जब पहचान ही अपराध बन जाए : बांग्लादेश में बढ़ती लक्षित हिंसा का संकट

When identity itself becomes a crime: The crisis of growing targeted violence in Bangladesh

नृपेन्द्र अभिषेक नृप

हाल – फ़िलहाल बांग्लादेश में जिस प्रकार की लक्षित हिंसा देखने को मिल रही है, वह सामान्य कानून-व्यवस्था की विफलता से कहीं अधिक गहरी और चिंताजनक समस्या की ओर संकेत करती है। जो स्थिति प्रारंभ में आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता से उपजे असंतोष के रूप में सामने आई थी, वह अब धीरे-धीरे पहचान-आधारित घृणा, संस्थागत निष्क्रियता और सामाजिक विश्वास के क्षरण में बदलती दिखाई दे रही है। देश के विभिन्न जिलों से सामने आ रही हत्याओं, हमलों और धमकियों की घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि हिंसा अब अराजक या आकस्मिक नहीं रही, बल्कि वह चयनित, सुनियोजित और विशेष समुदायों व व्यक्तियों को निशाना बनाकर की जा रही है। यह प्रवृत्ति बांग्लादेशी समाज की दिशा और राज्य की उस क्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है, जिसके तहत वह अपने सभी नागरिकों को समानता और सुरक्षा देने के संवैधानिक वादे को निभाने के लिए बाध्य है।

इस हिंसा की पृष्ठभूमि उस लंबे दौर के असंतोष से जुड़ी है, जिसकी शुरुआत राजनीतिक सुधारों और आर्थिक जवाबदेही की मांगों के साथ हुई थी। बीते एक वर्ष में शासन की विफलताओं, बढ़ती महंगाई, रोजगार के अवसरों की कमी और भ्रष्टाचार के आरोपों के विरुद्ध हुए आंदोलनों ने राज्य की नींव को हिला दिया। समय के साथ ये आंदोलन अपना केंद्रीकृत नेतृत्व और स्पष्ट दिशा खोते चले गए। इसी शून्य का लाभ उठाकर चरमपंथी प्रवृत्तियों, आपराधिक गिरोहों और अवसरवादी तत्वों को खुला मैदान मिल गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह अराजकता अब उन लोगों पर हमलों के रूप में सामने आ रही है, जिन्हें उनके कर्मों के कारण नहीं, बल्कि उनकी पहचान के कारण निशाना बनाया जा रहा है, विशेषकर धार्मिक अल्पसंख्यकों, छोटे व्यापारियों और उन व्यक्तियों को, जिन्हें सामाजिक या राजनीतिक रूप से कमजोर समझा जाता है।

हालिया घटनाएं इस भयावह वास्तविकता को और स्पष्ट करती हैं। कम समय के भीतर सामने आए कई मामलों में यह पाया गया कि पीड़ितों की हत्या उनकी धार्मिक या सामुदायिक पहचान की पुष्टि के बाद की गई। छोटे दुकानदारों, व्यापारियों और यहां तक कि सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों पर ऐसे हमले हुए, जिनसे यह प्रतीत होता है कि ये कृत्य अचानक उपजे क्रोध का परिणाम नहीं, बल्कि पहले से सोचे-समझे और योजनाबद्ध अपराध थे। एक घटना में एक व्यापारी की बेरहमी से हत्या कर दी गई, जबकि कुछ ही समय पहले पास के जिले में एक अन्य व्यवसायी को इसी तरह गोली मार दी गई थी। एक अन्य मामले में एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता को पहले सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, फिर उसकी हत्या कर दी गई और इस पूरी घटना को रिकॉर्ड कर प्रसारित किया गया। यह न केवल क्रूरता को दर्शाता है, बल्कि समाज में भय फैलाने और हिंसा को सामान्य बनाने की सोची-समझी कोशिश भी प्रतीत होती है।

ये घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि उस व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं, जो तब उभरता है जब राज्य की सत्ता कमजोर पड़ जाती है और जवाबदेही की व्यवस्थाएं ढहने लगती हैं। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक संक्रमण या अस्थिरता के दौर में अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर आसान निशाना बन जाते हैं। बांग्लादेश में भी यह प्रवृत्ति पहले देखी जा चुकी है, लेकिन वर्तमान दौर इसलिए अधिक खतरनाक है क्योंकि इसमें हिंसा की तीव्रता और आवृत्ति दोनों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। विशेष रूप से हिंदू नागरिकों को बार-बार निशाना बनाए जाने से व्यापक भय का वातावरण बन गया है और लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या केवल नागरिक होना ही सुरक्षा की गारंटी देने के लिए पर्याप्त है।

इस स्थिति को और गंभीर बनाने वाला एक पहलू अंतरिम प्रशासन की स्पष्ट निष्क्रियता या अक्षमता है। यद्यपि सरकारी बयान इन घटनाओं की निंदा करते हैं और जांच का आश्वासन देते हैं, लेकिन धरातल पर ठोस परिणाम बहुत कम दिखाई देते हैं। गिरफ्तारियां यदि होती भी हैं तो प्रायः देर से, और दोषसिद्धि तो और भी दुर्लभ है। यह विफलता केवल प्रशासनिक नहीं है; यह अपराधियों को यह संदेश देती है कि वे बिना किसी भय के हिंसा कर सकते हैं। जब न्याय में देरी होती है या वह मिलता ही नहीं, तब हिंसा एक अपवाद न रहकर सत्ता और नियंत्रण का साधन बन जाती है, जिसके माध्यम से असहमति और भिन्नता को दबाया जाता है।

इस हिंसा की जड़ें जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। इसमें संदेह नहीं कि आर्थिक दबाव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बढ़ती कीमतें, सिकुड़ते रोजगार और आजीविका की अनिश्चितता ने समाज में व्यापक असंतोष को जन्म दिया है। किंतु केवल आर्थिक संकट यह नहीं समझा सकता कि हिंसा विशेष समुदायों की ओर ही क्यों निर्देशित हो रही है। पहचान की राजनीति, दुष्प्रचार और चरमपंथी विचारधाराओं ने सामाजिक विभाजनों को और गहरा कर दिया है। सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाहें तेजी से फैलती हैं, जिनमें अल्पसंख्यकों को बाहरी, विशेषाधिकार प्राप्त या तथाकथित ‘सच्ची राष्ट्रीय पहचान’ में बाधा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे वातावरण में क्रोध को दिशा मिल जाती है और वह कमजोर लक्ष्यों की ओर मुड़ जाता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कारण संस्थागत संतुलन और नियंत्रण की कमजोर होती व्यवस्था है। जब पुलिस बल अत्यधिक दबाव में होते हैं, राजनीतिक हस्तक्षेप का सामना करते हैं या निर्णायक कार्रवाई से हिचकते हैं, तब अपराधी तत्वों का मनोबल बढ़ता है। जब न्यायपालिका धीमी या आम नागरिकों के लिए अप्राप्य प्रतीत होती है, तब पीड़ितों का कानूनी उपायों से विश्वास उठने लगता है। इस प्रकार एक दुष्चक्र बनता है- भय चुप्पी को जन्म देता है, चुप्पी आक्रामकों को प्रोत्साहित करती है और आक्रामकता कानून के शासन को और कमजोर करती है।

इस स्थिति के परिणाम केवल तात्कालिक मानवीय पीड़ा तक सीमित नहीं हैं। लक्षित हिंसा एक बहुलतावादी राष्ट्र की मूल अवधारणा को ही कमजोर कर देती है। बांग्लादेश की पहचान ऐतिहासिक रूप से सांस्कृतिक विविधता, भाषाई गर्व और एक धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचे से निर्मित रही है। जब नागरिकों पर उनकी धार्मिक या सामाजिक पहचान के कारण हमला होता है, तो यह उस बुनियादी आत्मा पर प्रहार है। इसके अतिरिक्त, ऐसी हिंसा बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंचाती है, जिससे पड़ोसी देशों, निवेशकों और मानवाधिकार संगठनों में चिंता बढ़ती है।

सबसे दुखद प्रभाव आम नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य और मनोबल पर पड़ता है। भय केवल पीड़ितों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे पूरे समाज में फैल जाता है। अल्पसंख्यक समुदायों के लोग लगातार असुरक्षा की भावना में जीने लगते हैं, अपनी दिनचर्या बदलने, सामाजिक संपर्क सीमित करने और यहां तक कि पलायन के बारे में सोचने को विवश हो जाते हैं। वहीं बहुसंख्यक समुदाय के लोग भी इससे अछूते नहीं रहते, क्योंकि सामाजिक ताने-बाने के टूटने और अविश्वास के बढ़ने से पूरा समाज प्रभावित होता है। भय में जीने वाला समाज न तो आगे बढ़ सकता है, न नवाचार कर सकता है और न ही स्वयं को स्वस्थ रूप से पुनर्निर्मित कर सकता है।

इस संकट से निपटने के लिए केवल तात्कालिक पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, नैतिक स्पष्टता और संस्थागत सुधारों पर आधारित एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले राज्य को स्पष्ट और बिना किसी शर्त के यह संदेश देना होगा कि पहचान के आधार पर की जाने वाली हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। यह प्रतिबद्धता केवल भाषणों तक सीमित न रहे, बल्कि त्वरित जांच, पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया और अपराधियों को कठोर दंड के रूप में दिखाई देनी चाहिए। साथ ही, कानून प्रवर्तन एजेंसियों को स्वायत्तता और जवाबदेही दोनों प्रदान करनी होगी, ताकि वे बिना राजनीतिक दबाव के निर्णायक कार्रवाई कर सकें।

इस प्रक्रिया में नागरिक समाज, मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिम्मेदार पत्रकारिता दुष्प्रचार का मुकाबला कर सकती है और हिंसा की मानवीय कीमत को सामने ला सकती है। शिक्षा व्यवस्था को बहुलता, सहानुभूति और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की दिशा में काम करना चाहिए। धार्मिक और सामुदायिक नेताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे घृणा के विरुद्ध आवाज उठाएं और आस्था के नाम पर की जाने वाली हिंसा का प्रतिरोध करें।

बांग्लादेश आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। लक्षित हिंसा की वर्तमान लहर केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह न्याय, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता की परीक्षा है। यदि इसे अनदेखा किया गया, तो भय को सामान्य बनाने और समाज को अपूरणीय रूप से विभाजित करने का खतरा है। किंतु यदि साहस, जवाबदेही और समावेशन के साथ इसका सामना किया गया, तो यह संकट एक ऐसे मोड़ में बदल सकता है, जहां बांग्लादेश अपने मूल मूल्यों की पुनः पुष्टि करे और बिना किसी भेदभाव के अपने सभी नागरिकों की रक्षा करने के अपने वादे को नए सिरे से सशक्त रूप में स्थापित करे।