतिक दल बना लिया।
उन्होंने संकेत दिया है कि वे इसी नई पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे। यद्यपि यह नया दल राज्यव्यापी प्रभाव पैदा करने की स्थिति में नहीं है, लेकिन कुछ स्थानीय क्षेत्रों में यह चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसे की भी परीक्षा बन गया है। एक ओर चुनाव आयोग चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ दल उसके निर्णयों पर सवाल उठा रहा है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि चुनावी प्रक्रिया पर सभी पक्षों का भरोसा बना रहे।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यह चुनाव तय करेगा कि क्या ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ बरकरार रहेगी या भाजपा राज्य की सत्ता तक पहुंचने में सफल होगी।
इसके साथ ही यह चुनाव यह भी दिखाएगा कि मतदाता भ्रष्टाचार के आरोपों, कल्याणकारी योजनाओं और राजनीतिक विमर्श के बीच किस मुद्दे को प्राथमिकता देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मतदाता सूची से जुड़ा विवाद चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस को जन्म दे चुका है।
अंततः 4 मई को आने वाले परिणाम केवल सत्ता का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।





